यूपी में सैकड़ों अपात्रों को बांट दिए गए पीएम आवास के लिए करोड़ों रुपए, CAG रिपोर्ट में खुलासा
उत्तर प्रदेश में सैकड़ों अपात्रों को पीएम आवास योजना के लिए करोड़ों रुपए बांट दिए गए हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। सके साथ ही साइबर धोखाधड़ी से 159 लाभार्थियों का पैसा दूसरों के खाते में भी चला गया है।

यूपी में प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में सैकड़ों अपात्रों को मकान बनाने के लिए करोड़ों रुपये दे दिए गए। साइबर धोखाधड़ी के चलते 159 लाभ्यर्थियों का 86.20 लाख रुपये दूसरों के खाते में भेज दिया गया। विधानमंडल में बुधवार को पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। इसके साथ ही कई अन्य विभागों में भी अनियमित्तता बरतने की रिपोर्ट दी गई है। इसमें उर्जा विभाग और उच्च शिक्षा विभाग शामिल हैं। इसके अलावा समाज कल्याण विभाग के रवैये पर सीएजी की रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में कच्चे और जीर्ण-शीर्ण आवासों में रहने वाले परिवारों को अपनी जमीन पर मकान बनाने के लिए 1.20 लाख रुपये तीन किस्तों में दिया जाता है। वर्ष 2016-17 से 2022-23 की अवधि के दौरान प्रदेश में 34.71 लाख प्रधानमंत्री आवास योजना स्वीकृत किए गए और 34.18 लाख (98.48%) मकानों का निर्माण मार्च 2024 तक हुआ। सीएजी ने जांच में पाया कि यूपी में 14.47 लाख लाभार्थियों की अंतिम सूची मई 2016 में प्रकाशित की गई।
केंद्र सरकार ने जुलाई 2017 में इन परिवारों की पहचान की सलाह दी कि पुन: सर्वे कर यह देखा जाए कि पात्र होने के बाद भी प्रतीक्षा सूची में आने से लोग बाहर रह गए। मार्च 2024 में आवास प्लस सर्वेक्षण आंकड़ों के आधार पर ऐसे परिवारों की संख्या 33.64 लाख हो गई। इनमें से केवल 22.29 लाख लाभार्थियों को सूची में अतिरिक्त रूप से शामिल किया गया। सर्वेक्षण में लाभार्थियों की पहचान के बाद इसमें से एक बड़े हिस्से को स्थाई प्रतीक्षा सूची से बाहर रखे जाने को सीएजी ने कहा कि ये या तो अशुद्धियां हैं या फिर एकत्रित आंकड़ों में गड़बड़ी है। ग्राम्य विकास विभाग ने अक्तूबर 2023 में यह स्वीकार किया कि कई पात्र लाभार्थी गलती से स्थाई प्रतीक्षा सूची से बाहर हो गए थे।
सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपी सरकार द्वारा वर्ष 2017 से 2023 के बीच इस योजना में 40231 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसमें से 37984 करोड़ मकान निर्माण और 157 करोड़ रुपये प्रशासनिक मद में खर्च हुए। राज्य सरकार द्वारा प्रशासनिक मद में कम खर्च किए जाने की वजह से केंद्र से 357 करोड़ रुपये कम मिले। जांच में यह भी पाया गया कि 79 प्रतिशत लाभार्थियों की पहली किस्त जारी करने में सात कार्य दिवसों से अधिक विलंब हुआ। अगस्त 2024 तक 11031 लाभार्थियों के मामलों में 20.18 करोड़ की सहायता राशि नहीं देने पर भी आपत्ति की गई है।
समाज कल्याण विभाग के रवैये पर सीएजी की आपत्ति
लखनऊ। समाज कल्याण विभाग ने बचत की धनराशि में से वित्त विभाग को काफी कम रकम वापस लौटाई। बाकी रकम विभाग के पास ही पड़ी रही। सीएजी की रिपोर्ट में विभाग के इस रवैये पर आपत्ति जताई गई है। उसके पास मूल बजट में से 342 करोड़ रुपये बचे मगर वित्त विभाग को 40 करोड़ ही वापस किए।
