इस दरगाह पर चार साल चार महीने के बच्चे ही देते हैं झंडे को सलामी, जानिए क्यों?
करीब 400 साल पहले बगदाद से झंडा लेकर बरेली आए थे सैय्यद मीर वतन। उस समय से ही यह परंपरा चली आ रही है। 4 साल 4 महीने के बच्चे को सजाकर झंडे को सलामी दिलवाई जाती है और तब बच्चे की दीनी तालीम शुरू होती है।

उत्तर प्रदेश के बरेली शहर की दरगाह झंडा शरीफ गौसे आजम में बच्चों से जुड़ी एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है। यहां चार साल चार महीने की उम्र पूरी होने पर बच्चों को दरगाह लाकर झंडे और मजार पर खास अंदाज में सलाम पेश कराया जाता है। इस रस्म को देखने के लिए दूर-दराज से जायरीन भी पहुंचते हैं। आस्था और परंपरा से जुड़ी यह अनोखी रस्म बरेली की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
बरेलवी मसलक के दरगाह आला हजरत से जुड़ी दरगाह झंडा शरीफ के सचिव फराज मियां बताते हैं कि परंपरा करीब 400 साल पुरानी है। बताया जाता है कि इराक के बगदाद से सैय्यद मीर वतन झंडा लेकर बरेली आए थे। उसी समय से दरगाह झंडा शरीफ में यह रस्म शुरू हुई, जो समय के साथ एक परंपरा बन गई और आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जा रही है। दरगाह प्रबंधन के मुताबिक इस रस्म का उद्देश्य बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और अच्छी तालीम के लिए दुआ करना होता है। बरेली की यह परंपरा आस्था, संस्कृति और विरासत का अनोखा उदाहरण मानी जाती है। पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अपने बच्चों को दरगाह लाकर यह रस्म अदा कराते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस रस्म के जरिए बच्चों के जीवन की शुरुआत दुआ और आशीर्वाद के साथ होती है, जो उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना का प्रतीक है।
रस्म अदायगी के बाद ही शुरू होती है दीनी तालीम
इस विशेष रस्म के तहत जब बच्चे की उम्र चार साल और चार महीने पूरी हो जाती है, तब उसके परिवार के लोग उसे दरगाह लेकर आते हैं। बच्चों को फूलों की मालाओं से सजाकर मजार के पास लाया जाता है। इसके बाद बच्चे से झंडा शरीफ और मजार पर सलाम कराया जाता है। इस दौरान परिवार के सदस्य और मौजूद जायरीन बच्चे की सलामती, कामयाबी और बेहतर भविष्य के लिए दुआ करते हैं। परंपरा के अनुसार झंडा शरीफ पर सलाम करने के बाद ही बच्चे की दीनी तालीम शुरू कराई जाती है।
हर साल करीब 800 बच्चे करते हैं रस्म अदा
दरगाह प्रबंधन के अनुसार यह रस्म किसी खास दिन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे साल निभाई जाती है। हर वर्ष 800 से अधिक बच्चे अपने परिवार के साथ दरगाह झंडा शरीफ पहुंचकर यह रस्म अदा करते हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। खास अवसरों और धार्मिक आयोजनों के दौरान दरगाह पर जायरीन की संख्या और भी बढ़ जाती है, जिससे यहां का माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक और श्रद्धा से भरा दिखाई देता है।
दरगाह कमेटी निभाती है अहम भूमिका
दरगाह झंडा शरीफ की इस परंपरा को व्यवस्थित तरीके से निभाने में दरगाह कमेटी की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। दरगाह के सचिव फराज मियां की देखरेख में यह रस्म पूरी परंपरा और सम्मान के साथ संपन्न कराई जाती है। कमेटी यह सुनिश्चित करती है कि आने वाले परिवारों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और रस्म पूरी गरिमा के साथ अदा हो।


