जिनके खेत से हाईटेंशन तार गुजरे उन्हें मुआवजा देना जरूरी, किसानों को हाईकोर्ट ने दी बड़ी राहत

Dinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में किसानों को बड़ी राहत देते हुए हाईटेंशन बिजली लाइन के नीचे आने वाली जमीन के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया है।

जिनके खेत से हाईटेंशन तार गुजरे उन्हें मुआवजा देना जरूरी, किसानों को हाईकोर्ट ने दी बड़ी राहत

Allahabad Highcourt Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में किसानों को बड़ी राहत देते हुए हाईटेंशन बिजली लाइन के नीचे आने वाली जमीन के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया है। शामली के किसानों की याचिका पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने राज्य सरकार के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार किसानों को उचित मुआवजा दिया जाना अनिवार्य है।

शामली जिले के चार किसानों की जमीन पर हाईटेंशन बिजली ट्रांसमिशन लाइन डाली गई थी। टावर लगाने और तार खींचने से उनकी फसल, पेड़ और जमीन की कीमत प्रभावित हुई। पेड़ों और फसलों का आंशिक मुआवजा दिया गया, लेकिन तार के नीचे के कॉरिडोर क्षेत्र के लिए कोई मुआवजा नहीं दिया गया। किसानों ने कई बार प्रशासन से शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के आदेशों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाईटेंशन लाइन के कारण जमीन की उपयोगिता और कीमत में भारी कमी आती है। जमीन पर निर्माण, पेड़ लगाने और अन्य गतिविधियों पर रोक लग जाती है। ऐसे में बिना जमीन अधिग्रहण के भी मालिक के अधिकार प्रभावित होते हैं, इसलिए मुआवजा देना जरूरी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार (ऊर्जा मंत्रालय) के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि 15 अक्तूबर 2015 के आदेश में रो और टावर क्षेत्र के लिए मुआवजा तय किया गया था। 14 जून 2024 के नए आदेश में मुआवजा बढ़ाकर टावर बेस क्षेत्र के लिए 200 प्रतिशत भूमि मूल्य और रो क्षेत्र के लिए 30 प्रतिशत भूमि मूल्य कर दिया गया।

किसानों के हितों के खिलाफ है यूपी सरकार का रवैया

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार इन आदेशों को लागू करने में चयनात्मक रवैया नहीं अपना सकती। राज्य सरकार पुराने आदेश (2015) को लागू कर रही है, लेकिन नए (2024) आदेश को नजरअंदाज कर रही है। यह रवैया किसानों के हितों के खिलाफ है। सरकार मनमाने तरीके से मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकती। कोर्ट ने 10 मार्च 2026 का प्रशासनिक आदेश रद्द कर दिया और राज्य सरकार को 14 जून 2024 के केंद्र सरकार के दिशानिर्देश के अनुसार 4 सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया है।

Dinesh Rathour

लेखक के बारे में

Dinesh Rathour

दिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका (डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में कार्यरत दिनेश दिनेश, खबरों के पीछे की राजनीति और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स (वायरल वीडियो) को बारीकी से विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं।

पत्रकारिता का सफर
हरदोई ब्यूरो से करिअर की शुरुआत करने के बाद दिनेश ने कानपुर हिंदुस्तान से जुड़े। यहां बतौर स्ट्रिंगर डेस्क पर करीब एक साल तक काम किया। इसके बाद वह कानपुर में ही दैनिक जागरण से जुड़े। 2012 में मुरादाबाद हिंदुस्तान जब लांच हुआ तो उसका हिस्सा भी बने। करीब दो साल यहां नौकरी करने के बाद दिनेश राजस्थान पत्रिका से जुड़ गए। सीकर जिले में दिनेश ने करीब तीन साल तक पत्रकारिता की। उन्होंने एक साल तक डिजिटल का काम भी किया। 2017 में दिनेश ने बरेली हिंदुस्तान में प्रिंट के डेस्क पर वापसी की। लगभग दो साल की सेवाओं के बाद डिजिटल हिंदुस्तान में काम करने का मौका मिला जिसका सफर जारी है।

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