अपहरण के संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, 43 साल पुराने केस में हाईकोर्ट का आदेश

Dinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि केवल संदेह या शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि अपहरण का आरोप अदालत ने तय नहीं किया।

अपहरण के संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, 43 साल पुराने केस में हाईकोर्ट का आदेश

Allahabad Highcourt Order News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि केवल संदेह या शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि अपहरण का आरोप अदालत ने तय नहीं किया। आरोप हत्या का था, जिसमें सेशन कोर्ट ने बरी कर दिया, तो अपरहण के आरोप में सजा नहीं दी जा सकती। दोनों अपराध अलग है। मिलते जुलते अपराध नहीं है।

बिना आरोप सजा सुनाना गलत है। इसी के साथ कोर्ट ने आईपीसी की धारा 364 के तहत अपीलार्थी विनोद कुमार की सात साल कैद की सजा रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम ने पाया कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त विनोद कुमार के खिलाफ अपहरण का पर्याप्त सबूत नहीं दे सका। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 364 के तहत अपराध के लिए यह साबित करना होगा कि अभियुक्त ने अपहरण किया था और उसका हत्या करने का इरादा था।

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कोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त पर केवल आईपीसी की धारा 302 के तहत आरोप तय किए गए थे तो धारा 364 के तहत उसे दोषी ठहराया जाना महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों को उठाता है, जिन पर विचार आवश्यक है। क्या इस प्रकार की दोषसिद्धि बिना विशिष्ट आरोप तय किए और बिना सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अभियुक्त से प्रासंगिक प्रश्न पूछे बिना दर्ज की जा सकती थी? यह समझना कठिन है कि ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को आईपीसी की धारा 302 के तहत बरी करने के बाद धारा 364 के तहत दोषी क्यों ठहराया।

खासकर तब, जब उसने स्वयं पाया था कि अवैध संबंध का मकसद सिद्ध नहीं हुआ था और उन गवाहों की गवाही, जिन्होंने मृतक को उसकी मृत्यु से पहले अपीलार्थी के साथ देखने का दावा किया था, विश्वसनीय नहीं थी। ट्रायल कोर्ट ने प्रकरण में दो अन्य अभियुक्तों शिव राम शुक्ल और सुनीत कुमार को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि महेश सिंह की हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। अपीलार्थी विनोद को आईपीसीकी धारा 302 के तहत आरोप से बरी कर करते हुए आईपीसी की धारा 364 के तहत सिर्फ इसलिए दोषी ठहराया था कि उसे महेश (मृतक) को ले जाते हुए गवाह बैजनाथ ने देखा था। मामले के तथ्यों के अनुसार बैजनाथ सिंह ने इटावा के बरहपुरा थाने में 23 अक्तूबर 1983 को मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें इटावा के सत्र न्यायाधीश ने 21 फरवरी 1986 को अपीलार्थी को सजा सुनाई थी।

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दिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका (डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में कार्यरत दिनेश दिनेश, खबरों के पीछे की राजनीति और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स (वायरल वीडियो) को बारीकी से विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं।

पत्रकारिता का सफर
हरदोई ब्यूरो से करिअर की शुरुआत करने के बाद दिनेश ने कानपुर हिंदुस्तान से जुड़े। यहां बतौर स्ट्रिंगर डेस्क पर करीब एक साल तक काम किया। इसके बाद वह कानपुर में ही दैनिक जागरण से जुड़े। 2012 में मुरादाबाद हिंदुस्तान जब लांच हुआ तो उसका हिस्सा भी बने। करीब दो साल यहां नौकरी करने के बाद दिनेश राजस्थान पत्रिका से जुड़ गए। सीकर जिले में दिनेश ने करीब तीन साल तक पत्रकारिता की। उन्होंने एक साल तक डिजिटल का काम भी किया। 2017 में दिनेश ने बरेली हिंदुस्तान में प्रिंट के डेस्क पर वापसी की। लगभग दो साल की सेवाओं के बाद डिजिटल हिंदुस्तान में काम करने का मौका मिला जिसका सफर जारी है।

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