
बोले काशी : आस्था पर गहराता गंदगी और दुर्गंध का ग्रहण
वरुणा किनारे भी कई स्थानों पर लोक आस्था के महापर्व छठ की धूम दिखती है। व्रती महिलाओं और उनके परिजनों की आस्था के आलोक में चार दिवसीय पूजन के सभी विधान पूरी तन्मयता के साथ पूरे किए जाते हैं। वरुणा के मशीनीबीर घाट पर इस बार भी व्रतियों की वेदियां और उनके परिजनों की चहल-पहल शुरू हो चुकी है।
फुलवरिया क्षेत्र के मशीनीबीर घाट पर भी छठ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है। वरुणा यहां जहरीले नाले में तब्दील हो चुकी है। उसमें व्रती महिलाएं डुबकी लगाने से डरती हैं। 15 हजार भक्तों के लिए यहां न पक्की सड़क है, न शुद्ध पेयजल, न ही बिजली की रोशनी और न एनडीआरएफ की तैनाती होती है। जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते आस्था के इस तट पर आस्था का हर वर्ष दुर्व्यवस्थाओं से संघर्ष दिखता है। मशीनीबीर बाबा मंदिर के बगल में डाला छठ पूजनोत्सव समिति के सदस्यों और व्रती महिलाओं ने ‘हिन्दुस्तान’ के साथ बातचीत में अपने अनुभव साझा किए। बोलीं, पौराणिक महत्व की वरुणा का पानी आचमन करने योग्य भी नहीं रह गया है। इस कारण महापर्व छठ की परंपरा प्रभावित हो रही है। व्रती महिलाएं दूषित नाले के बगल में ऊबड़-खाबड़ कीचड़ भरे रास्ते से उतरती हैं। अध्यक्ष सुशील शर्मा ने कहा कि इस घाट पर एनडीआरएफ की बोटिंग हार्वेस्टिंग कभी नहीं होती। न सीढ़ियां, न बिजली, न शुद्ध पानी।

अब परंपरा निभाना भी कठिन
उपाध्यक्ष पार्वती कन्नौजिया ने बताया कि हम घर से ही स्नान करके आते हैं। नदी के किनारे खड़े होकर केवल परंपरा का निर्वहन करते रहे हैं। अब गंदगी के चलते परंपरा का निर्वहन भी संभव नहीं हो पा रहा है। पुष्पा राय, सरोज पाण्डेय और शशिकला भारती ने बताया कि अनेक व्रती महिलाएं अपने घरों पर ही टब में साफ पानी भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य देती हैं। छठ पर्व के लिए घाटों की सफाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन वरुणा के जल को शुद्ध करने की दिशा में ठोस कदम न उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
आस्था तट पर गंदगी का ग्रहण
कोषाध्यक्ष शैलेश पाण्डेय ने कहा कि घाट से सटा एक किलोमीटर लंबा गंदा नाला इस महापर्व की पवित्रता को दूषित करता है। नाला पूरे क्षेत्र का मलजल वरुणा नदी में गिराता है। अनिल दूबे, आकाश यादव बोले कि नाला के जरिए मरे हुए पशु भी बहते हुए नदी में पहुंचते हैं। महिलाएं इसी नाले से सटकर छठ पूजा के लिए खड़ी होती हैं।
पक्की सड़क की कमी
व्रती महिलाओं ने बताया कि घाट तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है। डाला छठ पूजनोत्सव समिति के सचिव रामाश्रय ने कहा, हर साल छठ के दौरान कच्चा रास्ता और कीचड़ चलना दूभर हो जाता है। कई व्रती घाट तक लेटकर (दंडवत प्रणाम करते हुए) पहुंचने की परंपरा का निर्वहन करती हैं। उन्हें कीचड़ और पत्थरों के बीच से होकर गुजरना पड़ता है। जितेन्द्र मिश्रा ने बताया कि हर साल नगर निगम की ओर से कोई सुविधा न मिलने पर हम सभी आपस में पैसा जुटा कर इस कच्चे रास्ते को चलने लायक बनाते हैं।
पेयजल का नहीं है इंतजाम
