
भगवान के जन्म लेते ही पंडाल में गूंजे जयकारे
Bagpat News - बाहुबली तीर्थ बड़ागांव में पंचकल्याणक महोत्सव का तीसरा दिवस जन्मकल्याणक के रूप में मनाया गया। श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच भगवान के जन्म का दिव्य दृश्य और अभिषेक आराधना का आयोजन हुआ। आचार्य सौम्य सागर महाराज ने प्रवचन में जन्म के महत्व को समझाया। पूरे दिन भक्तों ने धर्मलाभ लिया और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद उठाया।
बाहुबली तीर्थ बड़ागांव में भव्य पंचकल्याणक महोत्सव का तीसरा दिवस जन्मकल्याणक के रूप में पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही तीर्थ परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। भगवान के जन्मकल्याणक की दिव्य झांकी जैसे ही दिखाई दी, पूरा पंडाल जय हो जय हो के जयकारों से गूंज गया। शुक्रवार सुबह 6.30 बजे मंगलाचरण, विधान पूजन एवं शांतिधारा के साथ दिन का शुभारंभ हुआ। इसके बाद भक्तों ने समवशरण एवं बालक भगवान के अभिषेक आराधना में भाग लेकर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया। सुबह 8.30 बजे पंच परमेष्ठी पूजा के बाद 9.30 बजे जन्म कल्याणक का मुख्य आयोजन संपन्न हुआ।

माता त्रिशला के स्वप्नों का वर्णन, भगवान के जन्म का दिव्य दृश्य और जन्माभिषेक ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। जैसे ही बालक भगवान का प्रथम दर्शन हुआ, चारों ओर उल्लासमय वातावरण बन गया। 1008 कलशों से अभिषेक कर श्रद्धालुओं ने पुण्य लाभ अर्जित किया। शाम 5.30 बजे गुरुभक्ति और विधान आरती आयोजित हुई। इसके बाद सात बजे आरती एवं प्रवचन हुए। रात आठ बजे भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, जिसमें बालक भगवान के जीवन प्रसंगों पर आधारित नृत्य नाटिका ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूरे दिन श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया और जन्मकल्याणक उत्सव की दिव्यता का आनंद उठाया। जन्मकल्याणक पर दिया भावपूर्ण प्रवचन जन्मकल्याणक उत्सव के अवसर पर आचार्य सौम्य सागर महाराज ने अत्यंत प्रभावशाली एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर प्रवचन दिया। महाराज श्री ने कहा कि तीर्थंकर भगवान का जन्म कोई साधारण घटना नहीं होती, बल्कि यह समस्त लोक के कल्याण का शुभ अवसर होता है। जैसे ही उस आत्मा का संसार में आगमन होता है, देवलोकों में स्वत: मंगलध्वनियां गूंज उठती हैं। उन्होंने समझाया कि देव भवनों, स्वर्गों और इंद्र के लोकों में विशेष प्रकार के दिव्य संकेत प्रकट होते हैं। महाराज श्री ने बताया कि इस जन्म से धर्म, करुणा, सत्य और अहिंसा की पुनर्स्थाना होती है, और यही कारण है कि इसे जन्मकल्याणक कहा जाता है। प्रवचन के दौरान पंडाल में उपस्थित श्रावक-श्राविकाएं मंत्रमुग्ध होकर भक्ति का अद्भुत संयोग सुनकर सभी भावविभोर हो उठे।

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