सीएजी की रिपोर्ट में बाकी करीब 302 करोड़ रुपये की धनराशि का ब्योरा न मिलने पर सवाल उठाए गए हैं। विभाग की ओर से अनुदान व्यय मूल बजट से कम होने की वजह से अनुपूरक अनुदान अनावश्यक साबित हुआ। अनुपूरक अनुदान के रुप में मिले 115 करोड़ रुपये अनावश्यक अनुदान साबित हुआ। कुछ योजनाओं में समय पर केंद्रांश न मिलने के कारण धनराशि को वापस लौटाना पड़ा। करीब 19 करोड़ रुपये की धनराशि को इस वजह से वापस किया गया। अनुसूचित जातियों के कल्याणार्थ शोध एवं प्रशिक्षण योजनाओं में 1.79 करोड़ रुपये संयुक्त निदेशक व निदेशक न होने व छत्रपति शाहू जी महाराज शोध प्रशिक्षण संस्थान से विज्ञापन की आवश्यकता न होने पर कोई बिल प्राप्त नहीं हुआ।
उच्च शिक्षा ने 957 व आबकारी ने 195 करोड़ नहीं लौटाए
सीएजी की रिपोर्ट में उच्च शिक्षा विभाग को दिए गए बजट में से हुई 957 करोड़ रुपये की बचट में से धनराशि वापस न किए जाने पर आपत्ति जताई गई है। वहीं 3.92 करोड़ रुपये का अनुपूरक अनुदान भी उच्च शिक्षा विभाग के लिए फिजूल साबित हुआ। आबकारी विभाग को दिए गए बजट में से 195 करोड़ रुपये बच गए लेकिन उसने इसमें से कोई रकम वित्त विभाग को वापस नहीं किए। यही नहीं 50 करोड़ का अनुपूरक अनुदान भी उसने बेकार में लिया और जो अनावश्यक साबित हुआ।
व्यावसायिक शिक्षा विभाग के 402 करोड़ न लौटाने पर आपत्ति
व्यावसायिक शिक्षा विभाग ने योजनाओं को लागू करने में लापरवाही बरती। कई योजनाओं में वह पूरा बजट नहीं खर्च कर पाया। मूल बजट के बचे हुए 402 करोड़ रुपये वित्त विभाग को वापस नहीं किया। यही नहीं अनुपूरक अनुदान में अनावश्यक 300 करोड़ रुपये ले लिए। यह रकम विभाग के पास बेकार पड़ी रही।
सीएजी की रिपोर्ट में व्यावसायिक शिक्षा विभाग की ओर से 402.24 करोड़ रुपये की धनराशि वित्त विभाग को वापस न करने पर आपत्ति जताई गई है। फिर जुलाई 2024 में 300 करोड़ का अनुपुरक अनुदान लेना विभाग के लिए अनावश्यक साबित हुआ। कई योजनाओं में वह पूरी धनराशि नहीं खर्च कर पाया। दस्तकार प्रशिक्षण योजना में 26 करोड़ में से 16.75 करोड़ ही खर्च हुए, प्रदेश में दो मेगा राजकीय आईटीआई खोलने के लिए एक करोड़ में से शून्य और मुख्यमंत्री शिक्षुता प्रोत्साहन योजना में 70 करोड़ रुपये से मात्र 1.49 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वित्त विभाग को समय पर धनराशि वापस नहीं की गई। वहीं अनुपूरक अनुदान लेकर भारी भरकम रकम फंसाए रखी।
विद्युत वितरण कंपनियों ने किए थे करोड़ों रुपये के अतिरिक्त भुगतान
दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) व प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) के प्रबंधन में कई कमियां थीं। भारत के नियंत्रक व महालेखापरीक्षा (सीएजी) की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि सौभाग्य योजना के डीपीआर में आफ-ग्रिड संयोजनों को शामिल नहीं किया गया था। वित्तीय प्रबंधन में कमियों के चलते वितरण कंपनियां दोनों योजनाओं में 2,0026.61 करोड़ रुपये के ऋणों को अनुदान में परिवर्तित नहीं कर पाई थीं।
