बोले काशी : खेल में साधते निशाना मगर सुविधा- सम्मान के प्लेटफार्म पर हैं बेगाना
डाट् र्स, एक ऐसा खेल जिसमें सटीक निशाना साधने की दक्षता जरूरी है, उन खिलाड़ियों के लिए भी उपयोगी है जो शारीरिक कारणों से मेनस्ट्रीम के खेल छोड़ चुके हैं। इसमें राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले कई खिलाड़ी हैं लेकिन उनका जुनून-उत्साह निजी स्तर तक सीमित है।

वाराणसी।दुनिया में डाट् र्स खेल की शुरुआत इंग्लैंड में मध्ययुगीन काल के दौरान हुई जब सैनिक प्रशिक्षण और मनोरंजन के रूप में पेड़ों के तनों पर छोटे तीर या भाले फेंकते थे। भारत में यह ब्रिटिश शासन के दौरान प्रचलित हुआ। बाद में क्लबों और मनोरंजक स्थलों के माध्यम से लोकप्रिय बना। इस खेल से जुड़े खिलाड़ियों के राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तर पर एसोसिएशन भी हैं मगर मौजूदा स्थिति में उनकी सक्रियता एवं भूमिका सीमित है। बनारस के खिलाड़ी उत्तर प्रदेश डार्ट्स गेम एसोसिएशन से जुड़े हैं जिसकी स्थापना 2024 में हुई थी। सिगरा में ‘हिन्दुस्तान’ के साथ बातचीत में उनका दर्द उभरा कि हमने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अपनी श्रेष्ठता तो दिखा दी, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा उन पर भारी पड़ती जा रही है। राष्ट्रीय खिलाड़ी अंकिता जेटली ने कहा कि डार्ट्स खिलाड़ियों के लिए एक सशक्त संबल है। यह मानसिक स्वास्थ्य और एकाग्रता को बेहतर करने का आयाम है। उन खिलाड़ियों के लिए नई उम्मीद है जो शारीरिक सीमाओं या अन्य कारणों से मुख्यधारा के मैदानी खेल छोड़ चुके हैं। बताया कि इस इंडोर गेम की सबसे बड़ी विशेषता इसका समावेशी स्वरूप है। सामान्य वर्ग के खिलाड़ियों के साथ दिव्यांग खिलाड़ी भी समान कौशल के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अशोक कुमार यादव ने कहा कि काशी के खिलाड़ियों ने अपनी मेधा के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सफर तय किया है, देश की झोली में पदक भी डाले हैं लेकिन वे अपने ही जिले में उपेक्षा के शिकार हैं। प्रशासनिक स्तर पर सम्मान और प्रोत्साहन राशि का अभाव खिलाड़ियों के मनोबल को तोड़ रहा है। बीते अप्रैल में मलेशिया की अन्तरराष्ट्रीय डार्ट्स प्रतियोगिता में भाग ले चुके राष्ट्रीय खिलाड़ी डॉ. संतोष पाण्डेय ने कहा कि ज्यादातर खिलाड़ी मध्यमवर्गीय या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। उनके लिए खेल के प्रति 100 प्रतिशत समर्पण के साथ अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारना दोहरी चुनौती है। ये खिलाड़ी बिना किसी सरकारी सहायता या स्कॉलरशिप के अपने खर्च पर अभ्यास करते हैं और प्रतियोगिताओं में भाग भी ले रहे हैं।
प्रशिक्षण का ठिकाना न सम्मान
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी महेशप्रताप ने बताया कि शहर के डॉ. संपूर्णानंद स्पोट् र्स स्टेडियम और लालपुर स्टेडियम में इस इंडोर खेल के लिए अलग से स्थान या बोर्ड रूम आवंटित नहीं है। शशिप्रकाश सिंह के मुताबिक समुचित जगह और बुनियादी ढांचे के अभाव में खिलाड़ियों को कमरों में अभ्यास करने को मजबूर होना पड़ रहा है। बोले, सबसे गंभीर समस्या कोच की अनुपलब्धता है। बिना तकनीकी मार्गदर्शन के खेल की बारीकियों और अंतरराष्ट्रीय नियमों को सीखना खिलाड़ियों के लिए गंभीर चुनौती है। उचित प्रशिक्षण केंद्र न होने से नई प्रतिभाएं खेल में पिछड़ रही हैं। दिव्यांग राष्ट्रीय खिलाड़ी संतोष पाण्डेय ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा कि सिगरा स्टेडियम में प्रवेश करना आसान नहीं है।
चिकित्सा सुरक्षा का अभाव
