रमजान रूह की पाकीज़गी और आत्मसंयम का महीना: हाजी शफीक अहमद

Feb 19, 2026 05:05 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, बलरामपुर
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Balrampur News - रमजान का पवित्र महीना रोजेदारों को आत्मसंयम सिखाता है। हाजी शफीक अहमद के अनुसार, रोजा केवल मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि हर धर्म में उपवास की परंपरा रही है। रमजान में इबादत का सवाब कई गुना बढ़ जाता है और जरूरतमंदों की मदद का विशेष महत्व है।

रमजान रूह की पाकीज़गी और आत्मसंयम का महीना: हाजी शफीक अहमद

महराजगंज तराई, संवाददाता। रमजान का पवित्र महीना गुनाहों से तौबा और बुराइयों से बचने की तरबियत देकर रोजेदारों की रूह को पाकीज़गी और दिल को सुकून बख्शता है। यह बातें हाजी शफीक अहमद ने कही। उन्होंने बताया कि रमजान का हर रोज़ा, उसका हर घंटा और हर मिनट बेहद अहमियत रखता है। रोजा एक खास इबादत है, जिसका उद्देश्य इंसान में तकवा यानी आत्मसंयम पैदा करना है। उन्होंने कहा कि रोजा केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं, बल्कि हर कौम और हर दौर में किसी न किसी रूप में उपवास की परंपरा रही है। कुरान के अनुसार रोजे का मकसद इंसान के भीतर संयम और परहेज़गारी पैदा करना है।

हदीस में रमजान को हमदर्दी और गमख्वारी का महीना बताया गया है, जिसमें जरूरतमंदों की मदद और भलाई पर विशेष जोर दिया गया है। रमजान में की गई इबादत और नेकियों का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। जकात और फितरा अदा करने से रोजी में बरकत आती है। उन्होंने कहा कि रोजेदार को झूठ, चुगली, बेईमानी और अन्य बुराइयों से तौबा कर लेनी चाहिए। दिखावे से बचते हुए चुपचाप जरूरतमंदों की मदद करना ही अल्लाह को प्रिय है। रमजान आत्मशुद्धि और अल्लाह से करीब होने का सर्वोत्तम अवसर है।

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