Deoria News: ईईजी मशीन फांक रही धूल, जांच शुरू न होने से मरीज परेशान

हिन्दुस्तान, देवरिया
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Deoria News: महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज में ईईजी मशीन दो साल से बेकार पड़ी है, जिससे मरीजों को परेशानी हो रही है। तकनीशियन की कमी के कारण जांच नहीं हो रही, जिससे मरीज महंगे निजी केंद्रों की ओर जा रहे हैं। इससे न केवल आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, बल्कि समय की भी बर्बादी हो रही है।

Deoria News: ईईजी मशीन फांक रही धूल, जांच शुरू न होने से मरीज परेशान

Deoria News: देवरिया, निज संवाददाता। महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज में ईईजी मशीन से जांच की सुविधा शुरू नहीं होने से मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, जबकि करीब दो साल से मशीन मंगाई गई, जो स्टोर में रखी धूल फांक रही है। टेक्नीशियन की कमी से मशीन बेकार पड़ी है। इसकी वजह से मरीजों को महानगरों व निजी सेंटरों की ओर रूख करना पड़ता है, जहां उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ पड़ता और समय भी बर्बाद होता है। यहां जांच शुरू होने से मरीजों को सहूलियत होगी। मेडिकल कॉलेज में झटका और मिर्गी से संबंधित रोग से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ी है।

मरीज इलाज कराने पहुंचे है। इसमें बाल रोग और मानसिक रोग विभाग में इस तरह के आठ से दस मरीज होते हैं। इन मरीजों को इलेक्ट्रो इंसिफेलोग्राम (ईईजी) जांच की जरूरत पड़ती है। जांच के माध्यम से मरीजों के दिमाग की गतिविधियों के बारे में पता किया जाता है। इस जांच से डॉक्टर को डायग्नोसिस और इलाज करने में आसानी होती है। डॉक्टर को लगता है कि मरीज को मिर्गी हो सकती है। इसके बारे में अधिक जानने तथा मिर्गी की दवा बदलने या बंद करने के लिए भी कराई जाती है, वहीं झटका की बीमारी से पीड़ित बच्चों के दिमागी के बारे में जानकारी के लिए जांच कराई जाती है। इसकी जरूरत महसूस होने पर मेडिकल कॉलेज में जांच की सुविधा को शुरू करने के लिए दो साल पहले करीब 11 लाख रुपये की लागत से मशीन मंगाई गई। उस समय इलेक्ट्रो इहंसिफेलोग्राम (ईईजी)जांच के लिए केजीएमयू की दर पर 460 रुपये मरीजों से शुल्क लेने की बात भी कही गई, लेकिन दो साल से अधिक समय बीत गया अब तक शुरू नहीं हो सकी है। इसे चालू करने में टेक्नीशियन और दक्ष स्टाफ की कमी आड़े आ रही है। ऐसे में मरीजों को जांच के लिए गोरखपुर, वाराणसी, लखनऊ तथा निजी सेंटरों की ओर रुख करना पड़ता है। निजी सेंटरों पर जांच के लिए मरीजों को आठ सौ से एक हजार रुपये कीमत चुकानी पड़ती है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ पड़ता है।

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