बोले बरेली: रेलवे कॉलोनियां बदहाल, कर्मचारी बेहाल
Bareily News - बरेली रेलवे कॉलोनियों में करीब 15 हजार परिवार रहते हैं, लेकिन यहां की स्थिति बेहद खराब है। कर्मचारी कहते हैं कि सरकार करोड़ों रुपये खर्च दिखाती है, लेकिन असली हालत में कोई सुधार नहीं होता। गंदगी, टूटी...

बरेली में उत्तर रेलवे और पूर्वोत्तर रेलवे की दस से अधिक कॉलोनियां हैं, जहां करीब 15 हजार परिवार रहते हैं। रेलवे कर्मचारियों और उनके परिजनों का जीवन यहीं बीतता है, लेकिन इन कॉलोनियों की स्थिति देखकर लगता है जैसे रेल प्रशासन ने इन बस्तियों से मुंह मोड़ लिया हो। खस्ता हाल क्वार्टर, टूटी सड़कें, जर्जर सीवरेज लाइन, पानी की किल्लत, गंदगी और आवारा पशुओं की दहशत, यही रोजमर्रा की कहानी है। बरेली में रेलवे की प्रमुख कॉलोनियों में न्यू मॉडल रेलवे कॉलोनी, ऑफिस कॉलोनी, अस्पताल कॉलोनी, लोको कॉलोनी, चौपुला कॉलोनी शामिल हैं। वहीं जंक्शन क्षेत्र की नार्थ, साउथ और लोको कॉलोनी भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों का घर हैं।
इज्जतनगर रेल मंडल की अधिकांश कॉलोनियों की हालत एक जैसी है। रेलवे कर्मचारियों का कहना है कि हर साल मरम्मत और रख-रखाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। निरीक्षण के बाद अधिकारी कागजों में रिपोर्ट भरते हैं और कर्मचारियों को आश्वासन देकर चले जाते हैं। मजबूरी में कर्मचारियों को अपने पैसों से मरम्मत करानी पड़ती है। कर्मचारियों का कहना है कि लगभग 70 प्रतिशत क्वार्टर जर्जर हो चुके हैं। दरवाजे-खिड़कियां टूटी हैं, छतें टपकती हैं और दीवारें सीलन से भरी हैं। बारिश के दिनों में तो हाल और खराब हो जाता है। कई बार पानी सीधे कमरों में टपकता है, जिससे परिवारों का जीना मुश्किल हो जाता है। कॉलोनियों की सड़कें गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। वाहन निकालना तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल है। कई बार लोग गड्ढों में गिरकर चोटिल हो चुके हैं। निवासियों का कहना है कि अगर कोई तेज़ी से बाइक या स्कूटी निकालता है तो फिसलना तय है। सिर्फ सड़कें ही नहीं, आवारा पशुओं की समस्या भी बड़ी है। कॉलोनियों के चारों ओर से खुला होना पशुपालकों को गाय-भैंस छोड़ने की छूट दे देता है। रात-दिन जानवर घूमते रहते हैं। इसके अलावा कुत्तों के झुंड भी बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरा बने हुए हैं। शिकायतों पर सिर्फ आश्वासन रेलवे कॉलोनियों की मरम्मत और देखरेख का जिम्मा आईओडब्ल्यू (इंस्पेक्टर ऑफ वर्क्स) को दिया गया है। कर्मचारियों के अनुसार, जब वे लिखित प्रार्थना पत्र देकर किसी समस्या का समाधान चाहते हैं तो उसे रजिस्टर में दर्ज करके अलमारी में बंद कर दिया जाता है। निरीक्षण के नाम पर एक कर्मचारी मौके पर पहुंचता है, स्थिति देखता है और लौटकर सिर्फ इतना कह जाता है कि ‘कल सुबह हर हाल में काम शुरू होगा। लेकिन वह कल कभी नहीं आता। नतीजा यह होता है कि महीनों