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अस्तित्व खोते जा रहे हैं प्राचीन कुएं

अस्तित्व खोते जा रहे हैं प्राचीन कुएं

प्राचीन कुए की अनदेखी के चलते अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। कुछ समय पहले तक ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल का मुख्य साधन यही प्राचीन कुए हुआ करते थे। इंसान तो प्यास बुझाते ही थे ,पशु पक्षी भी अपना हलक तर कर कुओ में भरे पानी से अठखेलियां करते थे।

प्रदेश सरकार तालाबो पोखरों के नाम पर पानी की तरह धन बहा रही है ,लेकिन प्राचीन कुए जीर्ण शीर्ण दशा में पानी की जगह आँसू बहाते दिख रहे है । जमीनी हकीकत देखी जाए तो गांवों के बड़े बुजर्गो द्वारा बनवाये गए आधे से अधिक कुए जमीदोज हो चुके है। जो बचे है उनमें झाड़झकार और तलहटी से उड़ती धूल ही नजर आएगी । सरकारी कागजी आंकड़े देखे जाए तो गुजरे एक दशक में कुओ के जीर्णोद्धार सहित कुओ की साफ सफाई के नाम पर लाखों रुपये का वारा न्यारा कर दिया। श्याम चरण बताते है क़ि पहले कुओ के घाट हुआ करते थे ,और उन घाटों में एक रस्सी और बाल्टी चौबीसों घण्टे पड़ी रहती थी ताकि कोई राहगीर प्यासा ना लौट सके । गर्मियां शुरू होते ही गांव के बड़े बुजुर्ग पूरे गांव से चंदे के रूप में अनाज लिया करते थे और फिर बेच के धन से चरही नर्मिाण करवा करवाते थे। ताकि पशुओ आकर पानी पी ले। अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि यदि कुओं की सफाई करवा दी जाए तो उसमें पानी आ सकता है।

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  • Web Title: Ancient wells are losing their existence