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अल्टीमेटम की उल्टी गिनती, बचाव कार्य तेज

अल्टीमेटम की उल्टी गिनती, बचाव कार्य तेज

दूबेछपरा के पास कटानरोधी बचाव कार्य के लिये जिलाधिकारी द्वारा तय की गयी समय सीमा जैसे-जैसे करीब आती जा रही है, बचाव कार्य में भी तेजी देखने को मिल रही है। पिछले एक सप्ताह से धीमी गति से चल रहा बचाव कार्य शुक्रवार से एक बार फिर रफ्तार पकड़ता दिख रहा है। हालांकि इतना तय माना जा रहा है कि इतने कम बचे दिनो में विभाग कितना भी हाथ-पैर मार ले, निर्धारित 30 जून तक कार्य पूरा नहीं हो पायेगा। कटानरोधी कार्य को पूरा करने के लिये डीएम के साथ ही सांसद व विधायक की ओर से दिये गये अल्टीमेटम की तिथि नजदीक आने के साथ ही विभागीय अधिकारियों के अभी से हाथ-पांव फूलने लगे हैं। आलम यह है कि कल तक जो अधिकारी पेड़ों की छाया के नीचे बैठकर हुक्म बजाते थे, आज चिलचिलाती धूप में भी कार्य की गति बढ़ाने के लिये दिशा-निर्देश देते दिख रहे हैं। यही नहीं पिछले दिनों की अपेक्षा शुक्रवार को कार्यस्थल पर मजदूरों की संख्या भी अधिक नजर आयी। देखना यह है कि इन बचे दिनो में विभाग अपने लक्ष्य को कहां तक पूरा कर पाता है। इस सम्बन्ध में एसडीओ सीएम शाही ने बताया कि नदी के सतह का करीब 70 प्रतिशत कार्य पूरा हो गया है। शेष कार्य निर्धारित तिथि तक पूरा कर लिया जायेगा। बोल्डर गिराने का कार्य शुरू रामगढ़। कार्यस्थल पर बोल्डर गिराने का कार्य युद्धस्तर से शुरू हो गया है। शुक्रवार को दर्जनों गाडियां कार्यस्थल पर बोल्डर गिरा रही थीं। दो दिन पहले बोल्डर के अभाव में पिचिंग का कार्य ठप हो गया था। 'हिंदुस्तान' ने अपने 21 जून के अंक में 'बोल्डर के अभाव में बचाव कार्य ठप' शीर्षक से प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी। इसके बाद विभाग की काफी किरकिरी हुयी थी। विभाग का कहना है कि नो-इंट्री की वजह से थोड़ी बहुत दिक्कत आयी थी। फिलहाल बोल्डरों की वजह से कार्य बाधित नहीं होगा। कार्य में देरी को विभाग ही नहीं सिस्टम भी दोषी! रामगढ़। देवेन्द्र नाथ तिवारी कटानरोधी बचाव कार्य की लेट-लतीफी के लिये केवल विभाग ही जिम्मेदार है या सिस्टम भी दोषी है, यह एक बड़ा सा सवाल बन गया है। जिस कार्य की तेजी के लिये आज हाय तौबा मची है उस कार्य के लिये 18 मई को शासन ने धन स्वीकृत जबकि पिछले साल की आपदा के बाद इसके लिये बाढ़ खंड ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में ही प्रोजेक्ट तैयार कर जीएफसीसी (बाढ़ नियंत्रण कक्ष) पटना को भेज दिया था। साथ ही विभाग ने दूबेछपरा से केहरपुर-चौबेछपरा अवशेष होते हुए हुकुमछपरा के स्पर संख्या 23 तक करीब दो किमी का एक दूसरा प्रोजेक्ट भी बनाकर जीएफसीसी पटना को भेजा। जीएफसीसी पटना ने दूबेछपरा वाले प्रोजेक्ट की फाइल को तो अग्रिम कार्यवाही के लिये रख लिया था लेकिन दूसरे प्रोजेक्ट को अस्वीकार कर दिया। उस समय जिम्मेदारों द्वारा न तो कोई प्रयास ही किया गया और न ही कोई प्रतिक्रिया हुयी। बात यही समाप्त नहीं हुई। मार्च में जीएफसीसी से इसकी स्वीकृति मिल जाने के बाद विभाग के लखनऊ प्रथम बैंच पर पहली मीटिंग की औपचारिकता के लिये फाइल एक माह से भी अधिक समय तक पड़ी रही। सूत्रों के अनुसार यहां की औपचारिकता पूरी हो जाने के बाद करीब 20 दिन फाइल वित्त में पड़ी रही। सांसद व विधायक के प्रयास से मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद 18 मई को शासन से धन स्वीकृत हुआ और 26 मई को अवमुक्त हो गया। सूत्रों की माने तो पहले विभाग विशेष परिस्थियों में प्रोजेक्ट के लिये धन अवमुक्त होने से पहले भी नामित ठेकेदारों से कार्य प्रारम्भ करा देता था, लेकिन ई-टेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद कोई भी ठीकेदार धन आवंटन से पूर्व कार्य प्रारंभ को तैयार नहीं हो रहा है। तटवर्तियों के अनुसार विभाग के साथ यदि सिस्टम भी तेजी दिखाया होता तो शायद जो धन अब अवमुक्त हुआ है वह कम से कम एक माह और पूर्व ही अवमुक्त हो गया होता। तब शायद आज वाली स्थिति ही नहीं होती।

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  • Web Title:Countdown to ultimatum, rescue work faster