तक छोटी-सी समस्या भी जस की तस बनी रहती है। अंततः कर्मचारी अपने पैसे से निजी कारीगर बुलाकर मरम्मत करवाते हैं। कागजों में करोड़ों, जमीन पर सूनापन रेलवे के सालाना बजट में कॉलोनियों की मरम्मत और रखरखाव के लिए करोड़ों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं। लेकिन कर्मचारियों का आरोप है कि वह पैसा सिर्फ फाइलों में घूमता है। कॉलोनियों की हालत जस की तस बनी रहती है। एक कर्मचारी ने बताया कि हर साल बजट आता है, रिपोर्ट बनती है, लेकिन हमारे घर वैसे ही टूटे-फूटे रहते हैं। हमें समझ नहीं आता कि आखिर पैसे कहां खर्च होते हैं। जिम्मेदारी से भागता तंत्र रेलवे कॉलोनियों में रहने वाले लोग इस विडंबना को रोज झेल रहे हैं। साफ-सुथरी और सुरक्षित कॉलोनियों का सपना देखने वाले कर्मचारी अब मजबूरी में अपने पैसों से समस्याएं हल करने लगे हैं। उनका कहना है कि जब तक अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी मांगें बहुत बड़ी नहीं हैं-बस इतना कि कॉलोनियों में सफाई हो, सड़कें ठीक हों, क्वार्टर रहने योग्य हों और बच्चों को खेलने का अधिकार मिले। यदि रेल प्रशासन समय रहते ठोस कदम नहीं उठाता, तो आने वाले दिनों में असंतोष और बढ़ सकता है। शिकायतें: - क्रीड़ा स्थल को अधिकारी प्राइवेट लोगों को पैसे लेकर दे देते हैं। जिससे पूरे महीने प्राइवेट खिलाड़ियों का कब्जा रहता है। कर्मचारी और उनके बच्चे क्रीड़ा स्थल का लाभ नहीं उठा पाते हैं। - आईओडब्ल्यू प्रार्थना पत्रों पर कोई संज्ञान नहीं लेते हैं। छोटे-छोटे काम भी तीन से चार महीने में ठीक कराये जाते हैं। - रेलवे कालोनियों में आवारा पशुओं का आतंक है। लोग गायें चराने पहुंच जाते हैं। कुत्तों के झुंड भी मुसीबत हैं। - कालोनियों में सोलर लाइटें लगाई गई थीं, जो खराब हो गईं। फिर उनको दोबारा ठीक नहीं किया गया। - कालोनियों में साफ-सफाई नहीं होती है। बड़ी बड़ी घास झाड़ियां खड़ी हैं। नालियां चोक होने से बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। सुझाव: - सफाई कर्मचारियों की भी नियमित डयूटी चेक की जाये। जिससे कालोनियों में रोज साफ सफाई हो। - सड़कें 15-15 साल से नहीं बनी है। अधिकारी रिकार्ड चेक कराकर उनको समय अवधि में ठीक करायें। - रेलवे कॉलोनियो की मॉनीटरिंग को अधिकारियों की कमेटी बने। हर महीने डीआरएम खुद उसकी समीक्षा करें। - सोलर लाइटें क्रासिंगों पर लग गई, लेकिन क्रासिंगों पर शौलाचय और पेयजल की उचित व्यवस्था की जाये। - क्वार्टर या कालोनी की समस्या से जुड़े जो प्रार्थना आते हैं, उनकी भी कालोनियों में जाकर समीक्षा करें। लोगों की बात - रेलवे कालोनियों में जो आवारा पशु घूमते हैं, उनको पकड़वाया जाये। आयेदिन आवारा पशुओं से घटनाएं हो रही हैं। कालोनियों में कुत्तों का आतंक बढ़ता जा रहा है।- रविंद्र कुमार - रेलवे कालोनियों की सबसे अधिक सड़कें खराब हैं। हर साल बरसात के बाद काम कराने का आश्वासन मिलता है। बरसात के बाद भी सड़कों पर काम नहीं होता।