उत्तर प्रदेश में मातृ सुरक्षा महज स्वास्थ्य नीति नहीं, एक सभ्यता का मापदंड है

Ritesh Verma डॉ. आशा राठी
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किसी भी समाज की वास्तविक संवेदनशीलता इस बात से मापी जाती है कि वहां महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं, कितनी सम्मानित और संरक्षित है। उत्तर प्रदेश ने इसी संवेदनशील सोच को शासन की प्राथमिकता के रूप में साकार किया है।

उत्तर प्रदेश में मातृ सुरक्षा महज स्वास्थ्य नीति नहीं, एक सभ्यता का मापदंड है

डॉ. आशा राठी, वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ

मां… यह केवल दो अक्षरों का एक शब्द नहीं, संपूर्ण सृष्टि का सार है। वह आदिशक्ति है, जो जीवन को जन्म देती है, जो दर्द को अपने भीतर समेटकर मुस्कान बिखेरती है, जो रात के घुप्प अंधेरे में भी अपनी आंखों की रोशनी से दूसरों का रास्ता रोशन करती है। संसार में आने से पहले ही जिसकी धड़कनों की लय हमारे अस्तित्व का संगीत बन जाती है, वह मां ही होती है। उसकी आंचल में केवल वात्सल्य नहीं होता, पूरी सृष्टि की करुणा, त्याग और सुरक्षा का विस्तार बसता है। इसलिए किसी भी समाज की वास्तविक संवेदनशीलता इस बात से मापी जाती है कि वहां महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं, कितनी सम्मानित और संरक्षित है। उत्तर प्रदेश ने बीते वर्षों में इसी संवेदनशील सोच को शासन की प्राथमिकता के रूप में साकार किया है। मातृशक्ति वंदन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आत्मिक सोच में है और राज्य सरकार की योजनाओं में इनका प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है।

मातृ सुरक्षा केवल स्वास्थ्य सेवा का विषय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है। जब कोई गर्भवती महिला सुरक्षित प्रसव के विश्वास के साथ अस्पताल तक पहुंचती है, जब किसी नवजात की पहली किलकारी मां की मुस्कान से मिलती है, तब वहां केवल एक परिवार नहीं, पूरा समाज ही आश्वस्त होता है। कभी मातृ मृत्यु दर, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे गंभीर प्रश्नों से जूझने वाला यह विशाल प्रदेश आज मातृ सुरक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन की नई कहानी लिखता दिखाई देता है। योगी सरकार ने मातृत्व को आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सुशासन की आत्मा से जोड़ने का प्रयास किया है।

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दशकों तक उत्तर प्रदेश के लिए मातृ मृत्यु दर ऐसा कलंक था, जो इस महान धरती के माथे पर लगे रक्त के दाग की तरह था। प्रसव पीड़ा में तड़पती माताएं, जिनकी सांसों का दीया अस्पताल पहुंचने से पहले ही बुझ जाता था। फिर आया बदलाव का दौर। वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अटल संकल्प लिया कि इस प्रदेश की कोई मां अब अभाव में नहीं मरेगी। हर जच्चा को सुरक्षित प्रसव का अधिकार मिलेगा। राज्य का सुशासन मां की ममता का सहारा बनेगा। यह केवल नीतिगत घोषणा नहीं थी, यह एक नैतिक प्रतिबद्धता थी, जो जमीन पर उतरती दिखी, आंकड़ों में बोलती दिखी और लाखों माताओं की सांसों में जीती दिखी। इसी राज्य में 2017 में संस्थागत प्रसव 67 प्रतिशत था, जो अब 97 प्रतिशत के करीब है।

इसके लिए व्यापक और समन्वित प्रयास किए गए, जिसके बारे में पहले सोचा तक नहीं जाता था। सबसे पहले 102 और 108 एंबुलेंस सेवाओं को विस्तार दिया गया। प्रदेश में 102 सेवा के अंतर्गत 2,270 एम्बुलेंस और 108 सेवा के तहत 2,200 एम्बुलेंस दिन-रात दौड़ती हैं। वह गांव जहां पहले प्रसव पीड़ा में कराहती मां को खाट पर कोसों दूर ले जाया जाता था, वहां अब एंबुलेंस की आवाज आशा की नई इबारत लिखती है। 108 एंबुलेंस सेवा ने चार करोड़ लोगों को लाभ पहुंचाया है, जो इस सरकार की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जो हर मां को सुरक्षित देखना चाहती है।

जननी सुरक्षा योजना इस बदलाव की रीढ़ बनी, जिसके अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए सीधे आर्थिक सहायता दी जाती है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के साथ मिलाकर यह राशि एक गर्भवती मां के लिए जीवन रक्षक सहायता बन जाती है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने गर्भवती माताओं के लिए निःशुल्क जांच का एक ऐसा संकल्प दिया, जो नियमितता और विश्वसनीयता का प्रतीक बना। मिशन इन्द्रधनुष ने टीकाकरण को एक जन-आंदोलन का रूप दिया तो पोषण अभियान ने उस बुनियाद को मजबूत किया, जिस पर स्वस्थ मातृत्व टिकता है। मुख्यमंत्री मातृत्व अमृत योजना के अंतर्गत पोषण किट और नकद सहायता देकर और आंगनबाड़ी के माध्यम से पूरक आहार पहुंचाकर गर्भवती और धात्री माताओं के पोषण पर विशेष ध्यान दिया गया।