वीरेन्द्र कुमार, मनोज कश्यप के मुताबिक पूरे घाट क्षेत्र में पेयजल की व्यवस्था नहीं है। श्रद्धालुओं की प्यास बुझाने और पूजा अनुष्ठान के लिए एकमात्र स्रोत मंदिर के बगल में लगा हैंडपंप है। लेकिन वह हैंडपंप भी दूषित पानी देता है। उन्होंने बताया, आसपास अत्यधिक प्रदूषण के कारण भूजल भी दूषित हो गया है। इसका असर हैंडपंप के पानी पर पड़ रहा है। शुद्ध जल के बिना आस्था के इस महापर्व को संपन्न करना श्रद्धालुओं के लिए बड़ी चुनौती है।
निजी खर्च से रोशनी का इंतजाम
छठ पूजनोत्सव समिति के सदस्यों ने बताया कि महापर्व के दौरान घाट और इससे जुड़े रास्तों पर प्रशासन की ओर से स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था नहीं की जाती। वीरेन्द्र मौर्या ने कहा कि अंधेरे के कारण व्रतियों और बच्चों के घाट पर या रास्ते में फिसलने का खतरा रहता है। अश्विनी दूबे, गोविन्द यादव ने बताया कि हर साल छठ पूजनोत्सव समिति और स्थानीय निवासी निजी खर्च पर अस्थायी प्रकाश की व्यवस्था करते हैं। जेनरेटर किराये पर लेते हैं ताकि श्रद्धालुओं को अंधेरे से परेशानी न हो।
जिम्मेदारों की उपेक्षा भारी
मशीनीबीर बाबा मंदिर स्थित छठ घाट की चौतरफा दुर्दशा के पीछे स्थानीय लोग अब प्रशासनिक अज्ञानता और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा को जिम्मेदार ठहराते हैं। मुकेश पाल ने कहा कि इतनी बड़ी आबादी वाले क्षेत्र की समस्याओं की स्थानीय जनप्रतिनिधियों को पूरी जानकारी ही नहीं है। इस कारण घाट पर भी नहीं दिया जा रहा है। अजित सिंह बोले, हमारे प्रतिनिधि पता होता कि यहां 15 हजार से अधिक लोग छठ पूजा करने आते हैं तो क्या यह घाट पर गंदगी रहती, रास्ते अब तक कच्चे रहते और स्ट्रीट लाइटें नहीं लगतीं?
महापर्व पर सुरक्षा नदारद
छठ पूजनोत्सव समिति के सदस्यों के मुताबिक छठ पूजन के दौरान प्रशासन की ओर से घाट पर एनडीआरएफ या किसी भी तरह की बचाव की व्यवस्था नहीं की जाती है। सुशील शर्मा ने कहा कि वरुणा के इस घाट परजलस्तर अक्सर अप्रत्याशित रूप से बढ़ता-घटता रहता है। नदी के किनारे दलदल और सिल्ट होने के कारण फिसलन भी बहुत होती है। शुभम सिंह ने कहा कि व्रती महिलाएं नदी के दूषित जल में उतरती हैं। उसदौरान आपात स्थिति से तत्काल बचाव के लिए कोई मौजूद नहीं होता। इस घाट पर न गोताखोर तैनात होता है और न ही बचाव के लिए नाव रखी जाती है।
पथरीले रास्ते पर आस्था का सफर
पिंटू कश्यप, राम प्रजापति ने कहा कि घाट पर सौंदर्यीकरण के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है। घाट की सीढ़ियों का निर्माण न होने से हजारों व्रती महिलाओं को हर साल भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। छठ पूजन के दौरान 10 से 15 हजार श्रद्धालु यहां जुटते हैं। इनमें बड़ी संख्या में बुजुर्ग और शारीरिक रूप से कमजोर महिलाएं भी होती हैं। भागवती देवी ने कहा कि नदी के पानी तक पहुंचने और बाहर निकलने के लिए ऊबड़-खाबड़, फिसलन भरे किनारों पर चढ़ना-उतरना पड़ता है। व्रतियों के परिवार के सदस्य जब सूप, गन्ना और पूजा की अन्य भारी सामग्री लेकर घाट के किनारे पहुंचते हैं तो सीढ़ियों के अभाव में समतल जगह तक पहुंचाना दुष्कर हो जाता है। स्मृति और श्रुति ने कहा कि सौंदर्यीकरण की बातें केवल गंगा घाटों तक सीमित हैं। वरुणा के इस महत्वपूर्ण घाट पर एक सीढ़ी तक नहीं बन पाई है। रामाश्रय पाल, शैलेश पाण्डेय और रामाश्रय पाल बोले, वरुणा नदी कॉरिडोर के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए लेकिन मशीनीबीर घाट पर विकास का एक भी काम नहीं हुआ है।