राष्ट्रीय खिलाड़ी वंदना मल्होत्रा के मुताबिक डार्ट्स मानसिक अवसाद और तनाव से जूझ रहे लोगों के लिए एक थेरेपी भी साबित हो रहा है। एकाग्रता और रणनीति पर आधारित इस खेल ने कई ऐसे लोगों को नई राह दिखाई है, जो लंबे समय से मानसिक या अन्य बीमारियों से जूझ रहे थे। खिलाड़ी ओमप्रकाश पटेल ने बताया कि खिलाड़ियों के लिए सबसे बड़ी बाधा चिकित्सा सुविधाओं का अभाव है। किसी भी निजी अस्पताल में इलाज में कोई रियायत नहीं मिलती है। आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों को बीमारी में महंगे निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है, जो बजट से बाहर होता है। अशोक कुमार यादव ने कहा कि जब यह खेल लोगों को मानसिक रूप से स्वस्थ बना रहा है तो उससे जुड़े खिलाड़ियों को बुनियादी स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी तो मिलनी ही चाहिए। प्रशासन की यह अनदेखी खेल के प्रति जुनून को कमजोर कर रही है।
निजी सहयोग का भरोसा
अंकिता ने बताया कि खेल को जीवित रखने के लिए खिलाड़ी और स्थानीय आयोजक अपनी जेबें ढीली करने को मजबूर हैं क्योंकि जिले में इस खेल के लिए सरकारी प्रोत्साहन शून्य है। जनपद में टूर्नामेंटों का आयोजन निजी सहयोग और खिलाड़ियों के आपसी मदद के भरोसे होता है। इस कारण बड़े स्तर की प्रतियोगिताएं कराना आसान नहीं है। महेशप्रताप बोले, इस खेल के लिए न तो किसी जनप्रतिनिधि ने अपना हाथ आगे बढ़ाया है और न ही खेल विभाग की ओर से कोई फंड या अनुदान आवंटित किया जाता है। संसाधनों और आर्थिक सहयोग के अभाव में टूर्नामेंटों की संख्या लगातार घट रही है। इससे नए खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। खिलाड़ी विराट मल्होत्रा ने कहा कि नियमित अंतराल पर प्रतियोगिताएं आयोजित नहीं होंगी तो नई पीढ़ी इस खेल की ओर आकर्षित नहीं होगी।
सफर की दुश्वारियां
डॉ. संतोष पाण्डेय ने कहा कि खिलाड़ियों के लिए पदक जीतना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण एक शहर से दूसरे शहर तक का सफर है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर जिले का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद हमें यातायात के सुरक्षित और सुलभ साधन उपलब्ध नहीं हैं। डार्ट्स के दिव्यांग खिलाड़ियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। अशोक कुमार यादव ने बताया कि ट्रेनों के विकलांग कोचों में भारी भीड़ और अव्यवस्था के कारण बैठने की जगह नहीं मिलती। धक्के खाते हुए यात्रा करने से खिलाड़ियों में भारी शारीरिक और मानसिक थकान भर जाती है,। उसका सीधा असर मैदान में उनके प्रदर्शन पर पड़ता है। सफर की थकावट अक्सर एकाग्रता और जीत के बीच सबसे बड़ा रोड़ा बन जाती है। वहीं, सामान्य वर्ग के खिलाड़ियों के लिए भी सफर आसान नहीं है। रेलवे की ओर से इस खेल के खिलाड़ियों को कोई रियायत या कोटा नहीं दिया जाता है। खिलाड़ियों को अपनी यात्रा का पूरा बोझ खुद ही उठाना पड़ता है।
जागरूकता का अभाव
शशिप्रकाश सिंह ने बताया कि डार्ट्स का खेल अपनी सरलता और गहरे मानसिक लाभों के बावजूद जन-जागरूकता के अभाव से जूझ रहा है। इस खेल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे खेलने के लिए किसी बड़े मैदान या महंगे संसाधनों की आवश्यकता नहीं पड़ती। घर का एक कोना और बिसात ही इसके अभ्यास के लिए पर्याप्त है। तनिष्क मल्होत्रा और पूनम सेठ बोलीं, सही जानकारी न होने के कारण शहर की बड़ी आबादी खेल की इस विधा से वंचित है। यदि स्कूली पाठ्यक्रम में डार्ट को एक विषय के रूप में जोड़ा जाए, तो न केवल विद्यार्थियों की एकाग्रता और तार्किक क्षमता बढ़ेगी बल्कि उनकी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान में भी यह खेल प्रभावी थेरेपी के रूप में काम कर सकता है। अंकिता ने कहा कि विद्यार्थियों के बीच इस खेल को बढ़ावा देने से नई प्रतिभाएं सामने आएंगी।
सटीक निशानेबाजी का खेल
डाट् र्स सटीक निशाना लगाने का खेल है। इसमें खिलाड़ी 7 फीट 9.25 इंच (2.37 मीटर) की दूरी से बोर्ड पर डार्ट फेंकते हैं। सबसे लोकप्रिय खेल ‘501’ है, जहां खिलाड़ी 501 अंकों से शुरू करते हैं और प्रत्येक बारी (3 डार्ट) में प्राप्त स्कोर घटाते हैं। खेल जीतने के लिए खिलाड़ी को ठीक शून्य (0) पर पहुंचना होता है। इसके लिए अंतिम डार्ट का डबल रिंग या बुल्सआई में लगना अनिवार्य है। भारत में डाट् र्स का प्रचलन अंग्रेजों के आगमन के साथ शुरू हुआ। यह मुख्य रूप से ब्रिटिश आर्मी क्लबों और औपनिवेशिक स्थलों में खेला जाता था। देश के बड़े शहरों में यह खेल पब और बार संस्कृति के साथ लोकप्रिय हुआ।
