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बोले काशी - ग्रामीण महिलाओं को मदद-संवेदना की अधिक दरकार

बोले काशी - ग्रामीण महिलाओं को मदद-संवेदना की अधिक दरकार

संक्षेप:

महिला सशक्तिकरण का पहले खुद मतलब समझा, उससे जुड़े कानूनों-योजनाओं की जानकारी ली। तब लगा कि हमारी जैसी तो ग्रामीण क्षेत्र में अनगिनत महिलाएं हैं जो घरेलू हिंसा की आए दिन शिकार होती हैं। वे नहीं जानतीं कि उनकी तंगी और असुरक्षा की असल वजहें क्या हैं। 

Sun, 26 Oct 2025 06:21 PMSandeep Kumar Shukla लाइव हिन्दुस्तान
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वाराणसी। जिले में विभिन्न स्वयंसहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं का एक वर्ग ‘जागरण-सखी’ की भूमिका निभा रहा है। इस भूमिका के लिए उन्होंने पहले खुद को तैयार किया। उन्हें समूह संचालकों से मदद मिली। अब वे गांव-गांव पहुंचकर महिलाओं को घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, संपत्ति में अधिकार, शिक्षा का महत्व और कानूनी सहायता जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां दे रही हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ाव के नाते उन्हें जानने-समझने में देर नहीं लगी कि महिला सशक्तिकरण की राह में बाधाएं कौन-कौन सी हैं। भुल्लनपुर के भास्करा तालाब के पास एक ट्रस्ट के कार्यालय परिसर में जुटीं महिलाओं ने ‘हिन्दुस्तान’ के साथ बातचीत में अपने अनुभव साझा किए। गीता ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में नशे की आसान उपलब्धता घरेलू हिंसा की मुख्य वजह बनती जा रही है। उनके मुताबिक सखी वन स्टॉप सेंटरों से अपेक्षित मदद नहीं मिल पाती। प्रभावती बोलीं, ग्रामीण महिलाएं न तो रोजगार के लिए गुणवत्तापूर्ण ट्रेनिंग ले पा रही हैं और न ही उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता के अधिकार की जानकारी है। नतीजतन, वे आर्थिक तंगी और सामाजिक असुरक्षा के दोहरे बोझ तले दबी हैं। इन झंडाबरदारों के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को पता नहीं होता कि घरेलू हिंसा या किसी तरह के उत्पीड़न की शिकायत कहां और कैसे दर्ज करानी है। इसलिए उन्हें प्रशासनिक और आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता।

नाम बड़ा, काम छोटा!

धनपति ने कहा कि मनरेगा योजना के तहत साल में 100 दिन के काम की गारंटी है लेकिन हमें साल में औसतन 16-17 दिन ही काम मिल पा रहा है। इसके चलते कई श्रमिकों और उनके परिवारों के सामने भुखमरी का संकट है। लक्ष्मी, भागमनी बोलीं कि यह समस्या केवल काम न मिलने तक सीमित नहीं है। जो थोड़ा-बहुत काम मिलता है, उसका भी भुगतान समय पर नहीं होता। उन्हें अपनी मजदूरी के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है।

चुनिंदा महिलाओं को लाभ

बिंदु देवी ने कहा कि स्वयंसहायता समूह में कोटे का आवंटन पारदर्शी नहीं है जिससे सभी को बराबर मौका मिल सके। रीता बोलीं, ऐसा लगता है, समूह कुछ परिवारों के आर्थिक लाभ का माध्यम बनते जा रहे हैं। नियुक्ति केवल कुछ महिलाओं तक ही सीमित है। उन्होंने बताया कि आरक्षित श्रेणी की महिलाओं के लिए तय कोटे या पदों पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाएं काबिज हो जाती हैं। समूह में एसी/एटी महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाम मात्र का है। लाभ भी उन महिलाओं को मिलता है जो प्रभावशाली हैं।

सीमित आय से मुश्किलें

रचना और रीता ने बताया कि प्रदेश के अन्य जिलों में सरकारी राशन की दुकान से प्रति कुंतल ₹200 रुपये तक का कमीशन मिलता है। वहीं बनारस में उन्हें प्रति कुंतल केवल ₹90 रुपये ही मिलते हैं। बदामा देवी, अर्चना देवी ने बताया कि महिलाओं की मासिक आय सिमट कर ₹3,000 से ₹4,000 रुपये तक रह गई है। इससे परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो गया है। संपति, सीमा ने कहा कि हमें समूह से जुड़कर आत्मनिर्भर बनना था लेकिन इतनी कम आय में हम बचत करना तो दूर, सम्मानजनक जीवन भी नहीं जी पा रहे हैं। समूह की महिलाओं की आय वर्तमान महंगाई दर के अनुपात में बढ़ना चाहिए।

