बोले बाराबंकी: आशा कार्यकिर्त्रयों के पास बोझ ज्यादा,मानदेय कम
Barabanki News - बाराबंकी में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली आशा कार्यकत्रियों ने सरकार से बकाया भुगतान और मानदेय बढ़ाने की मांग की है। काम बढ़ने के बावजूद उन्हें उचित मानदेय नहीं मिल रहा, जिससे आर्थिक संकट बढ़ रहा है। आशा कार्यकत्रियों ने कहा कि उन्हें सरकारी कर्मचारियों जैसा दर्जा और सुविधाएं मिलनी चाहिए।
तहसील व ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे मजबूत कंधा मानी जाने वाली आशा कार्यकत्रियां आज समस्याओं से जूझ रही हैं। सरकार की ओर से मातृ-शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, जनसंख्या नियंत्रण, पोषण अभियान, दवा वितरण, प्रसव संबंधित सेवाएं, अस्पताल रेफर, दवा उपलब्ध कराना, जागरूकता अभियान जैसी जिम्मेदारियां निभाने वाली आशाएं आज भी उचित मानदेय और सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। आशा कार्यकत्रियों ने बताया कि काम तो बढ़ते जा रहे हैं लेकिन मानदेय में कोई बढ़ोतरी नहीं की जा रही है। सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं सिर्फ फाइलों और रिकॉर्ड में दिखाई देती हैं, जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।

एक आशा कार्यकत्री ने बताया कि हम महीने भर मेहनत करते हैं, रात-दिन मरीजों का फोन उठाते हैं, डिलीवरी में अस्पताल ले जाते हैं, लेकिन मानदेय इतना कम है कि घर चलाना मुश्किल हो जाता है। बोले बाराबंकी: आशा कार्यकिर्त्रयों के पास बोझ ज्यादा,मानदेय कम बाराबंकी में ग्रामीण व शहरी स्वास्थ्य मिशन की रीढ़ मानी जाने वाली आशा एवं स्वास्थ्य सहयोगी कार्यकत्रियों ने शासन-प्रशासन से बकाया भुगतान तुरंत जारी करने की मांग की है। उनका कहना है कि आभा आईडी, जननी सुरक्षा योजना, आयुष्मान कार्ड, टीकाकरण, घर-घर सर्वेक्षण और अन्य योजनाओं का काम पूरा करने के बाद भी महीनों से भुगतान लंबित पड़ा है। आशाओं का कहना है कि अधिकारियों द्वारा मीटिंग में हर बार सिर्फ आश्वासन दिया जाता है, जबकि धरातल पर कोई कार्रवाई नहीं दिख रही। इस कारण उन्हें आर्थिक संकट, घर चलाने में परेशानी और सामाजिक दबाव तक झेलना पड़ रहा है। कई आशा कार्यकत्रियों ने बताया कि हम रात-दिन क्षेत्र में लोगों के घर जाते हैं, गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाते हैं, टीकाकरण करवाते हैं, लेकिन भुगतान महीनों से अटका है। भुगतान न मिलने के कारण कार्यकत्रियों में रोष बढ़ा, स्वास्थ्य सेवाओं पर असर की आशंका, योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती, लोगों में सरकारी व्यवस्था को लेकर अविश्वास बना हुआ है। आशाओं ने बताया कि कई बार उन्हें अपनी जेब से मोबाइल रिचार्ज, प्रिंटिंग, यात्रा व अन्य खर्च करना पड़ता है, लेकिन भुगतान न मिलने के कारण वे लगातार आर्थिक दबाव में हैं। आशा कार्यकत्रियों की मुख्य मांगें है कि सभी बकाया भुगतान तत्काल जारी किए जाएं। हर योजना का भुगतान समय सीमा के भीतर किया जाए। पोर्टल पर लंबित प्रकरणों को अपडेट किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी योजनाएं इन आशाओं के बिना संभव नहीं, इसलिए उनके साथ न्याय होना ज़रूरी है। अब सभी की नजर प्रशासन पर है कि कब तक लंबित भुगतान जारी होता है, आशाओं को उनका उचित अधिकार मिलता है। आशा एवं आशा संगिनी को राज्य कर्मचारी का मिले दर्जा ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली की सबसे अहम कड़ी मानी जाने वाली आशा और आशा संगिनी अब अपने अधिकार और सम्मान की लड़ाई के लिए एकजुट हो चुकी हैं। लंबे समय से केवल मानदेय और प्रोत्साहन राशि के भरोसे काम कर रही आशाओं ने अब सरकार से राज्य कर्मचारी का दर्जा देने की मांग तेज कर दी है। इस मांग को लेकर प्रदर्शन, ज्ञापन और बैठकें लगातार हो रही हैं। आशाओं का कहना है कि पिछले कई वर्षों से उनसे स्वास्थ्य विभाग के स्थाई कर्मचारियों की तरह काम लिया जा रहा है, लेकिन न रोजगार स्थाई है, न सेवा सुरक्षा, न नियमित वेतन। आशाओं का कहना है कि टीकाकरण, आयुष्मान कार्ड, जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन, गर्भवती महिलाओं की देखभाल, प्रसव में सहयोग, सर्वेक्षण, स्वास्थ्य अभियान और आपदा के समय ड्यूटी सहित दर्जनों जिम्मेदारियां निभाने के बाद भी उन्हें उतनी सुविधाएं नहीं मिलतीं जितनी किसी स्थाई कर्मचारी को मिलती हैं। एक आशा कार्यकत्री ने कहा कि काम पूरा सरकारी कर्मचारी जैसा, लेकिन दर्जा