कड़ाके की ठंड में पोस्ट पार्टम ब्लूज का शिकार हो रही प्रसूताएं
Bareily News - मौसम का मिजाजकड़ाके की ठंड में पोस्ट पार्टम ब्लूज का शिकार हो रही प्रसूताएंकड़ाके की ठंड में पोस्ट पार्टम ब्लूज का शिकार हो रही प्रसूताएंकड़ाके की ठं

बरेली। कड़ाके की ठंड का असर खांसी-बुखार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नवप्रसूता महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। तापमान में लगातार गिरावट के साथ ही जिले में पोस्ट पार्टम ब्लूज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। जिला अस्पताल में बीते दो महीनों के दौरान 36 प्रसूताएं इस समस्या के इलाज के लिए पहुंच चुकी हैं। इन प्रसूताओं के उपचार के साथ काउंसिलिंग की जा रही है। गर्भवतियों और प्रसूताओं का ब्लड प्रेशर अनियंत्रित होना सामान्य परेशानी है, लेकिन सर्दी के मौसम में यह दिक्कत बढ़ जाती है। यही स्थिति आगे चलकर पोस्ट पार्टम ब्लूज का कारण बनती है।
ठंड के कारण शरीर में हार्मोनल बदलाव तेज होते हैं, नींद प्रभावित होती है और शारीरिक कमजोरी बढ़ती है, जिसका सीधा असर प्रसूता की मानसिक स्थिति पर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मौसम में प्रसव के बाद मां की मानसिक दशा बिगड़ने का खतरा अन्य मौसमों की तुलना में अधिक रहता है। क्या है पोस्ट पार्टम ब्लूज जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. आशीष कुमार ने बताया कि पोस्ट पार्टम ब्लूज एक सामान्य लेकिन संवेदनशील मानसिक स्थिति है, जो प्रसव के कुछ दिनों या हफ्तों के भीतर सामने आती है। इसकी पहचान उदासी, चिड़चिड़ापन, बार-बार रोने का मन, घबराहट, बेचैनी और स्तनपान से कतराने जैसे लक्षणों से होती है। कई बार मां खुद को अकेला और असहाय महसूस करने लगती है। यदि समय रहते इसका ध्यान न दिया जाए तो यह समस्या गंभीर डिप्रेशन या साइकोसिस का रूप भी ले सकती है। 55 प्रतिशत प्रसूताओं को होती है दिक्कत डॉ. आशीष कुमार के अनुसार, करीब 55 प्रतिशत प्रसूताओं को किसी न किसी स्तर पर पोस्ट पार्टम ब्लूज की समस्या हो सकती है। वहीं, लगभग 15 प्रतिशत प्रसूताएं डिप्रेशन की चपेट में आ सकती हैं और करीब 2 प्रतिशत प्रसूताओं में साइकोसिस जैसी गंभीर मानसिक स्थिति विकसित होने का खतरा रहता है। यह न केवल मां के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि नवजात शिशु के विकास और देखभाल पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। सर्दियों में तनाव और चिंता बढ़ने के पीछे कई कारण होते हैं। शारीरिक पीड़ा, नींद की कमी, सामाजिक और आर्थिक दबाव, पति या परिवार से अपेक्षित सहयोग न मिलना और धूप की कमी से विटामिन डी का स्तर गिरना प्रमुख कारण हैं। विटामिन डी की कमी सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे मां के साथ समय बिताएं, उसे भावनात्मक सहयोग दें और उसकी जरूरतों को समझें। - डॉ. आशीष कुमार, मनोचिकित्सक जिला अस्पताल --------
लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


