
बोले बिजनौर : कुम्हारों को आसानी से मिले मिट्टी और बाजार तो बढ़े कमाई
संक्षेप: Bijnor News - दीपावली के समय मिट्टी के दीयों और बर्तनों की मांग बढ़ती है, लेकिन कुम्हार समाज को बढ़ती लागत और सस्ते चाइनीज उत्पादों से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पारंपरिक कुम्हारों को अपने पुश्तैनी काम...
दीपावली के समय मिट्टी के दीयों और बर्तनों की मांग बढ़ती है, लेकिन कुम्हार समाज को बढ़ती लागत और सस्ते चीनी उत्पादों से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पारंपरिक रूप से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करने वाले कुम्हार के सामने आज परेशानियों का अंबार लगा हुआ है। आज लोगों ने मिट्टी के बर्तनों को छोड़ कर सस्ते प्लास्टिक और धातु के बर्तनों का उपयोग करना शुरू कर दिया। मशीनरी से बने उत्पादों की प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की कमी और समर्थन के अभाव के कारण यह परंपरागत व्यवसाय संकट में है। यदि इनकी समस्याओं का समाधान हो जाए तो मिट्टी के उत्पाद बनाने की कला एक बड़े रोजगार के साधन में बदली जा सकती है।
कुम्हार बिरादरी में आज भी काफी संख्या में कुम्हार का काम करते हैं। इनका काम मिट्टी के साथ मेहनत कर उससे विभिन्न आकार देना होता है। मिट्टी को तालाब से खोदकर लाना, उसको मथ गूंथकर उसको चाक पर मनचाहा आकार देना और उसे आग पर पकाकर मजबूत बनाकर लोगों तक पहुंचाना कुम्हार की विशेषता है। यह कला अब कहीं विलुप्त होती जा रही है। सुविधाओं का अभाव व मेहनत ज्यादा एवं दाम काम होना भी कुम्हार को अपना पुश्तैनी काम छोड़ने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसके साथ ही चाइनीज सामानों ने भी कुम्हार कला को पछाड़ने का काम कर रही है। कुम्हार का काम करने वाले अनीता देवी, वेदप्रकाश, ऋषिपाल प्रजापति बताते है कि उनके काम में मेहनत ज्यादा है। उनको मेहनत का दाम नहीं मिल पाता हैं। इसके साथ बाजार में चाइनीज व राजस्थानी सामान की होड़ है। चाइनीज व राजस्थानी सामान सस्ता पड़ता है, जबकि चाक पर बनाकर आग पर तपाया गया उनका सामान की लागत ज्यादा आती है। इसके चलते उनके सामान की बाजार में बिक्री कम है। सुविधा के अभाव व दाम कम होने के चलते उनके बच्चे अपने पुश्तैनी काम में नहीं आना चाहते है। उनके बच्चे चाक कला से दूर हो गए है। आजकल के बच्चे दूसरे कामों में रूचि ले रहे हैं। प्रजापति समाज के भगवती, संतरेश, जगराम सिंह, बाबूराम आदि का कहना है कि कुम्हार समाज की कला को बचाने के लिए सरकार के प्रयास कारगर नहीं हैं। ग्रामोद्योग केन्द्र से काम करने के लिए इलेक्ट्रोनिक चाक भी दिए जा रहे है, लेकिन मात्र 10 प्रतिशत लोगों को ही मिले है। मिट्टी न होना, सुविधा का अभाव और कम दाम के चलते कुम्हार बिरादरी अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ कर दूसरे कामों में रोजगार तलाश रही है। माटीकला पर चाइनीज बाजार का प्रभाव समाज के लोग बताते है कि बाजार में चाइनीज व राजस्थानी सामान भी आ गया है। जो मशीनों पर तैयार होने के चलते फिनिशिंग के साथ सस्ता भी है। जबकि उनके सामान में लागत और मेहनत ज्यादा है। उनका सामान टिकाऊ है। इसके बावजूद उनके सामान की