बढ़े आर्थिक सुरक्षा घेरा

पूनम ने जोर देते हुए कहा कि वृद्धा पेंशन योजना का लाभ उठाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धारित सालाना आय सीमा ₹50 हजार की जगह 36,000 रुपये होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा मानक बहुत पुराने हैं। यह सीमा इस महंगाई के दौर में अनेक जरूरतमंद महिलाओं को योजना के लाभ से वंचित कर रही है। लक्ष्मीना, सोमरी देवी ने कहा कि आय सीमा बढ़ने से मध्यम वर्ग के निम्न तबके की बुजुर्ग महिलाएं भी पेंशन का लाभ पा सकेंगी। अमरकला, उर्मिला ने कहा कि विधवा महिलाओं की मासिक पेंशन राशि ₹1,000 रुपये है। पति को खो चुकी ये महिलाएं अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं। वसंती ने कहा, इतनी कम राशि में दवा, भोजन और बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाना मुश्किल है। पेंशन राशि कम से कम ₹3,000 प्रति माह होनी चाहिए।

पेंशन की दोहरी नीति क्यों

रचना ने पेंशन की दोहरी नीति पर सवाल उठाया। बोलीं, एक ओर पूर्व सांसद, पूर्व विधायक दो या उससे अधिक पेंशन लेने के हकदार होते हैं। वहीं, कमजोर वर्ग की महिलाएं वृद्धावस्था और विधवा पेंशन, दोनों की पात्रता रखती हैं। मगर उन्हें अक्सर एक ही पेंशन पर गुजारा करने के लिए मजबूर किया जाता है। अनिता, गीता ने कहा कि दोनों पेंशन की राशि बहुत कम है। इस नियम के कारण बेसहारा महिलाएं पर्याप्त आर्थिक सहायता से वंचित रह जाती हैं।

प्रभावी बने हेल्प डेस्क, हेल्पलाइन

परमा और बिंदु ने कहा कि थाने में बनी महिला हेल्प डेस्क और महिला हेल्पलाइन सेवाएं निष्क्रिय हैं। इस कारण ग्रामीण महिलाओं को समय पर अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। बताया कि डेस्क पर मौजूद महिला कर्मियों का व्यवहार अक्सर उदासीन होता है। छोटी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार बिना कार्रवाई के वापस भेज दिया जाता है। ज्योति ने बताया कि महिला हेल्पलाइन नंबर 1090 पर संपर्क करने पर एक तो जल्द कॉल नहीं लगती। दूसरे, पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मिलता है। हमें घरेलू हिंसा या छेड़खानी की शिकायत करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।

फंड मिला पर रोजगार नहीं

प्रियंका, पूनम देवी ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों को लाखों का फंड और ऋण दिया जा रहा है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर महिलाओं के लिए स्थायी और लाभकारी रोजगार के अवसर नहीं हैं। महिलाएं आचार- पापड़, धूपबत्ती-मोमबत्ती, वस्त्र आदि उत्पाद तो बना लेती हैं लेकिन उनके पास अपने माल को प्रतिस्पर्धी बाजारों तक पहुंचाने का ठोस तंत्र नहीं है। सरिता देवी ने कहा कि लाभ न होने पर समूह बैंक ऋण को चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं।

प्रशिक्षण केंद्र दूर-दूर

परमा देवी ने कहा कि सरकार राष्ट्रीय आजीविका मिशन और कौशल विकास योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण केंद्रों की भारी कमी है। यह कमी महिलाओं के हुनरमंद बनने और स्थायी रोजगार की राह में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। बोलीं, प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक समर्पित, सुसज्जित कौशल विकास उपकेंद्र स्थापित होना चाहिए।

नशे के कारोबार पर लगे पूर्ण प्रतिबंध

महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि गुजरात और बिहार की तर्ज पर अपने प्रदेश एवं जिले में भी नशीले पदार्थों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। ज्योति, निधि ने कहा कि परिवार के पुरुष सदस्य नशा के बाद घर में उन्हें मारते-पीटते हैं। भागमानी, मोनी ने कहा कि नशे पर पैसा खर्च होने के कारण गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति बदतर हो जाती है। इससे बच्चों को शिक्षा और पोषण नहीं मिल पाता। नशे का विरोध करने पर महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ता है।