दोनों योजनाओं की 2014-15 से 2022-23 (दिसंबर 2022 तक) की अवधि में सीएजी जांच में पाया गया कि जीएसटी व राज्य करों के लिए त्रुटिपूर्ण व अपर्याप्त दावों के चलते वित्तीय विसंगतियों हुईं। लिहाजा 2.90 करोड़ रुपये से अधिक की जीएसटी प्रतिपूर्ति व 4.21 करोड़ रुपये की बकाया प्रतिपूर्ति नहीं हो सकी। इसके अलावा लागू ब्याज दरों का सत्यापन न किए जाने के कारण आरईसी ऋणों पर 7.19 करोड़ रुपये अधिक ब्याज का भुगतान किया गया था। रिपोर्ट में वितरण कंपनियों को करों का सटीक आंकलन किए जाने व समय से उनका दावा किए जाने की सलाह भी दी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार सौभाग्य योजना के तहत आफ-ग्रिड संयोजनों को शामिल करने के आदेश के बाद भी डीपीआर में ऐसे प्राविधानों को शामिल नहीं किया गया। परियोजनाओं के क्रियान्वयन में 29 से 49 माह की देरी, एटी एंड सी हानियों में कमी के लक्ष्य को पूरा करने में असफलता तथा मीटर-युक्त उपभोग के आधार पर अग्रिम राजस्व सब्सिडी का दावा न किए जाने की वजह से वितरण कंपनियों को ऋणों के 50 प्रतिशत हिस्से को अनुदान में परिवर्तित करने का लाभ नहीं उठा सकी थीं।
पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (पीवीवीएनएल) ने सामग्रियों पर गलत जीएसटी लगाया, जिससे परियोजना की लागत 3.63 करोड़ रुपये से बढ़ गई थी। इसके चलते पीवीवीएनएल ने ग्रामीण विद्युतीकरण निगम से सीजीएसटी अंश के लिए 1.09 करोड़ रुपये तथा राज्य सरकार से एसजीएसटी के लिए 1.81 करोड़ रुपये का अधिक दावा किया गया था। ऐसे ही पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (पीयूवीवीएनएल) द्वारा लिए गए 66 करोड़ रुपये के अधिक ऋणों के कारण अगस्त 2021 से जून 2022 की अवधि के लिए 3.94 करोड़ रुपये का ब्याज वहन करना पड़ा था। इसके अलावा पीवीवीएनएल द्वारा लागू दर का सत्यापन किए बिना ब्याज का भुगतान किए जाने से आरईसी को 7.19 करोड़ रुपये अधिक ब्याज का भुगतान किया गया था।
रिपार्ट में परियोजनाओं में विभिन्न कार्य प्रदान करने के नियम व शर्तों के उल्लंघन, डीपीआर बनाने के लिए स्थापना प्रभार व उपकरण तथा संयंत्र प्रभार को हटाए बिना भुगतान किए जाने से 3.33 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान किए जाने की बात भी सामने आई है।
लेखापरीक्षा के टोकने पर हुई 5.97 करोड़ की वसूली
यह भी कहा गया है कि टीकेसीज से हुए करार में विद्युत निरीक्षण लागत अनुबंध मूल्य में शामिल की गई थी। इसके बाद भी तीन वितरण कंपनियों ने टीकेसीज कंपनी को विद्युत सुरक्षा निरीक्षण शुल्क के रूप में 9.16 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। लेखापरीक्षा के इस कमी को उजागर करने पर दो वितरण कंपनियों ने 5.97 करोड़ रुपये की वसूली की। इसके बाद भी टीकेसीज को 3.37 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान हुआ।
इसके अलावा दो वितरण कंपनियों ने सैग, जम्परिंग व अपव्यय के लिए अस्वीकार्य भुगतान किए जिससे, टीकेसीज को 1.09 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान हुआ। सौभाग्य योजना के तहत टीकेसीज द्वारा निर्गत व दावा किए गए संयोजनों में दोहराव पाया गया, जिससे 26.65 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान हुआ। इसके दृष्टिगत वितरण कंपनियों को प्रभावी सत्यापन प्रणाली बनाने को कहा गया है, जिससे अधिक भुगतान का रोका जा सके।

लेखक के बारे में
Yogesh Yadavयोगेश यादव हिन्दुस्तान में डिप्टी न्यूज एडिटर के पद पर हैं।
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