बोले बहराइच : महिला श्रमिकों को मजदूरी ठीक मिले तो दूर हो समस्या
संक्षेप: Bahraich News - महिला श्रमिकों का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। उचित मजदूरी न मिलने से परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर रहती है। घरेलू काम करने वाली महिलाएं कर्ज में डूबी रहती हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पातीं। काम के दौरान उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे असुरक्षा और शोषण।
महिला श्रमिकों की जिंदगी संघर्षों से भरी हुई है। पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती। जिससे परिवार में हमेशा आर्थिक तंगी बनी रहती है। घरेलू काम करनेवाली महिलाओं का कहना है कि वे रोज दूसरे के घरों में काम कर जीवन यापन करती हैं। असंगठित होने के कारण इन्हें बदहाली का दंश झेलना पड़ रहा है। उन्हें राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड और बुजुर्ग महिलाओं को वृद्धावस्था पेंशन तो मिलती है, पर विपरीत परिस्थिति में इन्हें कर्ज लेना पड़ता है। फिर उसे चुकाने में वे महिलाएं बेदम हो जाती हैं। इस बदहाली को दूर करने के लिए वे सरकारी पहल की मांग कर रही हैं।

आर्थिक दुश्वारियों से भरण-पोषण मुश्किल हो गया है। बीमारी या हादसे की स्थिति में इन्हें कर्ज लेना पड़ता है और फिर उसका सूद चुकाने में वर्षों जूझती रहती हैं। वह कहती हैं कि राज्य में अन्य क्षेत्रों की महिलाओं को बढ़ावा मिल रहा है पर घरेलू काम करने वाली महिलाएं बेबस हैं। इनके संरक्षण के लिए कोई श्रम नीति नहीं है। दिहाड़ी मजदूरी करने वाली महिला श्रमिकों की जिंदगी संघर्षों से घिरी हुई है। परिवार का भरण-पोषण करने के लिए दिन भर पसीना बहाकर भी उन्हें उनका हक नहीं मिल पाता। कार्यस्थल पर न तो उन्हें सम्मान मिलता है, न सुरक्षा और न ही मेहनत के अनुरूप मजदूरी। पुरुषों के बराबर श्रम करने के बावजूद महिलाओं को कम भुगतान किया जाता है। वह अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं से भी वंचित हैं। महिला श्रमिकों का कहना है कि उन्हें काम की कमी का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर लोग पुरुष मजदूरों को तरजीह देते हैं। लोग महिलाओं को काम देने में हिचकिचाते हैं। नियमित रूप से काम न मिलने के कारण परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी कर पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। पुरुर्षों की तुलना में हमें कम मेहनताना दिया जाता है। इनका कहना है कि महिला मजदूर जीवन में दोहरी भूमिका निभाती हैं। वह न केवल अपने परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाती हैं बल्कि रोजगार के लिए भी दिन-रात कड़ी मेहनत करती हैं। निर्माण स्थलों से लेकर खेती, ईंट-भट्ठे और फैक्ट्रियों तक में ये महिलाएं अहम योगदान देती हैं। फिर भी उन्हें अपने काम का पूरा मेहनताना नहीं मिलता। कार्यस्थल पर शोषण और असुरक्षा का भी सामना करना पड़ता है। साथ ही वे अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी से भी वंचित हैं। मशीनों के बढ़ते चलन के करण छिना रोजगार: रेखा, संगीता, रानी का कहना है कि पहले जिस काम को सैकड़ों मजदूर मिलकर पूरा करते थे, अब मशीनें कुछ ही समय में कर देती हैं। इससे न केवल मजदूरों की मांग घट गई है। बल्कि उनकी आजीविका भी संकट में आ गई है। उन्होंने कहा कि महिला श्रमिकों को अक्सर काम की कमी का सामना करना पड़ता है। अधिकतर लोग ठेके पर