
भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा और राष्ट्रीय अकादमी के स्थापना की उठी मांग
Deoria News - विश्व भोजपुरी सम्मेलन का दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन देवरिया में हुआ। सत्र में भोजपुरी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने, आठवीं अनुसूची में शामिल करने और राष्ट्रीय भोजपुरी अकादमी की स्थापना की मांग उठाई गई। प्रो. वाचस्पति द्विवेदी ने भोजपुरी की ऐतिहासिकता पर प्रकाश डाला। सत्र में विभिन्न साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया।
देवरिया, निज संवाददाता। विश्व भोजपुरी सम्मेलन के प्रदेश इकाई के तत्वावधान में राजकीय इंटर कॉलेज के प्रांगण में दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन के दूसरे दिन रविवार को बतकही सत्र का आयोजन किया गया। इसमें भोजपुरी भाषाई आंदोलन पर विषय के तहत दशा,दिशा और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हुई। इसमें कुछ प्रस्ताव पर चर्चा हुई। सत्र में भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा, आठवीं अनुसूची में स्थान देने की बात कही गई। साथ ही राष्ट्रीय भोजपुरी अकादमी के स्थापना की मांग उठी। इसके अलावा सेंसर बोर्ड नियामक के स्थापना पर भी चर्चा हुई। इसमें भोजपुरी के संवैधानिक दर्जा, आठवीं अनुसूची में स्थान, राष्ट्रीय भोजपुरी अकादमी की स्थापना, सेंसर बोर्ड नियामक के स्थापना की मांग उठी।

प्रो. वाचस्पति द्विवेदी ने कहा कि भोजपुरी लगभग तीस करोड़ लोगों की भाषा है। भोजपुरी के लिपि का नहीं होना, इसके संवैधानिक दर्जा को मिलने का प्रमुख अड़चन है, जबकि ढाई करोड़ जनसंख्या की भाषा मैथिलि के पास अपना लिपि है। इसकी वजह से उसको संवैधनिक दर्जा पाने में सफल रही I मुख्य अतिथि विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय सचिव डॉ. देवेंन्द्र नाथ तिवारी ने कहा कि गुरु गोरखनाथ, कबीर के परंपरा से होकर भोजपुरी यहां पहुंची है। 22 भाषाएं शामिल जो भारत की आधिकारिक भाषाएं हैं, लेकिन अब तक आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल नहीं किया गया है, जबिक भोजपुरी पूर्वी उप्र, बिहार, झारखंड राज्यों में बोली जाती है। वहीं मारीशस और नेपाल जैसे देशों में संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। इसके अलावा सूरीनाम, गुआना, त्रिनिडाड, टोबैया, फिजी में भी भोजपुरी भाषा बोली जाती है। कहा कि आठवीं अनुसूची में शामिल होने से भोजपुरी भाषा का विकास होगा। शिक्षा और सरकारी काम काज में इसका उपयोग बढ़ेगा। इसे लेकिन सांसद, विधायक को मांग करनी चाहिए, लेकिन यह दुखद है कि भाषा की लड़ाई से अधिक यह राजनीतिक लड़ाई हो गई है। कबीरदास की जयंती को भोजपुरी भाषा दिवस करने की मांग उठी। राष्ट्रीय मंत्री अजय ओझा ने कहा कि भोजपुरी का अस्तित्व 7वीं शताब्दी में राजा भोज के समय से शुरू हुआ। प्रारम्भिक साहित्यिक रूप बज्रयानी सिद्धी के चर्चापद में देखने को मिलता है। भोजपुरी कवियों का पहला उल्लेख बाण भट्ट द्वारा रचित हर्ष चरित में मिलता है। उन्होंने ईशानचंद्र और बेनी भारत के नामों का उल्लेख किया, जो भोजपुरी क्षेत्र के थे और संस्कृत और प्राकृत की बजाय स्थानीय भाषा में रचना कर रहे थे। कहा कि भोजपुरी कविता का सबसे पुराना रूप नाथ संत चौरंगी नाथ की प्राण संकली और बज्रयानी सिद्धों के चर्चापद में देखा जा सकता है। प्राचीन भोजपुरी साहित्य का विकास उस क्षेत्र के संत कवियों द्वारा किया गया। कहा कि भक्ति आंदोलन में कबीर की प्राथमिक भाषा भोजपुरी थी। अध्यक्षता कर रहे विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतर्राष्ट्रीय इकाई के अध्यक्ष जगदीश उपाध्याय ने कहा कि भोजपुरी देश के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा विदेशों में भी बोली जाती है। 1834 में भोजपुरी भाषी अकाल का सामना नहीं कर सके। ब्रिटिश हुकूमत में कुछ लोगों को मॉरीशस रवाना किया गया। इसमें 84 लोगों का जत्था एटलस जहाज से प्रवासी भारतीयों लेकर कोलकाता से रवाना हुआ। उन्हें गीता, रामायण सहित धार्मिक ग्रंथ देकर विदा किया गया। इस दौरान छूट ल जहाज पवरिया धीरे चलो.. एक गीत बन गया, जहां भोजपुरी भाषियों की मेहनत से गन्ना का बेहतर उत्पादन होता है। अनुच्छेद 345, 346, 347 में प्राविधान है कि प्रदेश सरकार द्वितीय भाषा के रूप में इसे मान्यता दे सकती है। इसके बाद भोजपुरी एकेडमी की स्थापना हो जाएगी। इसके होने से भोजपुरी का और विकास होगा। इसके अलावा डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर, विश्व भोजपुरी सम्मेलन के कुशीनगर जिलाध्यक्ष राजकुमार भट्ट बावरा, देवरिया जिलाध्यक्ष गिरजेश मिश्र ने संबोधित किया। संचालन, प्रो. शैलेन्द्र राव ने किया। ध्रुवदेव मिश्र पाषाण पुरस्कार से सम्मानित हुए डॉ. मोहन विश्व भोजपुरी सम्मेलन के दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन के दूसरे दिन नामचीन हस्तियों के नाम पर साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। इसमें डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर को ध्रुवदेव मिश्र पाषाण पुरस्कार दिया गया, जबकि अरुणेश नीरन सम्मान से डॉ. देवेन्द्र तिवारी को सम्मानित किया गया।

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