1. वरुणा में लगातार शहर भर का सीवर गिर रहा है। इस कारण नदी का जल आचमन योग्य नहीं है।
- पार्वती कन्नौजिया
2. गंदे पानी में लाखों व्रतियों को सूर्यदेव को अर्घ्य देना पड़ता है। नगर निगम सफाई नहीं कराता है।
- सरोज पाण्डेय
3. हर साल 10 से 15 हजार लोग घाट पर पूजा करने आते हैं। नाले को एसटीपी से अब तक नहीं जोड़ा गया है।
- रामाश्रय पाल
4. वरुणा नदी शहर के नालों का भार ढोते-ढोते एक गंदे नाले में तब्दील होती जा रही है।
- सुशील शर्मा
5. आस्था के इस महत्वपूर्ण केंद्र पर नगर निगम ने हजारों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत किया है।
- शैलेश पाण्डेय
6. घाट पर स्वच्छता के बजाय हर कदम पर गंदगी और असुविधा का सामना करना पड़ता है।
- मनोज कश्यप
7. घाट पर पेयजल का सरकारी इंतजाम नहीं है। मंदिर के बगल में लगा हैंडपंप भी दूषित पानी देता है।
- शुभम सिंह बागी
8. प्रशासन की तरफ से घाट समेत घाट तक जाने वाले रास्तों पर प्रकाश का इंतजाम नहीं किया जाता।
-जितेंद्र मिश्रा
9. हमें अपनी जेब से पैसा खर्च करके जेनरेटर चलाना पड़ता है ताकि हजारों लोगों को अंधेरे में पूजा न करनी पड़े।
- वीरेन्द्र कुमार
10. जनप्रतिनिधियों की उदासीनता का खामियाजा व्रती महिलाओं और स्थानीय निवासियों को भुगतना पड़ रहा है।
- पुष्पा राय
11. पर्व के दौरान दूसरे बड़े घाटों पर सुरक्षा के इंतजाम किए जाते हैं लेकिन मशीनीबीर घाट की घोर उपेक्षा होती है।
- अश्विनी दूबे
12. घाट की मिट्टी कच्ची है, जिससे हमेशा फिसलने और चोट लगने का खतरा रहता है।
- शशिकला भारती
13. सौंदर्यीकरण दूर, घाट पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़ियों का निर्माण तक नहीं कराया गया है।
- अजीत सिंह
14. प्रशासन स्थायी रूप से स्ट्रीट लाइटें लगवाए, ताकि हजारों व्रती सुरक्षित माहौल में महापर्व मना सकें।
- जिलाजीत सिंह यादव
सुझाव और शिकायतें
सुझाव
1. मशीनीबीर घाट के पास एक किलोमीटर नाले के बहाव को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की ओर मोड़ा जाए।
2. घाट तक पहुंचने वाले मुख्य रास्ते को तत्काल पक्का बनाया जाए। नदी किनारे से गंदगी हटाई जाए, ताकि व्रती सुरक्षित और स्वच्छ माहौल में पूजन कर सकें।
3. घाट पर जलकल की ओर से स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। छठ पर्व के दौरान साफ पानी के टैंकर भिजवाए जाएं।
4. घाट और रास्ते पर स्ट्रीट लाइटें लगाई जाएं। छठ पर्व के दौरान निर्बाध विद्युत आपूर्ति की जाए।
5. छठ पूजन के दौरान घाट पर एनडीआरएफ/गोताखोर टीम की स्थायी तैनाती हो और खतरनाक क्षेत्रों में बैरिकेडिंग की जाए।
शिकायतें
1. मशीनीबीर घाट से सटा एक किलोमीटर लंबे नाले से क्षेत्र का सारा मलजल वरुणा में गिरता है।
2. घाट तक पक्की सड़क नहीं है। व्रती, उनके परिजन कचरे और मिट्टी के कच्चे रास्ते से आते हैं। निजी खर्च से अस्थायी रास्ता बनता है।
3. घाट पर प्रशासन या नगर निगम की ओर से पेयजल की व्यवस्था नहीं होती। मंदिर के पास लगा हैंडपंप दूषित पानी देता है।
4. घाट पर और रास्ते में स्ट्रीट लाइट न होने से अंधेरे में असुरक्षा महसूस होती है। निजी खर्च पर जनरेटर चलाना पड़ता है।
5. छठ पूजा के दौरान एनडीआरएफ की तैनाती की जाती है। सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं देता है।