बिक्री कम हो रही है। दामों में अंतर होने के चलते ग्राहक सस्ता सामान पसंद कर रहे है। इस कारण से स्थानीय कला लुप्ता होने की कगार पर है। शासन की ओर से मुहैया कराई जाए मिट्टी शिवम, रणजीत, सुमित, वेद प्रकाश बताते हैं कि बर्तन बनाने के लिए आवश्यक मिट्टी आसानी से नहीं मिल पाती है जिसके कारण अधिकांश लोग काम छोड़ चुके हैं। मिट्टी तालाब से खोद कर लाते हैं। तालाब खत्म होते जा रहे हैं। गांव के आस पास जो मिट्टी के लिए तालाब हैं जिनके रास्ते पर कब्जे हो रहे हैं। कई बार प्रशासन से गुहार लगाई लेकिन हल नहीं निकाला गया। शासन को कुम्हार के पुश्तैनी काम को बचाने के लिए आसानी से मिटटी उपलब्ध कराने का काम करना चाहिए। इसके साथ की कुम्हार का काम करने वालों के लिए मिट्टी खुदाई के लिए पट्टे करने चाहिए। लागत के मुतबिक नहीं मिलता दाम अमर सिंह, विशाल, राजवीर व ऋषिपाल का कहना है कि उनके काम में मेहनत ज्यादा है और उनको मेहनत के हिसाब से दाम नहीं मिलता है। मिट्टी तालाब से खोदकर लाई जाती है। फिर इसे पानी से फुलाई जाती है। इसके बाद मिट्टी में रेत मिलाकर उसे पैरों से खूंदा जाता है। बाद में तैयार मिट्टी को चाक पर रखकर आकार दिया जाता है। सूखने के बाद आवा में पकाते हैं। पहले इंधन फ्री था अब उपलो की कीमत दो रूपये से ढाई रूपये है। एक अवे में लगभग 2000 उपले लगते हैं। इतनी मेहनत के बाद भी मूल्य नहीं मिल पाता। पिछले 15 वर्षों से छोटा दिया 30 रूपये सैकड़ा ही बिक रहा है। छोटे बर्तनों की कीमत में भी कोई इजाफा नहीं हुआ है। सुविधाओं के अभाव में छोड़ रहे काम नजीबाबाद और आसपास के कई गांव में आज भी कुम्हार का काम करने वालों की संख्या काफी है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में लोग अब काम से कतराने लगे हैं। अपने पुश्तैनी काम को छोड़ कर दूसरे रोजगार की ओर रुख करने लगे हैं। ग्राम माहवतपुर में लगभग 100 कुम्हार परिवार हैं। आज समस्याओं के कारण लगभग पांच सौ से अधिक लोग प्रभावित हैं। 83 वर्षीय फकीर चंद के इलाज के लिये आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी ना ही उनका आयुष्मान कार्ड बना है। सुझाव 1. कुम्हार का कार्य करने वालों को सरकारी सहायता व अनुदान मिलना चाहिए 2. कुम्हार समाज को मिटटी के लिए भूमि के पटटों का आवंटन किया जाए 3. प्रदर्शिनी लगायें और कुम्हारों के उत्पाद के स्टाल लगाए जाए 4. कुम्हार समाज को प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे वे अपनी कला को बेहतर बना सकें 5. कारीगरों को दिया जाए सम्मान चली आ रही पेंशन की मांग शिकायतें 1. मिट्टी आसानी से नहीं मिलती है जिससे होती है परेशानी 2. सस्ते और आकर्षक चाइनीज बर्तनों का बाजार पहुंचा रहा नुकसान 3. सरकारी सहायता के लिए भटकना पड़ता है समाज के लोगों को 4. मिट्टी से सांस व चाक चलाने से हो जाती है जोड़ों में दर्द की समस्या 5. समाज के लोगों की ओर सरकार भी नहीं दे रही ध्यान अपनी बात रखी मेहनत के बाद भी मूल्य नहीं मिल पाता। पिछले 15 वर्षों से छोटा दिया 30 रूपये सैकड़ा ही बिक रहा है। छोटे बर्तनों की कीमत में भी कोई इजाफा नहीं हुआ है। - ऋषिपाल सिंह प्रजापति कुम्हार समाज की कला को बचाने के लिए सरकार के प्रयास कारगर