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पंचकल्याणक महामहोत्सव: तीर्थंकर पाश्र्वनाथ भगवान की हुई प्रथम आहारचर्या

पंचकल्याणक महामहोत्सव में गुरूवार को तीर्थंकर पाश्र्वनाथ भगवान की प्रथम आहारचर्या हुई। समवसरण रचना की दिव्य ध्वनि सुनकर धर्मावलम्बी हर्षित होकर...

पंचकल्याणक महामहोत्सव: तीर्थंकर पाश्र्वनाथ भगवान की हुई प्रथम आहारचर्या
हिन्दुस्तान टीम,बागपतFri, 08 Dec 2023 12:10 AM
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पंचकल्याणक महामहोत्सव में गुरूवार को तीर्थंकर पाश्र्वनाथ भगवान की प्रथम आहारचर्या हुई। समवसरण रचना की दिव्य ध्वनि सुनकर धर्मावलम्बी हर्षित होकर नृत्य करने लगे। पंडाल श्रीजी के जयकारों से गूंज उठा।

पंचकल्याणक महामहोत्सव के सातवें दिन प्रातकाल नित्यमह पूजा हुई। हवन में आहुति दी गई। इसके पश्चात तीर्थंकर भगवान का अभिषेक कराया गया। शांतिधारा के बाद तपकल्याणक पूजन हुआ। प्रमुख कार्यक्रम में तीर्थंकर महामुनिराज पाश्र्वनाथ भगवान की प्रथम आहारचर्या कराई गई। खीर का प्रथम आहार कराया गया। इसके बाद ज्ञान कल्याणक उत्सव हुआ। संतों ने जीवन में आहार का महत्व बताया। समवसरण में दिव्य ध्वनि सुनकर धर्मावलम्बी प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। संतों ने बताया कि अरिहंत भगवान के उपदेश देने की सभा का नाम समवसरण है। तेरहवें गुण-स्थान में प्रवेश कर श्रेष्ठ ज्ञान में प्रवेश कर श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद अरिहंत भगवान विहार करते हुए जीवों को मोक्षमार्ग बताते है। बताया कि जग का मोक्ष मार्ग बताने वाली ध्वनि को दिव्य ध्वनि कहते है अर्थात भगवान की दिव्य ध्वनि जहां खिरती है, उस सभा को समवसरण कहा जाता है। सुनकर जैन धर्मावलम्बी हर्षित हुए। धर्मसभा में बडी संख्या में दिल्ली, हरियाणा, यूपी के कई शहरों के जैन धर्मावलम्बियों ने धर्मलाभ लिया।

तीर्थंकर का मोक्ष पाना निश्चित: आचार्य सुनील

पंचकल्याणक महामहोत्सव की धर्मसभा में प्रवचन करते हुए आचार्य सुनील सागर महाराज ने कहा कि तीर्थंकर का मोक्ष पर जाना निश्चित था। प्रथम आहार देना एक बडे सौभाग्य की बात है।

पंचकल्याण के सांतवे दिन धर्मसभा में बोलते हुए आचार्य सुनील सागर महाराज ने तत्वज्ञान दिया। कहा कि सांसारिक जीवन के जाल में फंसे मनुष्य को भगवान के लिए भी समय निकालकर अपने लिए मोक्ष की तैयारी करनी चाहिए। दुनिया की चकाचौंध में फंसे मनुष्य को ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर आना होगा। तीर्थंकर भगवान के आहार का गुणगान करते हुए महाराज श्री ने कहा कि तीर्थंकर मुनि को आहार देना परम सौभाग्य की बात है। दिगंबर साधु बनना बड़ी अद्भुत और सुंदर प्रक्रिया है। दिगंबर जैन साधु ही कभी भोजन मांगकर नहीं लेता। पात्र में नहीं करपात्र हाथों के पात्र में आहार लेता है। तीर्थंकर का मोक्ष पाना निश्चित होता है। महाराज ने कहा कि वे तो बिना आहार के भी निर्वाण प्राप्त कर सकते थे, लेकिन तीर्थंकर उस समय आहार नहीं लेते तो आज आहार दान की परंपरा नहीं होती।

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