काम दे देते हैं। महिलाओं को काम देने में हिचकते हैं। वहीं अन्य महिला श्रमिकों का कहना है कि कार्यस्थल पर हम लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वहां हमारे लिए कोई सुविधा नहीं होती, लेकिन परिवार का पेट पालने के लिए हम मेहनत से काम करते रहते हैं। इसके बावजूद उचित मेहनताना नहीं मिलता। दिन भर की मजदूरी के बाद भी इतना कमा पाना मुश्किल है कि घर चलाया जा सके। महिला श्रमिक फूलमती कहती हैं कि पारंपरिक हस्तशिल्प, कुटीर उद्योग और खेतों में काम करने वाले मजदूर, खासकर महिला मजदूर जो शारीरिक रूप से कमजोर माने जाते हैं। बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को ही अधिक काबिल माना जाता है और उन्हें ही अधिक काम दिया जाता है। वहीं मशीनों ने उत्पादन बढ़ा दिया है, लेकिन इंसानी श्रम की अहमियत कम हो गई है, जिससे मजदूरों की स्थिति और दयनीय हो गई है। कामकाजी लीलावती कहती हैं कि पहले बहुत काम मिलता था। लेकिन अब आसानी से काम मिल पाना मुश्किल हो गया है। मशीनों के सामने इंसान की अहमियत लगभग खत्म हो गई है। आज परिवार चलाने के लिए हमें काम ढूंढ़ना पड़ता है। मजदूरी कट जाने के डर से छुट्टी नहीं कर पातीं घरेलू महिला कामगारों के खिलाफ अत्याचार के मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। लेकिन ऐसे मामले अक्सर तभी सामने आते हैं, जब कोई बड़ी या भयावह घटना होती है, वर्ना ज्यादातर महिला कामगारों की चीख चारदीवारी में घुटकर रह जाती है। रोजी-रोटी छिनने के डर से ये अपने साथ हो रहे अन्याय की शिकायत भी नहीं कर पातीं। एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि घरेलू कामगार महिलाएं आजीविका के लिए सुबह से शाम तक लगातार कार्य करती हैं। काम के अत्यधिक बोझ के कारण उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है, पर मजदूरी कट जाने के डर से वे छुट्टी नहीं कर पातीं। सेहत खराब होने की स्थिति में इलाज कराना भी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि सरकारी अस्पतालों में काफी समय लगता है और निजी अस्पतालों में ज्यादा पैसे खर्च होते हैं। जिले में बड़ी संख्या में घरेलू कामगार महिलाएं हैं, लेकिन उनके काम को गैर उत्पादक कार्यों की श्रेणी में रखा जाता है। इनका कोई निश्चित मेहनताना नहीं होता, यह पूरी तरह से नियोक्ता की मर्जी पर निर्भर करता है। दूसरों के घरों में नियमित काम करने वाली कई कई महिला श्रमिकों का कहना है कि उन्हें महीने में अधिक तीन हजार रुपए ही मिल पाते हैं। लेकिन मजबूरी में काम करना पड़ता है। दूसरा कोई और रास्ता भी नहीं है। निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की तरह न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटों का निर्धारण, साप्ताहिक अवकाश आदि की सुविधाएं मिलनी चाहिए। सरकारी योजनाओं का भी नहीं मिल रहा लाभ अशिक्षित महिला मजदूरों को सरकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल रहा है। ये महिलाएं दिन-रात कठिन परिश्रम करती हैं, लेकिन उनकी जिंदगी में कोई सुधार नहीं हो पाता। जानकारी के अभाव में ये महिलाएं सरकारी योजनाएं से वंचित हैं। वहीं कई महिला श्रमिक ऐसी भी हैं जिन्होंने बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, लेकिन उनके आवेदन आज भी लंबित हैं। रुपईडीहा की चंदा पत्नी स्व.सज्जन, ऊषा पत्नी स्व.