नहीं हैं। ग्रामोद्योग केन्द्र से काम करने के लिए इलेक्ट्रोनिक चाक भी दिए जा रहे है। लेकिन जरूरतमंदो तक नहीं पहुंचे। - विशाल प्रजापति कुम्हार का काम करने वालों की संख्या काफी है लेकिन सुविधाओं के अभाव में लोग अब काम से कतराने लगे हैं और अपने पुश्तैनी काम को छोड़ कर दूसरे रोजगार की ओर रुख करने लगे हैं। - राजवीर प्रजापति कच्चे बर्तन सूखने के बाद आवा में पकाते हैं। पहले इंधन फ्री था अब उपलो की कीमत दो रूपये से ढाई रूपये है। एक आवे में लगभग 2000 उपले लगते हैं। लागत के मुताबिक पैसे नहीं मिलते। - अनीता देवी गांव के आस पास जो मिट्टी के लिये तालाब हैं जिनके रास्ते पर कब्जे हो रहे हैं। कई बार प्रशासन से गुहार लगाई लेकिन हल नहीं निकाला गया। मिट्टी नहीं मिल पाती है। - सुमित प्रजापति बाजार में चाइनीज व राजस्थानी सामान आने से हमारे बर्तन आदि की मांग कम हुई है। मशीनों पर तैयार होने के चलते फिनिशिंग के साथ सस्ता भी है। इसका बहुत असर पड़ा है। - वेद प्रकाश आधुनिक समय में कुम्हारों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आज लोगों ने मिट्टी के बर्तनो को छोड़ कर सस्ते प्लास्टिक और धातु के बर्तनों का उपयोग करना शुरू कर दिया। - शिवम प्रजापति समाज के लोगों को सरकार की सहायता नहीं मिल रही है। इलाज के लिये आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी ना ही उनका आयुष्मान कार्ड बना है। कई जगह कोशिश कर चुके हैं। - फकीर चन्द प्रजापित शासन को कुम्हार के पुश्तैनी काम को बचाने के लिए आसानी से मिटटी उपलब्ध कराने का काम करना चाहिए। इसके साथ की कुम्हार का काम करने वालों के लिए मिटटी खुदाई के लिए पटटे करने चाहिए। - रणजीत सिंह मकान पूरी तरह से टूट फूट चुका है। उन्हें सरकारी योजना में आने वाला मकान नहीं मिल सका। उनकी जगह भी दबंगो द्वारा कब्जा ली गई। उनके घर में आवा तक बनाने की जगह नहीं है। - भगवती देवी गांव के आस पास जो भी मिट्टी के लिये तालाब है उन सभी पर या तो कब्जे कर लिये गये या फिर उन पर कालोनी बना ली गई। मिट़टी नहीं मिलेगी तो काम कैसे करेंगे। - राम वरण कुम्हार की जिन्दगी परेशानियों से भरी होती है पूरा परिवार काम करता है तब कहीं जाकर उसके लिये रोटी का इंतजाम होता है। लेकिन सरकार की ओर से अनदेखी हो रही है। - जगराम सिंह सभी मिट्टी के उत्पाद के लिये लागत के अनुसार सरकार मूल्य निर्धारित करें। क्योंकि जितनी लागत और मेहनत से सामान तैयार किया जाता है, उसके मुताबिक मूल्य नहीं मिलता। - सतीश कुमार आजकल के बच्चे इस काम से दूर होते जा रहे हैं। सीखना भी नहीं चाहते क्योंकि उनका मानना है कि इस काम में अब पैसा नहीं है इससे तो अच्छा कहीं नौकरी करके परिवार चला सकते हैं। - संतरेश दिवाली, करवाचौथ, अहोई के समय तो करवे, दीये आदि की बिक्री होती है इसके लिए भी महीने भर पहले से काम करना पड़ता है लेकिन इसके बाद फिर काम ठप हो जाता है। - बाबूराम प्रजापति सरकार यदि हमारे समाज के कारीगरों पर ध्यान नहीं देगी तो आने वाले समय में माटी कला विलुप्त हो जाएगी। क्योकि कोई भी इस काम में आगे नहीं आयेगा। सरकार की ओर से कारगर प्रयास हों। - अमर सिंह प्रजापति

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