देवरिया मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों ने मारोटॉक्स लैमी सिंड्रोम का किया डायग्नोसिस
महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज के दंत विभाग के डॉक्टरों ने मारोटॉक्स लैमी सिंड्रोम की डायग्नोसिस किया है और सफल ऑपरेशन कर सिस्ट को निकाला है। यह बीमारी अत्यंत दुर्लभ है और इसका सही उपचार न होने पर जबड़ा टूटने की संभावना रहती है। यह पूर्वांचल में इस तरह के मरीज का पहला उपचार है।

देवरिया, निज संवाददाता महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज के दंत विभाग के डॉक्टरों ने मारोटॉक्स लैमी सिंड्रोम की डायग्नोसिस किया है। साथ ही आपरेशन कर सिस्ट को निकाला है। करीब दो घंटे तक चला आपरेशन सफल रहा। मरीज सकुशल है। यह एक बड़ी उपलब्धि है। इस बीमारी के मरीज कम संख्या में मिलते हैं। समय पर सही उपचार न होने से जबड़ा टूटने की संभावना रहती है। पूर्वांचल में संभावत: पहली बार इस तरह के मरीज का उपचार हुआ।
मेडिकल कॉलेज दंत विभाग में सुविधाएं
मेडिकल कॉलेज दंत विभाग में सुविधाएं बढ़ी हैं। आएदिन जटिल आपरेशन कर मरीजों का इलाज किया जा रहा है। पड़ोसी प्रांत बिहार के गोपालगंज जिले के विजयीपुर थाना क्षेत्र के रसूलपुर निवासी रीमा (18) पुत्री मदन खरवार दांत की बीमारी से काफी दिनों से परेशान थी। वह दांत की बची हुई जड़ का इलाज व निकलवाने के लिए 9 अप्रैल को दंत विभाग में पहुंची। एसोसिएट प्रोफेसर (ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जन ) डॉ. ब्रज भूषण मल्ल व सीनियर रेजिडेंट डॉ. अंजली मल्ल ने एक्स-रे कराया।
मारोटॉक्स लैमी सिंड्रोम का निदान
पेरिआपिकल रेडियोल्यूसेंसी देखी गई। शंका होने पर डॉक्टरों ने ओपीजी एक्स-रे कराया, जिसमें मरीज के निचले जबड़े में एक बड़ी गांठ (सिस्ट), जो सामान्य से तीन गुना आकार का और एक तरफ से दूसरी तरफ फैला दिखा। इसके बाद डॉक्टरों ने फेस का सीटी स्कैन कराया। साथ ही परीक्षण के दौरान देखा कि मरीज का कद छोटा, ललाट उभरा, सिर का आकार चौड़ा, छोटी गर्दन, नाक चिपटी व दाएं पैर की अंगुली चिपकी थी। साथ ही जोड़ों में दर्द, नियमित रूप से बुखार आने समस्या सामने आई। शारीरिक बनावट व लक्षण के आधार पर डॉक्टरों को म्यूकोपोलीसेक्रॉइडोसिस - 6 (मारोटेक्स लैमी सिंड्रोम) की आशंका हुई।
सफल ऑपरेशन की प्रक्रिया
सीटी स्कैन रिपोर्ट, शरीर की बनावट और जबड़े में मौजूद अत्यंत बड़ी सिस्ट को देखते हुए सीनियर रेजिडेंट डॉ. अंजली मल्ल ने इस विषय पर प्रकाशित विभिन्न साहित्य का अध्ययन किया और मारोटॉक्स लैमी सिंड्रोम का प्रारंभिक उपचार शुरू किया और लिवर और प्लीहा के अल्ट्रासाउंड की जांच कराई, जिसमें हेपेटोमेगाली और स्प्लेनोमेगाली दिखाई दी, जिससे बीमारी की पुष्टि हुई। रोगी के पिता ने भी अपने सगोत्रीय विवाह का इतिहास बताया (यह रोग का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है)। इसके बाद आपरेशन का निर्णय लिया गया। विभागाध्यक्ष डॉ. अफसाना अंसारी की देखरेख में एसोसिएट प्रोफेसर (ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जन ) डॉ. ब्रज भूषण मल्ल व सीनियर रेजिडेंट डॉ. अंजली मल्ल और जूनियर रेजिडेंट डॉ. प्रियंका कुमारी ने प्रभावित सभी दांतों के रूट कैनाल उपचार के बाद सिस्ट का एन्यूक्लिएशन (आपरेशन) किया, जो सफल रहा।
चिकित्सकों की सुनें
डॉ. ब्रजभूषण मल्ल व एसआर डॉ. अंजली मल्ल ने बताया कि मरीज केवल एक दांत दिखाने आई थी, लेकिन जटिल आनुवंशिक बीमारी का पता चला। मारोटॉक्स लैमी सिंड्रोम एक अत्यंत दुर्लभ और कम निदान वाला सिंड्रोम है। प्रति 3,20,000 जनसंख्या पर एक व्यक्ति प्रभावित होता है। यह बीमारी विभिन्न बीमारियों का समूह है, जिसे सिंड्रोम कहा जाता है। इस बीमाीर की डायग्नोसिस न हो पाने के कारण मरीज इलाज से वंचित रह जाता है। अब तक भारत में इस बीमारी के केवल 80 मामले ही सामने आए हैं। कहा जाता सकता है कि मुख स्वास्थ्य का प्रतिबिम्ब है। यदि समय से इलाज नहीं होता तो मरीज का जबड़ा सिस्ट की वजह से टूट जाता। प्राचार्य डॉ. रजनी, सीएमएस डॉ. एचके मिश्रा व अन्य फैकेल्टी ने दंत चिकित्सा विभाग की टीम को सफल उपचार करने पर बधाई व शुभकामना दी है।
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