यूपी: बागपत में मिले 4500 साल पुराने रथ-मुकुट, क्या महाभारत से है कनेक्शन?

लाइव हिन्दुस्तान टीम बागपत
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पुरातत्वविद एवं इतिहासकार जिस बात को लेकर आश्वस्त और उत्साहित थे, आखिरकार वह फलीभूत हो ही गई। सिनौली साइट विश्व के अभी तक के मिले प्राचीन सभ्यताओं के श्वाधान पुरास्थलों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण और...

एतिहासिक खोज

पुरातत्वविद एवं इतिहासकार जिस बात को लेकर आश्वस्त और उत्साहित थे, आखिरकार वह फलीभूत हो ही गई। सिनौली साइट विश्व के अभी तक के मिले प्राचीन सभ्यताओं के श्वाधान पुरास्थलों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण और दुर्लभ साइट के रूप में उभरकर सामने आई है।

यहां पर चल रहे उत्खनन से पुरातत्वविदों को महाभारतकालीन रथ और शाही ताबूत प्राप्त हुए हैं। इसके साथ ही ताबूत में दफन योद्धा की ताम्रयुगीन तलवारें, ढाल, सोने व बहुमूल्य पत्थरों के मनके, योद्धा का कवच, शिराश्र (हेलमेट) आदि भी प्राप्त होने से अब पूरे विश्व के पुरातत्वविदों की नजरें सिनौली पर टिक गई हैं।

15 फरवरी 2018 को सिनौली उत्खनन स्थल पर स्थानीय इतिहासकारों की मांग पर एक ट्रायल ट्रेंच लगाया गया था। एएसआई की महानिदेशक डॉ. ऊषा शर्मा ने इसकी जिम्मेदारी पुरातत्विद डॉ. संजय मंजुल व डॉ. अरविन मंजुल को सौंपी। बता दें कि सिनौली साइट पर सबसे पहले वर्ष 2005 में उत्खनन कार्य शुरू हुआ था, जिसमें 177 मानव कंकाल समेत कई महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए थे।

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इसके बाद वर्ष 2007 में सिनौली की मानव बस्ती के सर्वेक्षण के दौरान शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन व तत्कालीन उप महानिरीक्षक मेरठ परीक्षेत्र विजय कुमार को यहां से बाणाग्र की आकृति के ताम्र धातु के टुकड़े प्राप्त हुए थे। इनकी रिपोर्ट पर ही एएसआई द्वारा फरवरी में सिनौली का यह ऐतिहासिक ट्रेंच लगाया। ट्रेंच का उत्खनन करते ही प्रथम दिवस ही यहां से ताम्रनिधि प्राप्त होनी प्रारंभ हो गई, जो इस लघु उत्खनन के समापन तक प्राप्त हो रही है।

सिनौली उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों के विषय में जानकारी देते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान लालकिला के निदेशक डॉ. संजय मंजुल ने बताया कि सिनौली के वर्तमान उत्खनन से आठ मानव कंकाल व उनके साथ तीन एंटीना सोर्ड (तलवारें), काफी संख्या में मृदभांड, विभिन्न दुर्लभ पत्थरों के मनकें आदि के अलावा पांच हजार वर्ष पुराने मानव योद्धाओं के तीन शाही ताबूत जो तांबे से सुसज्जित हैं और दो रथ प्राप्त हुए हैं।

विश्व इतिहास की दुर्लभतम उपलब्धि है रथ प्राप्त होना

डॉ. संजय मंजुल ने बताया कि भारत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना के बाद से अभी तक हुए उत्खनन व शोध में पहली बार सिनौली उत्खनन से भारतीय योद्धाओं के तीन रथ भी प्राप्त हुए हैं, जो विश्व इतिहास की एक दुर्लभतम घटना है। अभी तक विश्व के इतिहासकार भारतीय मानव सभ्यता के प्राचीन निवासियों को बाहर से आया हुआ बताकर अन्य सभ्यताओं से कमतर आंकते रहे, लेकिन योद्धाओं के शवों के साथ उनके युद्ध रथ भी दफन किए गए, योद्धाओं की तलवारें, उनका शिराश्र (हेलमेट), कवच, ढाल भी प्राप्त होना पांच हजार वर्ष प्राचीन युद्धकला का स्पष्ट उदाहरण है।

शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने दावा किया कि सिनौली सभ्यता भारतीय संस्कृति एवं इतिहास को विश्व के पुरातत्वविदों को दोबारा लिखने को मजबूर करेगा। हालांकि, अब सिनौली साइट से पुरातत्वविदों ने काम समेट लिया है, यहां से प्राप्त दुर्लभ पुरावशेषों को दिल्ली लालकिला में पहुंचाया जा रहा है। वहां पर इनको रासायनिक विधियों से साफ-सफाई कर अंतर्राष्ट्रीय विद्धानों के समक्ष प्रस्तुत किए जाने लायक बनाया जाएगा।

