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कागजों में राउट टाइम, हकीकत में बैलगाड़ी की तरह चल रहीं एक्सप्रेस ट्रेनें

कागजों में राउट टाइम, हकीकत में बैलगाड़ी की तरह चल रहीं एक्सप्रेस ट्रेनें

रेल के सरकारी कागजों में गाड़ियां भले ही राइट टाइम दौड़ रही हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। उन यात्रियों से पूछो जो गाड़ियों के इंतजार में सुबह से शाम तक परेशान रहे। एक्सप्रेस गाड़ियां बैल गाड़ी की तरह चल रही हैं। यात्रियों को 40 किलोमीटर की दूरी तय करने में पौने चार घंटे लग जा रहे हैं।

दोपहर को चले और शाम को पहुंचे। स्पेशल गाड़ियों का तो प्रचार-प्रसार ही नहीं हुआ। 50 से 60 फीसदी गाड़ियां खाली दौड़ रही हैं। स्पेशल को कब कहां रोक दिया जाए कुछ पता नहीं। रेल सूत्रों के मुताबिक, देहरादनू से हावड़ा जाने वाली एक्सप्रेस 13010 लेट थी। मुज्जफरपुर से दिल्ली को जाने वाली गाड़ी 04069 स्पेशल ट्रेन 11 घंटे देरी से आई।

जम्मूतवी-गुवाहटी 12 घंटे और अमृतसर-सहरसा एक्सप्रेस चार घंटे देरी से पहुंची। दिल्ली-दरभंगा स्पेशल नौ घंटे, बरौनी-नई दिल्ली एक्सप्रेस पांच घंटे देरी से आई। कटिहार-आनंदविहार टर्मिनल छ: घंटे विलंब से आई। वाराणसी-बरेली एक्सप्रेस ने तो खूब ही रुलाया। मीरानपुर कटरा स्टेशन से पहले आउटर पर रोक दी गई। वहां करीब 15-20 मिनट खड़ी रही। इसके बाद कटरा स्टेशन पर करीब पौन घंटे रुकी। बिलपुर, टिसुआ, पीताबंरपुर, रसोई, कैंट स्टेशन पर 25-25 मिनट तक रोकी गईं। कभी मालगाड़ियां तो कभी एक्सप्रेस गाड़ियां रोकी गईं।

...तो ये है असल वजह

जब ट्रेनों की धीमी रफ्तार के बारे में रेलवे के एक अधिकारी ने पूछा गया तो आगोश में आकर बोले-आज से 20 साल पहले भी दिल्ली-लखनऊ रेल रूट टू लेन था। आज भी टू लेन ही है। जबकि उस समय 35 से 40 गाड़ियां चौबीस घंटे में गुजरती थीं। 2018 में 200 के आसपास गाड़ियां निकल जाती हैं। हर पांच से सात मिनट में एक गाड़ी निकलती है। जब आगे को रूट खाली होगा, तभी तो गाड़ी रवाना की जाएगी। यही हो रहा है। गाड़ियां लेट भले पहुंचे, सभी चलाई जाती हैं। एक रोकी जाती है तो दूसरी चलाई जाती है।

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  • Web Title:Express trains moving very slow just like ox cart