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बरेलीपरदेश में धोखा, लौट चलें अब अपने घर

हिन्दुस्तान टीम,बरेलीPublished By: Newswrap
Fri, 16 Apr 2021 09:30 PM
परदेश में धोखा, लौट चलें अब अपने घर

रेलवे जंक्शन के सर्कुलेटिंग एरिया में तपती धूप में 13 युवक बैग और बगल में चादर कंबल दबाए इधर-उधर भटक रहे थे। रिपोर्टर ने उनसे पूछा, तुम कहां से आए हो और कहां जाना है? युवकों ने अपने दर्द की दास्तां बयां कर दी। बोले- अब परदेश नहीं जाऊंगा। अपने गांव और घर में ही रह कर जो भी रुपये मिलेंगे, उसी में गुजारा कर लूंगा। परदेश में सिर्फ धोखा ही है। 21 दिन तक क्वारंटाइन रखा गया। एक सप्ताह नौकरी की। मालिक ने कोरोना से कंपनी का घाटा बताकर आधा-आधा वेतन दिया। अब दूसरे देश में नौकरी न करने का मन बना लिया है। हम सभी युवा जामनगर स्थित एक प्राइवेट कंपनी से नौकरी छोड़कर अपने घर बलिया और आरा (बिहार) जा रहे हैं।

बिहार बलिया के रहने वाले आनंद कुमार, मिराज अंसारी, मुकेश, अमरजीत, रियाजुद्दीन के साथ छह युवक थे। आरा के सात युवक थे। आनन्द, अमरजीत आदि युवकों ने बताया कि एक महीने पहले करीब 2000 किलोमीटर का सफर तय करके रोजगार की तलाश में गए। एक ही कंपनी में सभी को नौकरी मिल गई। कोई सुपरवाइजर था। कोई असिस्टेंट सुपरवाइजर कोई इलेक्ट्रिकल में था, कोई मैकेनिकल में था। जब यहां से गए तो सबसे पहले कोरोना की जांच के नाम पर मानसिक उत्पीड़न हुआ। 21 दिन तक सभी को एक कमरे में अलग-अलग जगह क्वारंटाइन कर दिया गया। कंपनी ने खाना पानी दिया। जब 21 दिन पूरे हो गए तो सबकी की ड्यूटी निर्धारित करा दी गई। जब ज्वाइनिंग की तो 800 से 600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब मानदेय देने की बात की गई। एक सप्ताह के बाद सभी ने वेतन मांगा। तो पांच हजार के 2500 रुपये, तीन हजार के 1500 रुपये, दो हजार के 1000 रुपये पकड़ा दिए। कंपनी प्रबंधन ने हवाला दिया कि कोरोना वायरस फिर से शुरू हो गया है। बाहर माल की सप्लाई प्रभावित है, इसलिए कंपनी घाटे से गुजर रही है। कहा गया कि अगर इतने में काम करो। या फिर जा सकते हो। नौकरी छोड़ने की बात कही गई। फिर क्या सभी ने अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया। अपने देश को वापस चल पड़े। जामनगर से दिल्ली तक ट्रेन से आए। वहां से दिल्ली-बरेली पैसेंजर पकड़ी बरेली आ गए। यहां से लखनऊ फेस्टिवल एक्सप्रेस का टिकट लिया। अब लखनऊ तक जाएंगे। वहां से कोई चौथी ट्रेन पकड़कर बलिया बिहार पहुंचेंगे, लेकिन रोजगार की तलाश में मिली ठोकरों ने कुछ सिखाया है। भले ही कम पैसे मिलें। अपने देश में ही रोजगार करूंगा।

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बस अड्डों पर नहीं बनी श्रमिक हेल्पडेस्क