पांडवों ने कौरवों से मांगा था ये क्षेत्र

महाभारत महाकाव्य में जनपद बागपत के बरनावा एवं बागपत नगर व यमुना नदी के दूसरी ओर हरियाणा के सोनीपत, पानीपत नगर को पांडवों द्वारा श्रीकृष्ण भगवान के माध्यम से कौरवों से संधि के दौरान मांगा गया था। भौगोलिक रूप से भी यह सिद्ध है कि यह इलाका कुरू जनपद का प्राचीन काल से एक केंद्र रहा है, जिसकी प्राचीन राजधानी हस्तिनापुर व इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) रही है।

वर्ष 2005 के सिनौली उत्खनन की रासायनिक विधियों से प्राप्त कार्बनडेटिंग भी यहां की सभ्यता को चार से पांच हजार वर्ष का सिद्ध करती हैं। सिनौली से वर्ष 2005 में प्राप्त मानव शव जो कि सैकड़ों की संख्या में हैं, महाभारत सभ्यता के निवासियों के रहे हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

दूसरा दृष्टिकोण यह भी है कि वर्तमान में पुराने स्थल के करीब पांच हजार मीटर पहले स्थित खेत पर जो ट्रायल ट्रेंच लगाया गया, वहां से भारत के प्राचीनतम श्वाधान केंद्रों की एक दुर्लभतम प्रक्रिया ताबूत में मानव शव को दफनाया जाना, प्राप्त हुआ है। उस ताबूत को भी अत्यधिक दुर्लभ मानी जाने वाली ताम्र धातु से सुसज्जित किया गया है।

ताबूत के अंदर दफन योद्धा के शस्त्र-अस्त्र, आभूषण, दैनिक उपयोग के खाद्य पदार्थ, मृदभांड आदि तो प्राप्त हुए ही हैं। साथ ही उसी योद्धा के प्रयोग में लाए जाने वाले युद्ध रथ भी दफन किए गए हैं जोकि पहली बार भारत में प्राप्त हुए है।

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'हिन्दुस्तान' ने पहले ही की थी पुष्टि
सिनौली साइट से प्राप्त पुरावशेषों के आधार पर किए गए शोध के उपरांत इतिहासकारों के माध्यम से महाभारत कालीन सभ्यता का होना पहले ही हिन्दुस्तान द्वारा तथ्यों को प्राकाशित किया जा चुका है। हिन्दुस्तान अखबार में यह समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था कि कार्बनडेटिंग से यह भी सिद्ध हो चुका है कि प्राप्त पुरावशेष व कंकाल करीब 4500 वर्ष से अधिक पुराने हैं और यह समय महाभारत काल का समय कहा जाता है।

सिनौली में जो भी कंकाल मिले हैं, उनके साथ युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले हथियार बरामद हुए हैं जो यह बात सिद्ध करते हैं कि ये आम व्यक्ति नहीं बल्कि योद्धा थे। इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि महाभारत युद्ध के मरने वाले योद्धाओं के शव यहां पर नहीं दफनाए गए थे क्योंकि यह पूरा क्षेत्र महाभारत काल से जुड़ा हुआ है।

वर्ष 2005 में मिल चुका है सिनौली से बेहद कीमती खजाना

वर्ष 2005 में यह भी स्मरण रहे कि सिनौली में प्रथम चरण की जो खुदाई हुई थी वह वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ. डीवी शर्मा के निर्देशन में हुई थी। सिनौली साइट से दुनिया पहले ही रूबरू हो चुकी है। उस समय हुई खुदाई के दौरान ही दो तांबें की तलवारें, एक तांबे की म्यान, चार सोने के कंगन, एक सोने से बना मनके का हार, एक सोने की लघु मानवाकृति, सैंकड़ों मनकें, 177 मानव कंकाल समेत अन्य पुरावशेष प्राप्त हुए थे।

इसके अलावा एक 15-16 साल की लड़की का कंकाल बरामद हुआ था। इस कंकाल के हाथ-पैर में स्वर्णाभूषण (कडे़), गले में एक हसली की तरह ता स्वर्ण हार जो कि तांबे के मोटे तार पर लिपटा हुआ था, बरामद हुआ था। साथ ही दो से ढाई इंच के कार्लेनियन पत्थर भी बरामद हुए थे। ये कार्लेनियन पत्थर बाजूबंद व गले में पहने जाने वाले हार में प्रयोग में लाए जाते थे।

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