होली है ... रंग बदले, अंदाज बदला, आत्मा वही
Bulandsehar News - -कई दिन पहले से शुरू हो जाती थी होली की मस्ती, सामूहिक रूप से होती थी होलिका दहन की तैयारियां-कई दिन पहले से शुरू हो जाती थी होली की मस्ती, सामूहिक रू

फाल्गुन मास की मस्ती और रंगों की बौछार का प्रतीक होली का त्योहार समय के साथ अपने स्वरूप में बदलाव देख रहा है। जहां एक ओर पुराने समय की होली सादगी, आत्मीयता और परंपराओं से सराबोर होती थी, वहीं आज की होली में आधुनिकता, तकनीक और बदलती जीवनशैली की छाप साफ दिखाई देती है। बीते दौर में होली का उत्सव कई दिनों पहले से शुरू हो जाता था। गांव-गांव में होलिका दहन की तैयारियां सामूहिक रूप से होती थीं। बच्चे टोलियां बनाकर लकड़ियां इकट्ठा करते थे और महिलाएं घरों में गुजिया, मठरी, दही बड़े जैसे पारंपरिक पकवान बनाती थीं। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था-टेसू के फूलों से बना केसरिया रंग, हल्दी और चंदन का लेप।
ढोलक और मंजीरे की थाप पर फाग गाए जाते थे। लोग घर-घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते और गले मिलकर बधाई देते थे। आपसी मनमुटाव भूलकर रिश्तों में मिठास घोलने का यह अवसर माना जाता था। आज की होली: डीजे, केमिकल रंग और सोशल मीडिया का दौर वर्तमान समय में होली का स्वरूप काफी हद तक बदल चुका है। पारंपरिक फाग की जगह डीजे और फिल्मी गीतों ने ले ली है। बाजारों में आकर्षक पैकेटों में मिलने वाले रंगों और पिचकारियों की भरमार है। हालांकि इन रंगों में रसायनों की मिलावट स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय भी बनती जा रही है। सोशल मीडिया के दौर में होली की शुभकामनाएं अब व्हाट्सऐप और फेसबुक पोस्ट के माध्यम से दी जाने लगी हैं। सेल्फी और रील्स के बीच त्योहार की आत्मीयता कहीं-कहीं कम होती नजर आती है। परंपरा और आधुनिकता का संतुलन जरूरी बुजुर्ग सूरजभान शर्मा का मानना है कि होली का असली आनंद आपसी मेल-जोल और सादगी में है। यदि आधुनिक साधनों के साथ पारंपरिक मूल्यों को जोड़ा जाए तो होली का त्योहार और भी सुखद बन सकता है। जरूरत है कि रासायनिक रंगों की बजाय हर्बल रंगों का प्रयोग किया जाए, पानी की बचत की जाए और त्योहार को सौहार्द व भाईचारे के साथ मनाया जाए। तभी होली अपने वास्तविक स्वरूप में समाज को जोड़ने का कार्य करती रहेगी। समय बदलता है, पर त्योहारों की आत्मा वही रहती है।
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