इस बार कहीं न कहीं से कोविड के चलते रेल और परिवहन विभाग अनजान दिख रहा है। हर रोज दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात से श्रमिक आ रहे हैं। उनके लिए कोई मदद नहीं मिल रही। वह भी एक आम यात्री की ही तरह सफर कर रहे हैं। पिछले साल कोरोना महामारी के समय रेलवे और रोडवेज पर श्रमिक हेल्प डेस्क बनाई गई थी, जिससे वहां से आने वाले प्रवासियों को लेकर किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो। इस बार श्रमिकों को लेकर हेल्प डेस्क तो दूर एक रजिस्टर भी नहीं बनाया गया है। जिसमें श्रमिकों की इंट्री की जा सके।

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ना मास्क और ना सैनेटाइजर

इस बार रेलवे की ओर से कोरोना संक्रमण से बचाव को लेकर कोई व्यवस्था नहीं की गई है, जबकि रेल कर्मचारी अपने-अपने संगठन के माध्यम से पत्र लिखकर मास्क और सैनिटाइजर की मांग कर चुके हैं। पीआरकेएस नेहोली से पहले रेल अधिकारियों को पत्र दिया था। आज तक न तो मास्क मिले हैं और न ही सैनिटाइजर। यहां तक स्वास्थ्य विभाग की जो टीम है, उसको छिड़काव के लिए केमिकल नहीं मिल पाए हैं। जबकि संक्रमण का खतरा रेलवे में लगातार बढ़ता जा रहा है। हर रोज संक्रमित रेल कर्मचारी और रेल यात्री जंक्शन इज्जतनगर, बरेली सिटी पर पहुंच रहे हैं। पिछले साल यात्रियों को भी मास्क और सैनेटाइजर के पाउच दिए गए थे।

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होली ने रोका भीड़ का रास्ता

रोडवेज और रेल के अधिकारियों का कहना है, ट्रेनें और बसें जो खाली चल रही हैं, उसकी वजह है होली का त्योहार। 28 मार्च को होली थी। 26, 27 मार्च तक लोग अपने घरों को चले गए थे। 29 मार्च को रंग खेला गया था। एक-दो अप्रैल को वापसी होती, तो भीड़ वापस लौटती। इसकी बीच महाराष्ट्र आदि राज्यों में कोरोना के कहर शुरू हो गया। पंजाब, गुजरात, यूपी भी संक्रमण फैल गया। फिर तो प्रवासियों की भीड़ थम गई।

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सूने प्लेटफार्म, खाली गाड़ियां

दोपहर 2:00 बजे प्लेटफार्म पर सन्नाटा छाया हुआ था। दो नंबर प्लेटफार्म पूरी तरह से खाली था। एक नंबर प्लेटफार्म पर 4-5 रेल कर्मचारी बैठे थे। रेल कर्मचारियों का कहना है कि दो दिनों से अचानक यात्रियों की कमी देखी जा रही है। लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद, प्रयागराज, देहरादून ,पंजाब की ओर से आने वाले गाड़ियों में भीड़ कम है। बरेली जंक्शन पर 24 घंटे में 700 से 800 यात्री ही आ रहे हैं। कहीं न कहीं लोग संक्रमण के कारण यात्रा करने से बच रहे हैं।

सूने रोडवेज स्टैंड, खाली बसें

दोपहर 3:00 बजे पुराना रोडवेज बस स्टैंड पर 7-8 बसें खड़ी थीं। दिल्ली, बदायूं, हल्द्वानी जाने वाली बसों के कंडक्टर आवाज दे रहे थे। मगर वहां मुसाफिर नहीं थे। रोडवेज बसें खाली थीं। बसों के अंदर 4-6 ही यात्री थे, वह भी बाहर के नहीं बल्कि स्थानीय थे। सेटेलाइट पर भी यही नजारा देखा गया। जहां कभी जबरदस्त भीड़ हुआ करती थी। वहां मुश्किल से 40 यात्री से थे। 15-20 बसें खड़ी थीं, जो बसें रवाना हो रही थीं। उनमें भी 10-12 यात्री ही थे। अधिकारी कहते हैं, इस बार श्रमिक भी नजर नहीं आ रहे। इक्का-दुक्का ही आ रहे हैं। किसी न किसी वजह से पारिवारिक समस्याओं के कारण वापस आ रहे हैं।

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