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27 सितम्बर, 2020|3:52|IST

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दसलक्षण धर्म के नौंवे श्रद्धालुओं ने किया उत्तम अकिंचन धर्म अंगीकार

दसलक्षण धर्म के नौंवे श्रद्धालुओं ने किया उत्तम अकिंचन धर्म अंगीकार

पर्वाधिराज दसलक्षण महापर्व के नौवें दिन जैन श्रद्धालुओं ने उत्तम अकिंचन धर्म को अंगीकार किया। इस दौरान मंदिरों में शासन की गाइड लाइन के मुताबिक पूजन-अर्चन किया गया। दिगंबर जैन जैन बड़ा मंदिर में सर्वप्रथम श्री जी का प्रक्षालन, शांति धारा व अभिषेक किया गया। इसके बाद तेरह द्वीप की सादगी पूर्वक पूजा की और अर्घ्य चढ़ाए। इस मौके पर प्रवीण जैन, अतुल जैन, मनोज जैन, नवीन जैन आदि मौजूद रहे।

उधर, शहर के नेहरू रोड पर श्री पार्श्वनाथ मंदिर में भी शासन की गाइड लाइन के अनुसार श्री जी का प्रक्षालन व शांत धारा अर्पित की गई। श्रद्धालुओं ने दसलक्षण धर्म की पांच पूजा की। इस मौके पर सतेंद्र जैन, अनिल जैन, अमन जैन, आदिश जैन आदि मौजूद थे।

इनके अलावा शहर के श्री शांति नाथ दिगंबर जैन मंदिर और श्री महावीर स्वामी जैन परमागम मंदिर में पूजन-अर्चन किया गया। मीडिया प्रभारी आदिश जैन ने बताया कि मंगलवार को अंनत चतुर्दशी है। इस दिन तीर्थंकर 1008 वासुपूज्य भगवान को मोक्षकल्याण हुआ था। जैन धर्म मे अंनत चतुर्दशी का बहुत ज्यादा महत्व है। इसमें सभी निर्जल व अपनी शक्ति अनुसार व्रत करते हैं।

शरीर रूपी जेल छुटकारा दिला दे वही उत्तम आकिंचन धर्म है

व्यख्यान वाचस्पति पंडित डॉ. श्रेयांश जैन ने उत्तम अकिंचन धर्म पर कहा कि शरीर का वस्तु, रिश्तों, धन-संपदा के मोह और लालच से दूरियां बनाने को आकिंचन (अपरिग्रह) कहते हैं। आत्मा के अपने गुणों के सिवा जगत में अपनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं है।

इस दृष्टि से आत्मा अकिंचन है। जीव संसार में मोहवश सब जड़ चेतन पदार्थों को अपनाता है। किसी के माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, धन-जमीन, कोठियां आदि के विविध संबंध जोड़कर परिग्रह से मोह करता है। अध्यात्म के शरीर में मोह-राग और ममत्व को भी परिग्रह कहा है।

प्रतिभा संपन्न वही होता है, जो दूसरे (परिग्रह) पर आधारित नहीं होता। सब वस्तु का मोह त्याग करना व किंचित मात्र भी राग द्वेष नहीं रखना आकिंचन धर्म है। वर्तमान में व्यक्ति की रुपयों से मान पद प्रतिष्ठा मानी जाती है। इसीलिये वह पाप, अनाचार, अनैतिक रूप से रुपया कमाने में लगा रहता है। यह मानव की बहुत बड़ी भूल है। धन-दौलत व्यक्ति के परमार्थ में सहायक नहीं हो सकते। इसीलिये रुपयों पैसा नहीं अपने आत्मा को सिद्ध करके आत्म कल्याण करने का प्रयत्न करना चाहिए। आकिंचन धर्म करने वाला सिर्फ अपने आत्म कल्याण को देखता है।

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  • Web Title:Ninth devotees of Dashalakshan Dharma adopted the best Akinchan Dharma