सुरेश कुमार ने बताया कि वे लोगों के घरों में चूल्हा-चौका करके भरण पोषण कर रही हूं। सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। रुपईडीहा की ही गीता निषाद पत्नी खन्ना ने बताया कि उसकी थोड़ी भूमि है, लेकिन घर नहीं है। वह रामजानकी मंदिर में किराए पर एक रूम लेकर गुजारा कर रही है। उसने बताय कि एक साल पहले आवास के लिए आवेदन किया था, लेकिन आवास स्वीकृत नहीं हुआ। बीते महीने फिर आवेदन किया है। अभी कुछ पता नहीं चल सका है। यदि आवास मिल जाता तो रहने की परेशानी दूर हो जाती। उन्होंने बताया कि आर्थिक हालत इतनी खराब है कि सिर पर भारी कर्ज चढ़ चुका है, जिसे चुकाने का रास्ता भी नहीं सूझता। आर्थिक स्थिति जस की तस बनी रहती है। श्रमिकों को कार्यस्थल पर कई दुश्वारियां महिला श्रमिक शिराजुननिशा, सबीना, श्यामावती आदि का कहना है कि महिला मजदूरों को घर और बाहर दोनों जगह काम करना पड़ता है। काम से लौटने के बाद भी उन्हें घर के काम, बच्चों की देखभाल और अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियां निभानी होती हैं, जिससे उन पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। महिलाओं को अक्सर समान काम के लिए भी महिलाओं को अक्सर पुरुषों की तुलना में कम पारिश्रमिक मिलता है। जिस जगह पर महिला श्रमिक काम करने जाती हैं वहां शौचालय, पीने के पानी और छांव जैसी बुनियादी सुविधाएं अक्सर नहीं मिल पाती हैं। इससे उन्हें दिनभर काम के दौरान काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता। यही नहीं कई महिला मजदूर दिहाड़ी पर या अस्थायी रूप से काम करती हैं, जिससे उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा भी नहीं रहती। कार्यस्थल पर सम्मान न मिलने के कारण समाज में भी उनकी स्थिति कमजोर बनी रहती है। उनका कहना है कि खासकर ग्रामीण इलाकों में सरकार और गैर-सरकारी संगठन को महिला मजदूरों के अधिकारों और श्रम कानूनों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की जरूरत है। हमारी भी सुनिए दूसरे घरों मे साफ सफाई के साथ खाना बनाने का कार्य करना पड़ता है। सुबह और शाम यह नियमित कार्य है। मजदूरी कम मिलती है बच्चों का भरण पोषण नहीं हो पा रहा है। लीलावती कई घरेलू कामगार महिलाएं असंगठित क्षेत्र में हैं, जिसके कारण उन्हें उचित वेतन व अन्य लाभ नहीं मिलते हैं। घरेलू काम को एक पेशे के रूप में सामाजिक मान्यता नहीं मिली है। शाबरा बानो महिला श्रमिकों की जिंदगी संघर्षों से घिरी हुई है। परिवार का भरण-पोषण करने के लिए हक नहीं मिल पाता। कार्यस्थल पर न तो उन्हें सम्मान मिलता है, न मेहनत के अनुरूप मजदूरी। रानी घरेलू कामगार महिलाएं आजीविका के लिए सुबह से शाम तक कार्य करती हैं। इस कारण उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है, पर मजदूरी कट जाने के डर से वे छुट्टी नहीं कर पातीं। संगीता बोले जिम्मेदार श्रम विभाग में पंजीकृत महिला श्रमिकों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है। जिनमें मातृत्व लाभ, विवाह सहायता और कौशल विकास जैसी योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं में वित्तीय सहायता, स्वास्थ्य जांच और शैक्षिक लाभ आदि दिया जा रहा है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिला श्रमिकों को सहायता प्रदान की जाती है। घरेलू कामकाजी महिला श्रमिकों के लिए भविष्य में यदि कोई योजना आई तो उसका लाभ प्रदान किया जाएगा। सिद्धार्थ मोदियानी, सहायक श्रमायुक्त बहराइच प्रस्तुति- ध्रुव शर्मा, अरविंद पाठक, विनोद दुबे

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