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Balrampur News - फोटो-02 : बलरामपुर सदर ब्लॉक के कलंदरपुर गांव में मिट्टी के नमूने संकलित करते कृषि विभाग के अधिकारी व कर्मचारीजिले के नौ ब्लॉकों में मिट्टी के लिए गए

फोटो-02 : बलरामपुर सदर ब्लॉक के कलंदरपुर गांव में मिट्टी के नमूने संकलित करते कृषि विभाग के अधिकारी व कर्मचारी फोटो-03 : बहादुरापुर स्थित भूमि परीक्षण प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच करते डॉ. छोटेलाल रावत
जिले के नौ ब्लॉकों में मिट्टी के लिए गए नमूने, कृषि योग्य भूमि पर संकट, मुख्य पोषक तत्वों की कमी से लोगों के स्वास्थ्य पर मंडरा रहा खतरा
18 हजार खेतों में मिट्टी की सेहत खराब, बंजर होने का खतरा
मृदा परीक्षण रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, पोषक तत्वों की आई भारी कमी
मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह
प्रति हेक्टेयर खेत में कम से कम चार से पांच टन गोबर की खाद का प्रयोग करने का सुझाव
बलरामपुर। मंगल देव गिरि
जिले के कृषि क्षेत्र से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। खेतों में मिट्टी की सेहत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है, जो भविष्य में एक बड़े संकट का संकेत है। मृदा परीक्षण विभाग की तरफ से जारी हालिया रिपोर्ट में जिले के नौ विकास खंडों से लिए गए नमूनों में 18 हजार खेतों में पोषक तत्वों की भारी कमी पाई गई है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में उपजाऊ जमीन बंजर में तब्दील हो सकती है। मुख्य पोषक तत्वों की कमी से लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडरा रहा है। मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। प्रति हेक्टेयर खेत में कम से कम चार से पांच टन गोबर की खाद का प्रयोग करने का सुझाव दिया गया है।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय विकास योजना
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय विकास योजना के तहत वर्ष 2025-26 में कृषि विभाग की तरफ से मृदा नमूना एकत्रीकरण अभियान अप्रैल में चलाया गया। नमूनों के जांच में असंतुलित खाद का उपयोग और गिरता कार्बन स्तर पाया गया। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस संकट का सबसे प्रमुख कारण रासायनिक खादों का असंतुलित उपयोग और जैविक खादों (जैसे गोबर की खाद) की भारी अनदेखी है। किसान अक्सर मिट्टी की जांच कराए बिना ही यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग करते हैं। रिपोर्ट बताती है कि लिए गए नमूनों की जांच में यह पाया गया कि अधिकांश खेतों में आर्गेनिक कार्बन का स्तर न्यूनतम सीमा से भी नीचे चला गया है। जांच के मुख्य निष्कर्ष यह है कि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा में 58 प्रतिशत और जिंक में 42 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसके साथ ही आर्गेनिक कार्बन का स्तर भी तेजी से नीचे गिरा है। वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि अपने खेतों में मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक देसी खाद का प्रयोग करें। आमजन के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ रहा है। मिट्टी की बिगड़ती सेहत का असर सिर्फ फसलों के उत्पादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से लोगों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है। पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी में पैदा होने वाली फसलों के सेवन से मानव शरीर में भी उन तत्वों की कमी हो रही है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ समाज के लिए स्वस्थ मिट्टी का होना अनिवार्य है।
पोषक तत्वों की कमी का चौंकाने वाला आंकड़ा
मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई है। नमूनों के आधार पर विभिन्न तत्वों की कमी का प्रतिशत जांच में दर्शाया गया है। जांच रिपोर्ट में नाइट्रोजन 93 प्रतिशत, आर्गेनिक कार्बन 76 प्रतिशत, सल्फर 88 प्रतिशत, आयरन 89 प्रतिशत, जिंक 68 प्रतिशत, बोरान 72 प्रतिशत व मैंगनीज 57 प्रतिशत पाया गया है।
खेतों को बंजर होने से ऐसे बचाएं
मिट्टी की उर्वरता वापस लाने के लिए वैज्ञानिकों ने विशेष परामर्श जारी किया है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे प्रति हेक्टेयर खेत में कम से कम चार से पांच टन गोबर की खाद का प्रयोग करें। दो से तीन टन केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) का प्रयोग करना भी लाभकारी होगा। जिन क्षेत्रों में मिट्टी का पीएच मान 8.5 से ऊपर है, वहां प्रति हेक्टेयर पांच क्विंटल जिप्सम का उपयोग करने की सिफारिश की गई है। मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग सुनिश्चित करें। हरैया सतघरवा ब्लॉक के ग्राम नंदनगर, बजरडीह व अमवा और श्रीदत्तगंज ब्लॉक के भितवरिया कला के साथ ही विकास भवन भी में हजारों किसानों को मृदा परीक्षण रिपोर्ट देकर उन्हें खेतों को बंजर होने से बचाने का तरीका बताया गया। कृषि विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी गांवों में जाकर किसानों को मृदा रिपोर्ट वितिरत कर जागरूक करने में जुटे हुए हैं।
कोट :
किसानों को अब जागरूक होने की आवश्यकता है। केवल रासायनिक खेती के भरोसे रहना भूमि को विनाश की ओर ले जा सकता है। समय-समय पर मिट्टी की जांच कराना अनिवार्य है। अब जैविक विधियों को अपनाना ही भविष्य की खेती का एकमात्र विकल्प है।
डॉ. छोटे लाल रावत, अध्यक्ष मृदा परीक्षण प्रयोगशाला बलरामपुर
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