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो मन में एक गर्व का भाव होता है। वही उत्तर प्रदेश जो कभी मातृ मृत्यु के आंकड़ों में सबसे दुखद पायदान पर खड़ा था, आज सुशासन और संवेदनशील नीतियों के दम पर एक नई पहचान बना रहा है। यह बदलाव किसी एक व्यक्ति या किसी एक योजना का नहीं, यह उन हजारों स्वास्थ्य कर्मियों, आशा बहनों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के सामूहिक प्रयास का प्रतिफल है, जिनके मन में योगी आदित्यनाथ ने यह संकल्प भरा है कि मां की जान बचाना ही सबसे बड़ा धर्म है।

इसके अलावा, 'मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना' ने केवल बेटियों का भविष्य नहीं सुधारा है, बल्कि उसने उस 'मां' के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को भी सुदृढ़ किया है, जो पहले बेटी के जन्म को लेकर असुरक्षा के भाव में रहती थी। 'मिशन शक्ति' के माध्यम से मातृ सुरक्षा को सामाजिक सुरक्षा के साथ एकीकृत किया जाना भी एक दूरदर्शी कदम है।

किन्तु यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई। शिशु मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर को और कम करके राष्ट्रीय लक्ष्य तक पहुंचाना है। ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य असमानता अभी भी एक चुनौती है। यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं, क्योंकि जो बदलाव की राह पर है, वही असलियत को स्वीकार करने का साहस रखता है। विशाल जनसंख्या और व्यापक भौगोलिक विस्तार वाले इस राज्य में हर एक जान को सुरक्षित करना निरंतर चलने वाला महायज्ञ है। लेकिन, 2017 से अब तक का सफर यह विश्वास दिलाता है कि उत्तर प्रदेश सही दिशा में अग्रसर है।

जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ मानने वाली हमारी सनातन संस्कृति में 'माता' केवल एक परिवार की धुरी नहीं, बल्कि राष्ट्र की अस्मिता और भविष्य की संरक्षिका है। योगी सरकार का नैरेटिव इस सत्य को पुख्ता करता है कि जब नेतृत्व में दृढ़ इच्छाशक्ति और हृदय में जनता के प्रति ममत्व होता है, तो संसाधनों की कमी कभी बाधा नहीं बनती। आज उत्तर प्रदेश सुरक्षित है, क्योंकि यहां की माताएं सुरक्षित हैं। जिस प्रदेश में धरती को माता मानकर पूजा जाता है, वहां की हर माता का स्वास्थ्य और सम्मान शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। उत्तर प्रदेश का संदेश स्पष्ट है- ‘मां की सुरक्षा केवल एक स्वास्थ्य नीति नहीं, यह एक सभ्यता का मापदंड है।’

डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं

Ritesh Verma

लेखक के बारे में

Ritesh Verma
रीतेश वर्मा पत्रकारिता में 25 साल से अलग-अलग भूमिका में अखबार, टीवी और डिजिटल में काम कर चुके हैं। दैनिक जागरण के साथ बिहार में 5 साल तक जिला स्तर की प्रशासनिक और क्राइम रिपोर्टिंग करने के बाद रीतेश ने आईआईएमसी, दिल्ली में दाखिला लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। एक साल के अध्ययन ब्रेक के बाद रीतेश ने विराट वैभव से दोबारा काम शुरू किया। फिर दैनिक भास्कर में देश-विदेश का पेज देखा। आज समाज में पहले पन्ने पर काम किया। बीबीसी हिन्दी के साथ आउटसाइड कंट्रीब्यूटर के तौर पर जुड़े। अखबारों के बाद रीतेश ने स्टार न्यूज के जरिए टीवी मीडिया में कदम रखा। रीतेश ने टीवी चैनलों में रिसर्च डेस्क पर लंबे समय तक काम किया है और देश-दुनिया के विषयों पर तथ्यपरक जानकारी सहयोगियों को आगे इस्तेमाल के लिए मुहैया कराई है। सहारा समय और इंडिया न्यूज में भी रीतेश रिसर्च का काम करते रहे। इंडिया न्यूज की पारी के दौरान वो रिसर्च के साथ-साथ चैनल की वेब टीम के हेड बने और इनखबर न्यूज पोर्टल को बतौर संपादक शुरू किया। लाइव हिन्दुस्तान के साथ एडिटर- न्यू इनिशिएटिव के तौर पर पिछले 6 साल से जुड़े रीतेश फिलहाल उत्तर प्रदेश और बिहार की खबरों और दोनों राज्यों की टीम को देखते हैं। और पढ़ें
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