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साधक और साधना के लिए निर्मल मन होना जरूरी

नगर के पश्चिम मोहाल में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा में रविवार को शंकराचार्य महराज ने भक्तों को अपना मन सदैव निर्मल रख ने की सीख दी। कहा कि साधना के लिए निर्मल मन होना आवश्यक है। निर्मल मन से छह वर्ष की बीरबल की पुत्री ने बादशाह अकबर को सिंहासन से नीचे उतार दिया। निर्मल भक्ति ने सुदामा जैसे दरिद्र ब्राह्मण को राजा बना दिया। कथा को आगे बढ़ाते हुए महराज ने कहा कि सुदामा कृष्ण के बचपन के मित्र थे। घर से चावल की पोटली लेकर सुदामा द्वारिकाधीश से मिलने चले तो नदी पर श्रीकृष्ण नाव लेकर केवट बनके मिले और उन्हें नदी पार कराया। हरे कृष्ण जपते हुए द्वारिकापुरी पहुंचे तो द्वारपालों से मिले। पूछा कि यह महल किसका है तो उन्होंने बताया कि महल द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण का है। द्वारपालों को श्रीकृष्ण के सहपाठी होने की बात बताई, जब द्वारपाल ने द्वारिकाधीश को बताया कि एक ब्राह्मण आया है और अपना नाम सुदामा बता रहा है। इतना सुनते ही श्रीकृष्ण दौड़ पड़े, पीतांबर नीचे गिर पड़ा सभी आश्चर्य चकित हो गए। रुक्मणी कुछ समझ पाती कि तब तक सुदामा और श्रीकृष्ण गले मिले और एक दूसरे को पकड़कर रोने लगे। दृश्य देखकर सभी भौचक रह गए,श्रीकृष्ण ने सुदामा को सिंहासन पर बिठाया। इसके बाद पोटली निकालकर दो बार चावल ग्रहण करके रूक्मणी को आश्चर्य में डाल दिया। इसके बाद सुदामा के राजा बनने तक की कथा बताने के बाद महराज ने रूक्मणी विवाह पर भी प्रकाश डाला। सचित्र कथा सुनने के साथ देखकर सभी लोग भाव विभोर हो गए। विवाह गीत,कन्यादान गीत पर झूमते रहे। इसके बाद बालिकाओं ने मनमोहक डांडिया नृत्य प्रस्तुत किया। इस मौके पर शेष प्रकाश, कृष्ण कुमार खटाई आदि मोजूद रहे।

बीडीएच 15: नगर के पश्चिम मोहाल में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा में रविवार को बोलते शंकराचार्य महराज।

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  • Web Title:It is necessary for the seeker and sadhana to have pure mind