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फावड़े के प्रहार से बहने लगी थी रक्त धारा

फावड़े के प्रहार से बहने लगी थी रक्त धारा

स्थानीय गांव में स्थित गिरनार बाबा मंदिर पर सावन माह में भक्तों की भारी भीड़ होती है। शिवरात्रि के दिन मंदिर पर भव्य मेला का आयोजन होता है, जिसमें भारी भीड़ जुटती है।

एक जनश्रुति के मुताबिक करीब दो हजार साल पहले गिरनार पर्वत से पहुंचे एक महात्मा पूर गांव के जंगल में तपस्या करने लगे। एक बार जंगल में गाय चरा रहे कुछ चरवाहों की नजर शिवलिंग रुपी एक पत्थर पर पड़ गयी। जमीन में गड़े पत्थर को घर ले जाने के लिये चरवाहों ने पूरे दिन उखाड़ने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। अंधेरा होने के बाद चरवाहे घर लौट गये और अगले दिन फावड़ा आदि लेकर शिवलिंग रुपी पत्थर को खोदने पहुंच गये। लोगों का कहना है कि चरवाहे पूरे दिन मेहनत कर गड्ढ़ा खोदते और रात होने पर घर चले जाते। दूसरे दिन वह वापस लौटते तो उनके द्वारा खोदा गया गड्ढा भर जाता था। यह प्रक्रिया कई दिनों तक चली लिहाजा गुस्से में चरवाहों ने शिवलिंगनुमा पत्थर पर फावड़े से प्रहार कर लिया, जिसके बाद उसमें से खून की धारा निकलने लगी। यह जानकारी तपस्या कर रहे महात्मा को हुई तो वह वहां पहुंचकर पूजा-पाठ करने लगे। कालांतर में उन्हीं के नाम पर इस मंदिर का नाम गिरनार शिव मंदिर पड़ा, जिसका निर्माण एक बनिया परिवार ने कराया। फावड़े के चोट से क्षतिग्रस्त शिवलिंग को तांबा व अन्य धातुओं के मिश्रण से तैयार चादर से मढ़ा गया है। मंदिर के पास एक ब्राह्मण परिवार ने पोखरे का निर्माण कराया। मान्यता है कि सच्चे मन से शिव की अराधना करने वाले की सभी मनोकामना पूरी होती है। 

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  • Web Title:Mythological Story of Shiva Temple in Ballia