एथलेटिक्स में तीन बार नेशनल खेलने के बाद भी पीआरडी जवान बनने को विवश
Chandauli News - बरहनी ब्लॉक क्षेत्र के परसिया गांव के रहने वाले जंगबहादुर के शिष्य देश दुनिया में कर रहे नामएथलेटिक्स में तीन बार नेशनल खेलने के बाद भी पीआरडी जवान बन

धीना, हिन्दुस्तान संवाद। एथलेटिक्स में तीन बार नेशनल खेल चुके बरहनी ग्राम पंचायत के परसिया गांव निवासी जंगबहादुर को आर्थिक तंगी, पेट और परिवार की जरूरतों ने प्रांतीय रक्षक दल (पीआरडी) जवान बनने को मजबूर कर दिया। जिससे एक नेशनल खिलाड़ी का कॅरियर लगभग समाप्ति की ओर है। बरहनी ब्लॉक के परसिया गांव निवासी जंगबहादुर ने प्रतिभा और संघर्ष के बदौलत राष्ट्रीय स्तर पर 1993 में बंगलौर, 1994 में मद्रास और 1996 में मुंबई में तीन बाद एथलेटिक्स नेशनल खेल कर अपनी प्रतिभा साबित की, लेकिन घर चलाने और परिवार की जिम्मेदारियों के लिए उन्हें पीआरडी जवान बनना पड़ा। जंगबहादुर के कोचिंग पौधशाला से तीन बार नेशनल खेल चुके जंग बहादुर के कोचिंग पौधशाला से सिडनी ओलंपिक में भाग ले चुके पई गांव के संजय राय जैसे दिग्गज निकल चुके हैं।
संजय राय विश्व रेलवे खेल कूद प्रतियोगिता में तीन स्वर्ण पदक भी जीत चुके हैं। उनके शिष्य भारत भूषण नेशनल इंटर कालेज सैयदराजा में कोच हैं। वहीं नेवादा गांव निवासी सरिता यादव और प्रियांशी कबड्डी में स्टेट खेल अपने गुरु का नाम रोशन कर चुकी हैं। इसी तरह बरली गांव के हरिओम यादव लांग जंप में गुरु की प्रतिष्ठा को रोशन कर रहे हैं। उनके शिष्य वसीम अहमद आज बीएसएफ में कमांडेंट हैं तो लालसा पांडेय पीएसी में कंपनी कमांडेंट हैं। जबकि बरहनी गांव के विनय सिंह यूपीपी में सब इंस्पेक्टर बन क्षेत्र का नाम रोशन कर रहे हैं।वही इनके शिष्य नेवादा गांव के हरिओम सिंह को सेना एकेडमी के लिए चयन कर लिया है। यह खबर एक खिलाड़ी के संघर्ष को दर्शाती है, जो एथलेटिक्स तीन बार नेशनल स्तर पर खेल चुका है, लेकिन पेट और परिवार की जरूरतों के लिए उसे पीआरडी (प्रांतीय रक्षक दल) जवान बनना पड़ा। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे प्रतिभा के बावजूद आर्थिक तंगी खिलाड़ियों को दूसरा रास्ता चुनने पर मजबूर करती है, जहां उन्हें खेल से दूर होकर नौकरी करनी पड़ती है, जबकि राज्य सरकारें खेल और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने के दावे करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर अलग होती है।
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