अब होली पर नहीं निकलती हुड़दंगों की टोली
Bhadoni News - अब होली पर नहीं निकलती हुड़दंगों की टोली अब होली पर नहीं निकलती हुड़दंगों की टोली अब होली पर नहीं निकलती हुड़दंगों की टोली

ज्ञानपुर, संवाददाता। भागदौड़ भरी जिंदगी में त्योहार मनाने का नजरिया भी बदल गया है। होली त्योहार पर न तो हुड़दंगो की बारात निकलती है और ना ही लोग एकत्रित हो पाते हैं। बेलवरिया व फाग गीत की परंपरा भी दम तोड़ती जा रही है। लोगों के पास इतना समय नहीं रह गया है कि एक स्थान पर एत्रित होकर पड़ोसियों संग कुछ पल व्यतीत कर सकें। दो दशक पूर्व की होली त्योहार पर गौर करें तो पंद्रह दिन पहले से ही लोग फाग गीत गाना शुरु कर देते थे। शाम ढलते ही चार-छह की संख्या में होलिका स्थल पर एकत्रित हुए लोग फगुआ गाते थे।
होलिका बढ़ाने के लिए जन-जन से चंदा उतारा जाता था। होली के दिन हुड़दंगियों की बारात निकलती थी। खच्चर पर एक लोगों को बैठाया जाता था। पूरे गांव के लोग हंसी-खुसी उनके साथ रंगों की बरसात करते हुए गांव में भ्रमण करते थे। जहां, चिप्स, गुझिया, पापड़ व नमकीन दिखा वहां लोग थम जाते थे। होलिका को बढ़ाना और जलाना भी मानों खानापूर्ति हो गई है। जिले के प्रसिद्ध बेलवरिया गायक जटा शंकर शुक्ल की माने तो अब बेलवरिया गायकों की संख्या भी कम हो रही है। होली पर्व आते ही भोजपुरी गीत का धून गुंजने लगता है। जबकि दो दशक पूर्व होली पर्व पर देश को आजादी दिलाने वाले शहीद झूरी सिंह समेत विभिन्न क्रांतिकारी पर बेलवरयिा गीत को बनाकर प्रस्तुत किया जाता था। डीजे पर बजने वाले भोजपुरी गाना को सुन लोग स्वयं सोचने पर विवश हो जाते हैं। वहीं, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राजकुमार पाठक ने बताया कि दो दशक पूर्व होली त्योहार के तीन दिन पूर्व ही टोलियां बनना शुरू हो जा रहा था। लेकिन अब माहौल बदल चुका है। भागदौड़ भरी जिंदगी और अत्यधिक काम के चलते त्योहार अब खानापूर्ति बनता जा रहा है। हालांकि होली पर्व पर ग्राम पंचायतों में दस-बीस की संख्या में एकत्रित हुए लोग रसभंगा और व्यंजनों का लुत्फ उठाते हुए त्योहार को आपसी सौहार्द के साथ मनाते हैं।
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