संकट: खत्म नहीं हो रही गैस सिलेंडरों की किल्लत
Bagpat News - गैस सिलेंडर की कमी से छोटे दुकानदारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। चाय और रोटी की कीमतों में वृद्धि हुई है, जिससे ग्राहकों पर भी बोझ बढ़ गया है। कई दुकानदारों ने काम बंद कर दिया है। गैस की बढ़ती कीमतें और कमी के कारण मुनाफाखोरी का भी सामना करना पड़ रहा है।

गैस सिलेंडर का मिलना अभी भी अब टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। कारण, केवाईसी प्रक्रिया है। सिलेंडर नहीं मिलने से हर कोई अब परेशानी से जूझ रहा है। खासकर छोटे दुकानदार। दरअसल, गैस सिलेंडर के न मिलने से छोटे दुकानदार, हथठेलों, लकड़ी के खोखे में बैठकर चाय-रोटी बेचने वाले लोग ज्यादा परेशान हैं। गैस सिलेंडर न मिलने से कुछ ने तो फिलहाल काम तक बन्द कर दिया है। कुछ ने चाय के पैसे भी बढ़ाए, लेकिन यह भी उनके लिए कोई खास लाभ देने वाला साबित नहीं हो रहा है। 10 रुपये की चाय 15 रुपए की कर दी गई है, रोटी की थाली 100 से बढकर 150 तक हो गई, लेकिन राहत नहीं मिल रही क्योंकि सिलेंडर नहीं मिल रहा।
बहुत से हाथठेले और खोखे के दुकानदार इंडक्शन चूल्हा ले आये हैं। अब इनके सामने बिजली को लेकर परेशानी बन गई है। जिलेभर में कमर्शियल गैस सिलेंडर की भारी किल्लत की वजह से चाय की कीमतों में उछाल आया है। जो चाय कुछ समय पहले 10 रुपए में मिल रही थी, अब ज्यादातर ठेलों और दुकानों पर उसके दाम बढ़कर 15 रुपए हो गए हैं। चाय-नाश्ते की दुकान चलाने वाले दुकानदार सोनी कश्यप का कहना है कि मार्केट में कमर्शियल सिलेंडर मिल ही नहीं रहा है। अगर कहीं प्राइवेट एजेंसी से सिलेंडर मिल भी रहा है, तो उसके लिए बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।-----कारोबार के लिए नासूर बनी गैस किल्लतकॉमर्शियल गैस की आपूर्ति पर पाबंदी कई कारोबार के लिए नासूर बनी हुई थी। जैसे ही आपूर्ति में मामूली सुधार हुआ तो नए वित्तीय वर्ष के पहले दिन कॉमर्शियल सिलेंडर के रेट में वृद्धि ने खान-पान पर महंगाई का तड़का लगाया है। इसका असर घरों तक पहुंचना शुरू हो गया है। जानकारों का कहना है कि कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम का प्रभाव प्रत्यक्ष से कई गुना ज्यादा अप्रत्यक्ष रहता है। कॉमर्शियल प्रयोगकर्ता की महंगी लागत का भार उसके उपयोगकर्ताओं तक पहुंचता है। मुनाफाखोरी को हवा मिलती है। खानपान के विक्रेता महंगी गैस का भय दिखाकर उपभोक्ताओं से खुली लूट करते हैं। जिन उत्पादों की लागत में चंद पैसों का फर्क आया है, उनके दाम कई गुना तक कर दिए गए हैं। आगरा की पारंपरिक बेड़ई, कचौड़ी और जलेबी के नाश्ते पर तो और भी ज्यादा मुश्किल हो चुकी है। बिक्री दर के अनुसार 20 से 50 फीसदी तक बढ़ा दिए गए हैं।----लागत से कई गुना अधिक वसूलीकारीगरों शौकत, राहुल कश्यप, रोहित के अनुसार बड़े साइज की भट्टी को यदि अधिकम ताप पर चलाया जाए तो 19 किलो का सिलेंडर छह घंटे चल जाएगा। इस अवधि में औसतन 3000 से 4000 समोसे, कचौड़ी या पकौड़े तले जा सकते हैं। नई और पुरानी रेट के अंतर के साथ ही उपलब्धता संकट के कारण चल रहे प्रीमियम को भी आधार मान लिया जाए तो लागत एक रुपये नग से अधिक नहीं होगी, लेकिन वसूली पांच रुपये अधिक की जा रही।
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