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बागपत में खतरे में पड़ी राजनीतिक विरासत

गठबंधन मजबूरी या जरूरत कुछ भी रहा हो लेकिन रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह जहां खुद मुजफ्फनगर में अपनी हार नहीं बचा सके, वहीं बागपत में भी राजनीतिक विरासत बचाने में असफल रहे। सीधे-सीधे कहें तो मथुरा छोड़कर बागपत में मैदान में उतरे जयंत चौधरी यहां दादा-पिता का इकबाल बुलंद नहीं कर पाए। सपा-बसपा का वोट बैंक भी जयंत चौधरी की राजनीतिक विरासत बचाने में काम नहीं आई। हालांकि रालोद प्रत्याशी ने भाजपा प्रत्याशी को जबरदस्त टक्कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

बता दें कि किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह को सामाजिक और सियासी वजूद बागपत से ही मिला था। वर्ष 1937 में पहले चुनाव से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक जनपद के छपरौली से उनका गहरा नाता रहा। किसानों की धड़कन बने बड़े चौधरी छपरौली में हमेशा अजेय रहे, सूबे के मुख्यमंत्री भी रहे। इसके बाद वर्ष 1977 में बागपत से पहली बार सांसद बने और देश के गृहमंत्री और बाद प्रधानमंत्री तक बने। इसके बाद वर्ष 1971 में चौधरी चरण सिंह मुजफ्फरनगर की रुख किया और लोस चुनाव में ताल ठोकी लेकिन हार गए थे। दिलचस्प बात यह है कि 48 साल बाद इतिहास ने खुद को दोहराया और चौधरी साहब के पुत्र चौधरी अजित सिंह को भी मुजफ्फरनगर से हार का सामना करना पड़ा।

हालांकि अपने पिता के राजनीतिक वारिस के रूप में छोटे चौधरी अजित सिंह ने पहली बार वर्ष 1989 लोकसभा चुनाव में बागपत से अपनी किस्मत अजमाई और संसद तक पहुंचे।

चौ. अजित सिंह बागपत से छह बार सांसद रहे और वर्ष 1986 में राज्यसभा सदस्य रहे। वर्ष 1998 में सोमपाल शास्त्री और वर्ष 2014 में डा. सत्यपाल सिंह से उन्हें मात मिली। इस बार 2019 में रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने अपने दादा चौधरी चरण सिंह और पिता चौधरी अजित सिंह की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए बागपत से ताल ठोकी लेकिन नाकामयाब रहे। हालांकि बागपत का इतना दिलचस्प चुनाव शायद ही इससे पहले कभी हुआ हो। देर रात तक दोनों प्रत्याशियों जयंज चौधरी और डा. सत्यपाल सिंह में उठा पटक का दौर चलता रहा। अंत में जीत भाजपा के हिस्से में गई और डा. सत्यपाल सिंह ने को जीत मिली।

बता दें कि जयंत चौधरी मथुरा से वर्ष 2009 में लोकसभा सांसद रह चुके हैं। वर्ष 2014 में मोदी लहर में हार का सामना करना पड़ा था। इस बार भी मथुरा से सीट छोड़ने के बाद बागपत से पहली बार किस्मत अजमाने के बावजूद उन्हें हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि भाजपा प्रत्याशी को हराने के लिए सपा-बसपा से गठबंधन करना भी रालोद के किसी काम नहीं आ सका।

छपरौली से आठ बार विधायक रहे चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह बागपत के छपरौली विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 1937, 1946, 1952, 1957, 1962, 1967, 1969 और 1974 में विधायक चुने गए और लखनऊ में छपरौली की आवाज बनकर किसानों की लड़ाई लड़ी।

बागपत से छह बार सांसद रहे चौधरी अजित सिंह

बता दें कि रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह बागपत संसदीय क्षेत्र से पहली बार वर्ष 1989 में सांसद चुने गये थे। उसके बाद उन्होंने वर्ष 1991, 1996, 1999, 2004 व 2009 सहित छह बार सांसद चुने गये थे। हालांकि वर्ष 1998 में भाजपा के डा. सोमपाल शास्त्री एवं वर्ष 2014 में मोदी लहर में भाजपा के ही डा. सत्यपाल सिंह ने उन्हें चुनाव हरा दिया था।

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  • Web Title:Political legacy in danger in Baghpat