और वेतन मजदूर से भी कम है ये हमें स्वीकार नहीं है। आशाओं की प्रमुख मांगे है कि राज्य कर्मचारी का दर्जा दिया जाएं। बीमा और मेडिकल सुविधा दी जाएं। आशा संगिनी का कहना है कि हम सिर्फ कागज़ों में स्वास्थ्य कर्मी नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था की असली रीढ़ हैं। अब हमे सम्मान के साथ नौकरी चाहिए। आशाओं ने यह भी कहा है कि अगर उनकी मांगों पर सरकार ने जल्द फैसला नहीं लिया तो वे धीरे-धीरे काम बंद करने पर भी विचार कर सकती हैं। जिससे टीकाकरण, मातृत्व सेवाओं, आयुष्मान पंजीकरण और कई योजनाओं पर असर पड़ सकता है। ब्लॉकों में लगे विशेष शिविर, आशा व आशा संगिनी का भी बने आयुष्मान बारांबकी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभालने वाली आशा कार्यकत्री और आशा संगिनी अब अपनी सुविधा और अधिकारों के लिए आवाज बुलंद कर रही हैं। इस बार मांग उठी है कि ब्लॉक स्तर पर विशेष शिविर लगाकर आशा व आशा संगिनी का भी आयुष्मान कार्ड बनाया जाए, ताकि उन्हें भी स्वास्थ्य सुविधा का लाभ मिल सके। आशाओं का कहना है कि वे महीनों तक गांवों में घूमकर दूसरों के आयुष्मान कार्ड बनवाती हैं, घर-घर फॉर्म भरती हैं और योजनाओं का प्रचार करती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि कई आशाओं का खुद का आयुष्मान कार्ड अब तक नहीं बना है। आशा कार्यकत्रियों ने बताया कि टीकाकरण, जननी सुरक्षा योजना, आभा आईडी, आयुष्मान कार्ड, सर्वेक्षण और मरीज रेफर जैसे दर्जनों जिम्मेदार कामों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद उन्हें अक्सर फॉर्म, कागजी कार्रवाई और तकनीकी त्रुटियों के कारण अपना ही कार्ड बनवाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। आशा कार्यकत्री की बड़ी मांग, समय पर हो भुगतान बाराबंकी। शहर से लेकर तहसील तक स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली आशा कार्यकत्रियों ने अब सरकार से निश्चित मासिक वेतन और अलग से इंसेंटिव प्रणाली लागू करने की मांग तेज कर दी है। आशाओं का कहना है कि वर्तमान समय में उनसे अनगिनत स्वास्थ्य योजनाओं की जिम्मेदारी ली जा रही है, लेकिन बदले में मिलने वाला मानदेय अस्थाई और अनियमित है। महीनों तक भुगतान न मिलना और बार-बार पोर्टल, अधिकारी और बैंक का चक्कर लगाना उनके लिए बड़ा संकट बन चुका है। आशा कार्यकत्रियों के अनुसार वर्तमान में वे निम्न कार्यों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन और देखभाल, प्रसव में अस्पताल में सहयोग,टीकाकरण, आयुष्मान कार्ड व आधार लिंकिंग, जननी सुरक्षा योजना, पोषण अभियान, घर-घर स्वास्थ्य सर्वेक्षण करती है, लेकिन इन्हीं कामों का भुगतान न तो तय समय पर मिलता है और न ही निश्चित राशि में। एक आशा कार्यकत्री ने कहा कि हमारे लिए महीने की कमाई अनुमान पर चलती है। कभी 800 रुपए मिल जाते हैं, कभी 2000 रुपए कभी महीनों तक कुछ नहीं। इतने बड़े जिम्मेदारी वाले काम में स्थाई वेतन जरूरी है। इनकी भी सुनिए कई बार सर्वे और टीकाकरण में गांव-गांव घूमना पड़ता है, लेकिन यात्रा भत्ता नहीं मिलता। मानदेय समय पर मिले व बढ़ाया जाए, तभी हम पूरी क्षमता से काम कर सकेंगे। -अनीता वर्मा काम का बोझ ज्यादा टीकाकरण, प्रसव सहायता, आयुष्मान योजना और अन्य सरकारी योजनाओं का बोझ बहुत अधिक है। -ममता देवी आशा कार्यकर्ताओं की मांग सिर्फ मानदेय बढ़ाने की नहीं, बल्कि सुरक्षा, सम्मान और स्थायी नौकरी का दर्जा देने की है। सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिलना चाहिए। -शीला देवी हमसे सरकारी कर्मचारियों की तरह काम कराया जाता है, सुबह से शाम तक हम मेहनत करते है तो हमें भी वही दर्जा मिलना चाहिए। -सीमा देवी सम्मान और सुरक्षा के लिए नियम आशा कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार करने वालों पर कार्रवाई के लिए हेल्पलाइन और कानूनी संरक्षण की व्यवस्था लागू की जाएं। -प्रियंका मेडिकल किट उपलब्ध कराना हर आशा कार्यकर्ता को स्मार्टफोन, इंटरनेट डाटा, स्वास्थ्य किट, प्राथमिक दवाइयां और प्रशिक्षण नियमित रूप से दिया जाए। -कमला कुमारी बोले जिम्मेदार आशा बहुओं की सबसे बड़ी समस्या समय पर कार्यों का भुगतान न होना है। सुरक्षा और सम्मान का ध्यान विभाग को देना चाहिए। आशा कार्यकत्रियों के हक व अधिकार के लिए संगठन आवाज उठाता रहता है। अधिकारियों तक समस्याएं पहुंचाकर समाधान कराया जाता है। सुनीता वर्मा, जिलाध्यक्ष आशा बहू संघ।

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