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मिशन चंद्रयान में बरेली के इस युवक का भी रहा है योगदान

चंद्रयान-2 को शुक्रवार की देर रात चंद्रमा की जमीं पर उतरना था। लेकिन अंतिम क्षणों में देश को बड़ा झटका लग गया। शनिवार तड़के जब पूरा देश टकटकी लगाए देख रहा था तभी चंद्रमा की सतह से महज 2.1 किलोमीटर दूरी पर लैंडर विक्रम से वैज्ञानिकों का संपर्क टूट गया। हालांकि इस मिशन में बरेली के विवेक कुमार सिंह भी चंद्रयान की लांचिंग से जुड़े रहे हैं। विवेक ने सेटेलाइट के इंस्ट्रूमेंट की डिजाइन में अपना योगदान दिया था। जीआईसी बरेली में वर्ष 1994 से 2001 तक छात्र रहे विवेक ने कानपुर यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी। इसरो त्रिवेंद्रम में लंबे समय तक काम करने के बाद अब वो इसरो अहमदाबाद के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर में तैनात हैं।

कम उम्र में जीता पुरस्कार

विवेक स्वदेशी रडार इमेजिंग सेटेलाइट की टीम का भी हिस्सा रहे थे। उनके नाम सबसे कम उम्र में डॉ. विली मेमोरियल अवार्ड जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है। सोसायटी ऑफ फ्लूयड मैकेनिक्स एंड फ्लूयड पावर यह पुरस्कार देता है। 

कार्टो-2 डी सेटेलाइट भी किया डिजाइन

इसरो ने जब पीएसएलवी के जरिये 104 सेटेलाइट को छोड़ा था, तब भी विवेक ने अहम भूमिका निभाई थी। 44.4 मीटर लंबे और 320 टन वजनी रॉकेट पीएसएलवी-एक्सएल के साथ कार्टो-2 डी सेटेलाइट भी छोड़ा गया था। इसका वजन 700 किलो से ज्यादा था। विवेक काटो-2 डी सेटेलाइट की डिजाइनिंग टीम में शामिल रहे थे। इसकी मदद से पृथ्वी पर खड़ी एक कार तक का बेहद साफ फोटो खींचा जा सकता है। विवेक ने इस सेटेलाइट की टेस्टिंग में भी अहम भूमिका निभाई थी।

इसरो की दिल टीम में भी निभाई भूमिका

वर्ष 2016 में इसरो ने रॉकेट तकनीक से एक कृत्रिम दिल तैयार किया था। इस दिल को तैयार करने वाली टीम में बरेली के विवेक कुमार सिंह भी शामिल थे। यह प्रयोग दो चरणों में किया गया था। पहले चरण में जानवर की मृत्यु जल्दी हो गई थी। उसके बाद दूसरे चरण की शुरुआत की गई। इसमें पंप में कई सुधार किए जाने थे। उस टीम में विवेक भी शामिल थे।
  
बरेली के छात्रों का बढ़ाना चाहते हैं मनोबल

विवेक विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में हिंदी पट्टी के छात्रों की कम रुचि से काफी निराश हैं। हिंदी मीडियम स्कूलों के छात्रों के उत्साहवर्धन के लिए वो उनसे संवाद करना चाहते हैं। लंबे समय से वो बरेली में ऐसा आयोजन करना चाहते हैं, मगर बात बनी नहीं। इस वर्ष दिसंबर में उन्होंने इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की है।  

जीएलएलवी मार्क-3 डी1 पर की सात वर्ष मेहनत

इसरो ने 2017 में सेटेलाइट लांच व्हीकल जीएलएलवी मार्क-3 डी1 को प्रक्षेपित किया था। इस रॉकेट की शुरुआत 2002 में हुई थी। त्रिवेंद्रम में तैनाती के दौरान 2006 से 2012 तक विवेक इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे थे। उन्होंने इस रॉकेट के क्रायोजनिक और लिक्विड इंजन के गणितीय अनुमानों में अहम भूमिका निभाई थी। 

माता-पिता को देते हैं सफलता का श्रेय

इंजीनियर विवेक कुमार सिंह के पापा रामनिवास सिंह रेलवे में जॉब करते हैं। वहीं, मां शांति सिंह होममेकर हैं। उनका परिवार सुभाषनगर में रहता है। 

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