कानूनी अधिकारों से हैं अंजान

राष्ट्रीय और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों की ओर से महिलाओं को अदालत शुल्क, वकील की फीस आदि खर्चों से मुक्ति मिलती है। रचना और प्रभावती ने कहा कि इसके बारे में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को अमूमन जानकारी नहीं होती है। अधिकांश पीड़ित महिलाएं इस महत्वपूर्ण सेवा से अंजान हैं। धनपति देवी, अर्चना देवी ने कहा कि वन स्टॉप सेंटर में कानूनी और मनोवैज्ञानिक मदद का प्रावधान है लेकिन महिलाएं अक्सर इन केंद्रों पर केवल परामर्श तक सीमित रह जाती हैं। लक्ष्मी देवी, बासमती और नीलम ने भी कहा कि गंभीर मामलों में भी परामर्श के बाद फाइल बंद कर दी जाती है। सखी वन स्टॉप सेंटर को आपातकालीन चिकित्सा सहायता, पुलिस सहायता, कानूनी परामर्श, मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग और अस्थायी आश्रय देने के लिए डिजाइन किया गया था लेकिन कई सेंटरों में कमियां साफ दिखती हैं।

हमारी बात सुनें

1. जब महिलाएं अपने अधिकार जानेंगी, तभी वे समाज में सम्मान के साथ सिर उठाकर जी पाएंगी।

- रचना

2. मनरेगा अब रोजगार की गारंटी नहीं, बल्कि आर्थिक तंगी की गारंटी बन गई है।

- प्रियंका

3. राशन पर कमीशन की दर बढ़ाकर अन्य जिलों के बराबर यानी ₹200 प्रति कुंतल किया जाए।

- बिंदु कुमारी

4. मनरेगा से साल में 100 दिन का रोजगार मिलना चाहिए। अभी 17 दिन का काम भी मुश्किल से मिलता है।

- गीता

5. उचित पेंशन राशि महिलाओं को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहने देगी।

- लक्ष्मी

6. मिशन शक्ति केवल शहर के बड़े कार्यक्रमों तक सीमित है। ग्रामीण महिलाओं तक नहीं पहुंचा है।

- सीमा

7. स्वयंसहायता समूह में कोटा आवंटन और रोजगार वितरण की प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए।

- रीता

8. महिला हेल्पलाइन सेवाओं की सक्रियता बढ़े। ड्यूटी पर तैनात कर्मियों की जवाबदेही तय की जाए।

- पूनम देवी

9. प्रत्येक समूह को ऐसा व्यवसाय मॉडल दिया जाए जो स्थानीय बाजार की जरूरतों के अनुरूप हो।

- अर्चना देवी

10. मेरे पति मनरेगा में काम करते थे, लड़का भी काम कर रहा था लेकिन कुछ महीने पहले उसका नाम सूची से कट गया।

- उर्मिला

11. जब महिलाओं के पास सही कौशल नहीं होता तो वे ऋण का सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं।

- सरिता देवी

12. जिले में सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए, जहां नशे के आदी व्यक्तियों का उचित उपचार हो सके।

- दीपा

सुझाव और शिकायतें

सुझाव

1. सरकार को गुजरात और बिहार की तर्ज पर नशीले पदार्थों की बिक्री पर सख्त रोक लगानी चाहिए। नि: शुल्क नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र खोलने चाहिए।

2. महिला एवं बाल विकास विभाग ग्राम पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण दे। महिलाओं को 6 माह तक बाजार से जोड़ने के लिए सब्सिडी मिले।

3. प्रत्येक वन स्टाप सेंटर में निर्धारित स्टाफ की तुरंत नियुक्ति हो। वहां कानूनी सहायता और पुलिस कार्रवाई को प्राथमिकता मिले।

4. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को हर महीने ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता कैंप लगाना चाहिए। हेल्पलाइन नंबर का व्यापक प्रचार भी हो।

5. सभी महिला-केंद्रित योजनाओं की प्रक्रिया सरल हो। सभी विभागों के लिए चार्टर बने ताकि महिला आवेदकों को समय पर लाभ मिल सके।

शिकायतें

1. ग्रामीण क्षेत्रों में शराब और अन्य नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं, जो घरेलू हिंसा का मुख्य कारण बन रहे हैं।

2. ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रशिक्षण केंद्र नहीं हैं या तो बहुत दूर हैं। इस कारण महिलाओं को स्वरोजगार नहीं मिल पाता है।

3. सखी वन स्टॉप सेंटर में कानूनी कार्रवाई के बजाय समझौता करने का दबाव झेलना पड़ता है। गंभीर मामले फॉलोअप के अभाव में बंद हो जाते हैं।

4. विधिक सेवा प्राधिकरण की मुफ्त कानूनी से ग्रामीण और गरीब महिलाएं पूरी तरह अंजान हैं।

5. विधवा पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत लंबी और जटिल है।

Sandeep Kumar Shukla

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Sandeep Kumar Shukla
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