एक नजर में
-200 के आसपास खिलाड़ी हैं डाट् र्स के बनारस में
-12 दिव्यांग खिलाड़ी खेलते हैं डाट् र्स
हमारी भी सुनें
1. डाट् र्स खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर देश का मान बढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने ही जिले में कोई प्रोत्साहन राशि नहीं मिलती।
- महेशप्रताप
2. दिव्यांग खिलाड़ियों को रेलवे के विकलांग कोच में भी जगह नहीं मिलती, उन्हें धक्के खाते हुए दूसरे शहरों में खेलने जाना पड़ता है।
- डॉ. संतोष पाण्डेय
3. सिगरा स्टेडियम में प्रवेश के लिए दिव्यांग खिलाड़ियों को जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिए नियम समान हो।
- अशोक कुमार यादव
4. बिना कोच और उचित प्रशिक्षण केंद्र के अंतरराष्ट्रीय स्तर की बारीकियां खिलाड़ियों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं।
- शशिप्रकाश सिंह
5. वाराणसी के प्रमुख स्टेडियम, चाहे वह सिगरा हो या लालपुर में डाट् र्स के अभ्यास के लिए स्थान आवंटित नहीं किया गया है।
- प्रेम कुमार
6. मानसिक स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित होने वाले खेल के खिलाड़ियों को सरकारी चिकित्सा सुविधा या रियायत नहीं दी जाती है।
- अंकिता जेटली
7. जनप्रतिनिधियों और खेल विभाग से कोई फंड न मिलने के कारण जिले में टूर्नामेंट कराना अब बेहद मुश्किल होता जा रहा है।
- वंदना मल्होत्रा
8. जब तक नियमित टूर्नामेंट नहीं होंगे, तब तक नई पीढ़ी डाट् र्स को अपनाने के लिए आगे नहीं आएगी। लोगों में जागरूकता का अभाव है।
- ओमकैलाश सेठ
9. प्रशासनिक उपेक्षा के कारण पदक विजेता खिलाड़ियों का मनोबल टूट रहा है। वे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में विफल हैं।
- संतोष पाण्डेय
10. रेलवे की ओर से सामान्य खिलाड़ियों को भी कोई सुविधा नहीं दी जाती, जिससे आवाजाही का आर्थिक बोझ उठाना अब नामुमकिन है।
- पूनम सेठ
11. यदि डाट् र्स को स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए, तो इससे विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होगा। नए खिलाड़ी खेल से जुड़ेंगे।
- विराट मल्होत्रा
12. डाट् र्स खिलाड़ियों को प्रशासन से कोई सहायता नहीं मिलती है। उन्हें सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण भी नहीं मिलता है।
- तनिष्क मल्होत्रा
सुझाव और शिकायतें
सुझाव
1. डाट् र्स में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को प्रशासन की ओर से प्रोत्साहन राशि मिले, उनका सम्मान होना चाहिए।
2. सिगरा और लालपुर स्टेडियमों में डाट् र्स खेल के अभ्यास के लिए एक समर्पित इनडोर हॉल और खेल कोच की नियुक्ति होनी चाहिए।
3. डाट् र्स के दिव्यांग और सामान्य खिलाड़ियों को जिले के अस्पतालों में मुफ्त इलाज और अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा कार्ड की सुविधा दी जाए।
4. खेल विभाग और जनप्रतिनिधियों को डाट् र्स टूर्नामेंटों के आयोजन के लिए विशेष बजट और फंड आवंटित करना चाहिए। इससे खिलाड़ियों का जुड़ाव बढ़ेगा।
5. ट्रेनों में डाट् र्स खिलाड़ियों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था हो। इसके अलावा, किराए में उचित रियायत दी जानी चाहिए।
शिकायतें
1. पदक विजेता खिलाड़ियों को न तो आर्थिक सहायता दी जा रही है और न ही उनका मनोबल बढ़ाने के लिए प्रशासनिक पहल होती है।
2. स्टेडियम में जगह न मिलने के कारण खिलाड़ी बिना कोच के खेल सीखने को मजबूर हैं, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित होता है।
3. चिकित्सा सुविधा में रियायत न मिलने के कारण आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों को महंगे दामों पर इलाज कराना पड़ता है।
4. कोई फंड न मिलने से निजी तौर पर टूर्नामेंट कराना बेहद मुश्किल हो गया है। इससे नए खिलाड़ियों को मंच नहीं मिल पा रहा है।
5. दिव्यांग खिलाड़ियों को विकलांग कोच में जगह नहीं मिलती है। धक्के खाते हुए यात्रा का उनके प्रदर्शन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।