- त्रिभुवन प्रसाद यादव - रेलवे कालोनियां चारों तरफ से खुली हुई हैं। जिससे बाहर के लोग आते हैं। आवारा पशु घुसते हैं। कालोनियों की बाउंड्री बनाकर गेट लगाये जाएं। वहां सुरक्षा गार्ड तैनात किये जाएं।-डीके पासवान - क्वार्टर खस्ता हाल हैं। उनको ठीक कराया जाये। कर्मचारी अगर किसी कार्य को प्रार्थना पत्र देता है, उस शिकायत का एक समय निर्धारित हो। जिससे समस्या का हल हो सके।-रुद्रप्रताप सिंह -कालोनियों की सड़कें उखड़ गईं। सालों से सड़कें नहीं बनी हैं। सड़कों पर बजरी बिखरी रहती है। बाइक-स्कूटर अक्सर फिसल जाते हैं। जिससे कर्मचारी गिरकर चोटिल होते हैं।- वीरेंद्र पाल - क्वार्टरों में छोटे-छोटे कार्यों के संबंध में कर्मचारी शिकायतें करते हैं। उन शिकायतों पर आईओडब्ल्यू ध्यान नहीं देते हैं। कर्मचारी बार-बार फोन करते हैं। तब कहीं ठीक करने कर्मचारी आता है।- जय प्रकाश सिंह - डबल स्टोरी में आधे-अधूरे क्वार्टरों की बरसात में पुताई कराई गई। वह भी फिर से खराब हो गई। अब फिर से पैसे की बर्वादी होगी। पांच-पांच साल में कहीं रंगाई-पुताई होती है।-हरिहर प्रसाद - कोलानियों का अधिकारी निरीक्षण तो करते हैं। समस्याओं को देखते हैं। वहीं मौके पर निस्तारण करने को मौखिक तौर पर कहकर अधिकारी भूल जाते हैं। बाद में अधिकारी मॉनीटरिंग नहीं करते।- नीरज कुमार भास्कर - कालोनियों मे साफ-सफाई नहीं होती हैं। यही वजह है जो कालोनियों में झाड़ियां जंगल का रूप ले चुकी हैं। नालियां बंद हैं। पानी जहां-तहां भरता है। कीड़े-मकोड़े पल रहे हैं।- मोहित कुमार श्रीवास्तव - कालोनियों में एक समस्या हो तो उसे बताया जाये। यहां तक हर तरफ समस्याएं ही हैं। सड़कें, नालियां, क्वार्टर, आवारा पशु। शिकायतें करते रहो। कोई सुनवाई नहीं।-रूपराम नेगी - कालोनियों की बहुत ही बुरी स्थिति है। कालोनियों में साफ-सफाई की बड़ी समस्या है। झाड़ियां काटने के लाखों के ठेका किये जाते हैं। फिर भी काम नहीं होता है।-शीतला प्रसाद - अधिकारी जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। यही वजह है, जो कर्मचारियों की कालोनियों और आफिसों से जुड़ी समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होता है। कर्मचारियों को परेशान होना पड़ता है।- प्रकाश सिंह विष्ट - जो काम हैं, चाहते वह रेल कालोनी से जुड़ा हो या फिर आफिस से। उसके लिए एक अधिकारी के नेतृत्व में मॉनीटरिंग टीम बने। जिससे समस्याओं का समाधान एक निर्धारित समय में हो सके।- विवेक शर्मा -रेलवे कालोनियों में क्वार्टरों, सड़क और लाइटिंग से जुड़ी समस्याओं का समाधान को इंजीनियरिंग विभाग गंभीरता से नहीं लेता है। प्लानिंग ही बनती रहती हैं। धरातल पर कुछ नजर नहीं आता।- अरुण - कालोनियों की सड़कें उखड़ी हुई हैं। सालों ने वहां कोई काम नहीं हुआ। न्यू मॉडल रेलवे कालोनी की सड़कों पर निकलना मुश्किल होता है। अधिकारी निरीक्षण करके भूल जाते हैं।-अजय कन्नौजिया
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