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22 सितम्बर, 2020|10:30|IST

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चार प्रकार के लोभों की निवृत्ति होना ही उत्तम शौच धर्म

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मनुष्य को सदा भोग, उपभोग, जीवन व इंद्रियों से लोभ होता है, जब मनुष्य में इन चार प्रकार के लोभों की निवृति हो जाती है तो उसे उत्तम शौच धर्म कहा जाता है। यह विचार बुधवार प्रात: स्थानीय दिगम्बर जैन मंदिर में दश लक्षण पर्व पर जैन धर्म के चौथे लक्षण उत्तम शौच के संदर्भ में प्रस्तुत किये गये।प्रतिदिन की भांति श्री मंदिर में श्रीजी के प्रक्षालन के उपरांत एक-दूसरे से दूरी बनाये रखकर बैठे जैन समाज के स्त्री-पुरुषों ने पूजा-अर्चना व जिनवाणी का पाठ किया।

इसके पश्चात उत्तम शौच के संबंध में विचार व्यक्त करते हुए कहा गया कि हम स्वच्छ जल से अपने शरीर को तो स्वच्छ व उज्ज्वल बना सकते हैं, आत्मा को नहीं। जब हम अपनी आत्मा को सद्विचारों से स्वच्छ व पवित्र बना लेंगे तभी हम उत्तम शौच के पालन करने वाले कहलाएंगे। इससे पूर्व मंगलवार को पूजा-पाठ के उपरांत तीसरे लक्षण उत्तम आर्जव के विषय में बताया गया था कि माया कषायों से दूर रहना तथा कुटिलता का त्याग करना ही उत्तम आर्जव धर्म कहलाता है। इस अवसर पर जैन समाज के मंत्री अनिल कुमार जैन एडवोकेट सहित प्रदीप कुमार जैन, आशीष कुमार जैन, आलोक जैन, संजय जैन, विभोर जैन, शोभित जैन, पवन जैन, राजबाला जैन, स्नेह लता जैन, सुशीला जैन, कमलेश जैन, सुधा जैन, रितु जैन, क्षमा जैन आदि जैन समाज के सदस्य उपस्थित रहे।

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  • Web Title:Retirement of four types of greed is the best toilet