
आगे आई समाजसेवियों की टीम, दिव्यांग की बेटी के हुए हाथ पीले
Basti News - फोटो: 20 बीएसटी : चिलमा बाजार स्थित एक मैरेज हाल में सामान व नगदी के साथ बेटी के हाथ पीला करने की तैयारी में बैठी कांती देवी।
बस्ती, निज संवादाता। दुबौलिया थानाक्षेत्र के बैरागल गांव की कांती देवी के जीवन में विगत पांच वर्षों से अंधेरा ही अंधेरा था। दोनों पैर लकवाग्रस्त, पति प्रहलाद की मौत के बाद ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। पैतृक संपत्ति का एक टुकड़ा भी नसीब नहीं हुआ। मजबूरन गांव से कुछ दूर सैनिया चौराहे के पास एक झोपड़ी बनाकर कांती देवी अपनी दो बेटियों के साथ रहने लगीं। दिनभर बेटियां मजदूरी करतीं, शाम को जैसे-तैसे चूल्हा जलता। गरीबी ने उन्हें इस कदर जकड़ रखा था कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती थी। इसी बीच बड़ी बेटी की शादी तय हो गई।

मां की आंखों में आंसू और बेटी के चेहरे पर मजबूरी साफ दिख रही थी। कई चौखटों पर दौड़ी लेकिन किसी ने मदद नहीं की। लेकिन कहते हैं न कि जब इंसान का कोई नहीं होता, तब भगवान साथ खड़ा होता है। भगवान के रूप में इस बार समाज खड़ा हुआ। जिले के एक वरिष्ठ अधिकारी को जब कांती देवी के हालात का पता चला, तो उन्होंने तुरंत पहल की। बात समाजसेवी अच्चिदानंद मिश्र तक पहुंची। अच्चिदानंद ने बिना देर किए परिवार से मिलकर पूरी स्थिति जानी और फिर जो हुआ, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। समाजसेवियों और दानदाताओं का एक समूह एकजुट हुआ। डॉ. आशुतोष पांडेय, रूद्रेश पांडेय, विनय मिश्र, व्यवसायी अभिषेक गुप्ता, आदित्य द्विवेदी, शुभम मिश्रा, शुभम पाठक, राघवेंद्र सिंह, वंदना पांडेय सहित कई लोग आगे आए। सबने मिलकर ठान लिया कि इस बेटी की शादी धूमधाम से होगी। 20 नवंबर की तारीख तय हुई। चिलमा बाजार स्थित पुष्प वाटिका मैरेज हॉल बुक कर लिया गया। नामी कैटरर्स से खाने-पीने की पूरी व्यवस्था की गई। मेन्यू में स्वादिष्ट पकवान, मिठाइयां, नाश्ते से लेकर डिनर तक शामिल हुआ। बारातियों का भव्य स्वागत हुआ। बेटी के लिए बेड, आलमारी, बर्तन सेट, सूटकेस, वैनिटी बॉक्स सहित हर जरूरी सामान दिया गया। सबसे बड़ी बात, मां कांती देवी को आगे के खर्च के लिए करीब 77 हजार रुपये नकद सौंपे गए। शादी का दिन आया। झोपड़ी में रहने वाली वह मां, जिसके पास कभी दो जोड़ी कपड़े भी मुश्किल से थे, आज अपनी बेटी को दुल्हन के रूप में सजाकर, आंखों में खुशी के आंसू लिए विदा कर रही थी। बारात आई, द्वारचार हुआ, जयमाला हुई, फेरे हुए और फिर विदाई का वक्त आया। मां ने बेटी को गले लगाया तो रोते-रोते कहा, बेटी, मैंने तो कुछ नहीं दे पाई, लेकिन समाज ने मुझे मां होने का हक दे दिया। आज बैरागल के लोग एक ही बात कह रहे हैं कि पैसा इंसान को इंसान नहीं बनाता, इंसानियत बनाती है। जिस मां-बेटी को समाज ने ठुकरा दिया था, उसी समाज के कुछ लोगों ने मिलकर उन्हें सम्मान और खुशी लौटा दी।

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