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बिहार चुनाव के नतीजों का यूपी की सियासत पर पड़ेगा असर; किसे सबक, किसे चुनौती?

बिहार चुनाव के नतीजों का यूपी की सियासत पर पड़ेगा असर; किसे सबक, किसे चुनौती?

संक्षेप:

भाजपा के लिए कार्यकर्ताओं में बिहार जैसी ऊर्जा भरना चुनौती भी होगा। वहीं, वोट चोरी के आरोपों और पीडीए के नारे के सहारे मिशन-2027 में जुटी सपा के लिए भी बिहार में तमाम कोशिशों के बाद राजद की बड़ी हार चुनौती के रूप में सामने आई है। भाजपा कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर शुरू से ही उसे निशाने पर लेती रही।

Nov 15, 2025 11:17 am ISTAjay Singh आनंद सिन्हा, लखनऊ
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Bihar Election Result impact on UP Politics: बिहार में एनडीए की जीत ने जहां मिशन-2027 के लिए यूपी में भाजपा को नई ऊर्जा दी है, वहीं विपक्षी दलों खासकर सपा और कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती और सबक भी है। दूसरी ओर कभी-कभार उलटा राग अलापने वाले भाजपा के घटक दलों अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी के लिए एकजुट रहने का सबक भी है। यानी ये नतीजे सबके लिए कुछ न कुछ संदेश लेकर आए हैं।

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देश में एसआईआर लागू करने के बाद बिहार में भाजपा की जीत, यूपी में नई ऊर्जा लेकर आएगी। यूपी में तीसरी बार सरकार बनाने की तैयारियों में जुट चुकी भाजपा के लिए कार्यकर्ताओं में बिहार जैसी ऊर्जा भरना चुनौती भी होगा। महत्वपूर्ण यह भी है कि पार्टी संगठन और सरकार बीते एक वर्ष से कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए निगमों व आयोगों में मनोनयन का निर्णय नहीं ले सकी है। ऐसे में पार्टी संगठन को कार्यकर्ताओं में व्याप्त उदासीनता को दूर करना भी चुनौती है। वहीं, भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ नई कार्यकारिणी बनाना भी पार्टी के लिए बड़ा मुद्दा होगा।

कानून-व्यवस्था महिला सशक्तीकरण फिर बनेगा मुद्दा

कहना गलत न होगा कि बिहार में जूडीयू और भाजपा का बेहतरीन समन्वय, जंगलराज का विरोध के साथ महिला सशक्तीकरण जीत का बड़ा कारक माना जा रहा है। कुछ इसी तर्ज पर भाजपा यूपी में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बुलडोजर बाबा की छवि, विकसित उप्र के लिए बेहतर कानून-व्यवस्था के साथ ही महिलाओं की कल्याणकारी योजनाओं को मिशन-2027 के लिए मुद्दा बनाए तो हैरत नहीं। कुछ ऐसे ही मुद्दों के बलबूते मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्व में वर्ष 2022 में भाजपा ने 37 साल का रिकार्ड तोड़ कर लगातार दोबारा सरकार बनाई थी।

सपा के लिए 2024 का प्रदर्शन कायम रखना चुनौती

वोट चोरी के आरोपों और पीडीए के नारे के सहारे मिशन-2027 में जुटी सपा के लिए भी बिहार में तमाम कोशिशों के बाद राजद की बड़ी हार चुनौती के रूप में सामने आई है। बिहार में राजद को भाजपा कानून-व्यवस्था, जंगलराज और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शुरू से ही निशाने पर लेती रही। वहां विपक्षी दलों की तमाम कोशिशों के बावजूद जातीय कार्ड न चलना सपा के लिए मुसीबत का सबब होगा। भले ही यूपी और बिहार की सियासी जमीन भिन्न हो, लेकिन सपा के सामने भी कुछ ऐसे ही मुद्दों से जूझने की चुनौती होगी। यह बड़ा सवाल होगा कि ऐसे में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा सपा को पूर्व सरकार की कानून-व्यवस्था के मुद्दों, महिलाओं की असुरक्षा और भ्रष्टाचार को लेकर हमलावर रहती है, तो भाजपा के तीरों का सपा किस अंदाज में जवाब देगी? एम-वाई के जातीय समीकरण के साथ ही ओबीसी जातियों या यूं कहें ‘पीडीए’ का समर्थन जुटाना सपा के लिए बड़ा मुद्दा होगा। माना जाता है कि लोकसभा के चुनावों में दलित वोट भाजपा से छिटक कर सपा की झोली में गया था, ऐसे में जबकि बसपा मुखिया मायावती की यूपी में सक्रियता भी सपा की ‘पीडीए’ सियासत के लिए भी दिक्कतें पेश करे तो हैरत नहीं।

सहयोगियों अपना दल-सुभासपा के लिए भी सबक

बिहार नतीजों ने भाजपा के सियासी दलों को सहयोग व समन्वय की सियासी सीख भी दी है। लगातार 20 साल के राज के बाद भी कैसे दो पार्टियां समन्वय रखें, बिहार का चुनाव इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। भाजपा के सहयोगी दलों के लिए बिहार में जदयू और भाजपा के सहयोगी दलों की तालमेल से सीख लेनी होगी। वक्त-बे-वक्त स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपना राग अलापने वाली सुभासपा के लिए मतदाताओं को एकजुटता का संदेश देना जरूरी होगा। वहीं सरकारी अधिकारियों के खिलाफ बयानबाजी कर विवाद पैदा करने को लेकर चर्चा में रहे अपना दल के लिए भी बिहार की जीत सबक है।

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लेखक के बारे में

Ajay Singh
अजय कुमार सिंह दो दशक से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और टीवी होते हुए अब डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं। राजनीति, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण से जुड़ीं खबरों को गहराई से कवर किया है। फिलहाल लाइव हिन्दुस्तान में असिस्टेंट एडिटर हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति और क्राइम खबरों पर विशेष फोकस रखते हैं। और पढ़ें
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