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फेसबुक-वाट्सएप को जरिया बनायें, नशा नहीं

फेसबुक-वाट्सएप को जरिया बनायें, नशा नहीं

'आकाश भी मस्तक नीचे कर, उद्घोष हमारा गायेगा...' आईएएस की परीक्षा में 306वीं रैंक हासिल करने वाले बागी धरती के होनहार सपूत शशांक शेखर सिंह ने अपने फेसबुक पर 11 मार्च 2017 को यह पोस्ट डाली थी। ये लाइन लिखते समय ही शायद उन्होंने दृढ़संकल्प कर लिया था कि उन्हें 'हाकिम' बनना ही है। जी हां, आईएएस नहीं हाकिम। उनके बाबा बचपन में उनसे यही कहते थे 'बबुआ बड़ होके हाकिम बनी।' छात्र राजनीति में सक्रिय रहे शशांक ने अपना पूरा एक साल सिर्फ और सिर्फ सिविल सेवा की परीक्षा के लिए समर्पित किया और पहले ही प्रयास में शानदार कामयाबी हासिल कर युवाओं के रोल मॉडल बन गये। गोन्हियाछपरा गांव के सरकारी स्कूल से प्राइमरी की पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई दिल्ली से करने वाले शशांक ने अपना कैरियर बनाने में जुटे छात्र-छात्राओं के लिए बेहद जरूरी टिप्स दिये। सोशल मीडिया (फेसबुक व वाट्सएप) को पढ़ाई में बाधा मानने के तर्क को खारिज करने की बजाय सुझाव दिया कि इन तकनीकों को अपनी जानकारी बढ़ाने का जरिया बनायें, नशा नहीं। माना कि खुद उनकी तैयारी में सोशल साइट्स की अहम भूमिका रही। हां, इसे खुद पर हावी नहीं होने दिया। 2013 से 2015 तक कांग्रेस की छात्र इकाई अखिल भारतीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष और फिर राष्ट्रीय महासचिव रहे शशांक ने छात्र हितों के लिए कई अहम लड़ाइयां लड़ीं। 'विद्यार्थी पंचायत' के जरिये कालेजों में जाकर वहां की समस्याएं सुनीं और कालेज प्रबंधन से बात कर उनका समाधान भी कराया। राष्ट्रीय पदाधिकारी बनने के बाद उन्होंने करीब एक साल पहले खुद को यूपीएससी के लिए तैयार किया। 'हिन्दुस्तान' से बातचीत के दौरान शशांक ने एक बार भी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे अपने गांव, अपनी माटी या अपने लोगों से अलग हैं। उनके फेसबुक पर लिखी इन पंक्तियों की तरह : 'एक खास सी वजह है मेरे झुक के मिलने की, मिट्टी का बना हूं गुरूर मुझ पर जंचता नहीं।' राजनीति व पढ़ाई का जबरदस्त घोल बलिया। शशांक ने दिल्ली कॉलेज आफ इंजीनियरिंग से बीटेक किया तो वहां भी वे अपने बैच में टॉपर रहे। एमटेक में भी उन्होंने कालेज में पहला स्थान हासिल किया। यह परिणाम साबित करता है कि छात्र राजनीति में सक्रियता के बाद भी उन्होंने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। अलबत्ता, उन्होंने सक्रिय राजनीति की बात को भी खारिज किया। बोले, राजनीति नहीं की, बस एक्टिविस्ट की तरह काम किया। पढ़ाई के दौरान दोस्तों के रास्ते में कोई बाधा आयी तो उसके लिए संघर्ष किया। छात्र-छात्राओं के लिए बसें चलवाने की बात हो या फिर उनके लिए छात्रावास की। शशांक ने इन संघर्षों का नेतृत्व किया और कामयाब हुए। एक समय में वे दिल्ली में पूर्वांचल के छात्र-छात्राओं का 'फेस' बन गये थे। बोले, शायद यह हुनर बागी माटी का होने की वजह से ही मिला था। बस, जिंदगी का एक साल लगा दो' एनएसयूआई का प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में प्रत्याशी उतारने तथा उन्हें जिताने का दायित्व निभा चुके शशांक ने अपने पहले ही प्रयास में यह कामयाबी हासिल की है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्र-छात्राओं को नसीहत दी कि बस, जिंदगी के एक साल समर्पित होकर परीक्षा में लगा दो। सफलता अवश्य मिलेगी। हताश होने की जरूरत नहीं। अभिभावकों से भी अपील की कि वे बच्चों को गाइड तो करें लेकिन उनपर दबाव न बनायें। उनके लिए खुला मैदान दें ताकि वे दौड़ लगा सकें। तैयारी में अखबारों की बड़ी भूमिका शशांक के मुताबिक सिविल सेवा की तैयारी में अखबारों की अहम भूमिका रही। हिन्दी व अंग्रेजी अखबारों के वे नियमित पाठक रहे। बोले, सामान्य अध्ययन की तैयारी में अखबारों का गहनता से अध्ययन व तथ्यों को जुटाना काफी महत्वपूर्ण है। वाट्सएप का इस्तेमाल करें लेकिन संभलकर शशांक के अनुसार तकनीक के इस दौर में बच्चों को वाट्सएप-फेसबुक से अलग नहीं किया जा सकता। हां, इस बात का ध्यान रखना होगा कि इसका प्रयोग सकारात्मक करें। अभिभावकों व शिक्षकों को चाहिए कि इसके लिए बच्चों की काउंसिलिंग करें। छात्र-छात्राओं को चाहिए कि वाट्सएप का इस्तेमाल कम से कम करें। प्रयोग कर ही रहे हैं तो पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले अपने साथियों का ग्रुप बनायें और उनके साथ पढ़ाई से जुड़ी बातें साझा करें।

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