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लोकसभा चुनाव 2019 : परदेशियों पर भी फिदा रहे रुहेलखंड के मतदाता

रुहेलखंड के मतदाताओं ने लोकसभा चुनावों में परदेशी प्रत्याशियों पर भी प्यार के रूप में जमकर वोट लुटाए हैं। दूर-दराज से आकर इन प्रत्याशियों ने स्थानीय नेताओं को पटखनी देकर लोकसभा तक पहुंचने का सपना पूरा किया। सिर्फ शाहजहांपुर से आज तक कोई भी बाहरी प्रत्याशी जीतने में सफल नहीं हुआ।

1980 के लोकसभा चुनाव में बरेली से जनता पार्टी-एस के मिसिर यार खां जीते थे। उनकी मृत्यु के चलते 1981 में फिर चुनाव कराना पड़ा। कांग्रेस ने बेगम आबिदा अहमद को टिकट दिया। आबिदा पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी थी। बाहरी होने के बाद भी उन्हें बरेली की जनता का प्यार मिला। वो बरेली की पहली महिला सांसद बनीं।

1984 के चुनाव में कांग्रेस ने बेगम आबिदा अहमद को फिर टिकट दिया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर पर सवार होकर आबिदा फिर लोकसभा पहुंच गईं। हालांकि 1989 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। आंवला लोकसभा सीट से वर्ष 2009 के चुनाव में बीजेपी ने मेनका गांधी को वोट दिया। मेनका इससे पहले बगल की पीलीभीत सीट से सासंद थी। 2014 में आंवला से धर्मेंद्र कश्यप को टिकट मिलने पर पीलीभीत की जनता ने मेनका गांधी को फिर से जिताकर लोकसभा भेजा।

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बिहार से आकर बदायूं में जीते शरद यादव
बदायूं लोकसभा सीट से भी कद्दावर नेताओं का नाम जुड़ा रहा है। 1989 के चुनाव में जनता दल के नेता शरद यादव ने बिहार से बदायूं में आकर ताल ठोंकी। जनता दल की हवा और बदायूं की जनता का शरद यादव को पूरा साथ मिला। बाहरी होने के बाद भी उन्होंने जीत का परचम लहरा दिया। 1991 में स्वामी चिन्मयानंद ने भी शाहजहांपुर से आकर  बदायूं में जीत हासिल की। 2009 में मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव बदायूं आ पहुंचे। इटावा के सैफई में जन्में धर्मेंद्र ने  शानदार जीत हासिल की। 2014 में मोदी लहर के बाद भी यह बाहरी प्रत्याशी बदायूं की जनता का भरोसा जीतने में कामयाब रहा।

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पीलीभीत में खूब चली बाहर वालों की राजनीति
पीलीभीत लोकसभा के वोटर तो बाहरी प्रत्याशियों पर प्यार लुटाने में सबसे आगे हैं। 1980 में कांग्रेस ने हरीश कुमार गंगवार को पीलीभीत से टिकट दिया। हरीश बरेली के ट्यूलिया के रहने वाले थे। साफ छवि और सटीक जातीय समीकरणों के दम पर हरीश पहली बार सांसद बनने में सफल रहे। 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर बाहरी को ही पीलीभीत से टिकट दिया। इस बार बरेली के अगरास के रहने वाले भानु प्रताप सिंह ने जीत हासिल की। 1989 में पीलीभीत की जनता ने मेनका गांधी को अपना सांसद चुना। 1996, 1998, 1999, 2004 के चुनाव में उन्होंने लगातार जीत हासिल की। 2009 में उनके  बेटे वरुण ने पीलीभीत से जीत पाई। 2014 में मेनका ने एक बार फिर पीलीभीत की जनता का प्यार पाया।

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धौरहरा में जितिन का स्कोर रहा 1-1
खीरी सीट से कोई भले ही कोई बाहरी प्रत्याशी नहीं जीता हो मगर खीरी की धौरहरा से 2009 में कांग्रेस के जितिन प्रसाद ने जीत हासिल की। जितिन पड़ोसी जिले शाहजहांपुर से आए थे। उनके युवा चेहरे को जनता ने स्वीकार कर लिया। 2014 की मोदी लहर में जितिन का जादू नहीं चला। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस तरह देखा जाए तो परदेशियों को प्यार देने के मामले में धौरहरा लोकसभा की जनता का स्कोर 1-1 रहा।

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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019: Ruhalkhand voters floating on foreigners