If we accept the opinion of Azam we will not lose Dharmendra - आजम की बात मान लेते तो नहीं हारते धर्मेंद्र DA Image

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आजम की बात मान लेते तो नहीं हारते धर्मेंद्र

आजम की बात मान लेते तो नहीं हारते धर्मेंद्र

1 / 2गठबंधन के प्रत्याशी व दो बार के सांसद धर्मेंद्र यादव की हार पर 23 मई के बाद से लगातार मंथन का दौर जारी...

आजम की बात मान लेते तो नहीं हारते धर्मेंद्र

2 / 2गठबंधन के प्रत्याशी व दो बार के सांसद धर्मेंद्र यादव की हार पर 23 मई के बाद से लगातार मंथन का दौर जारी...

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गठबंधन के प्रत्याशी व दो बार के सांसद धर्मेंद्र यादव की हार पर 23 मई के बाद से लगातार मंथन का दौर जारी है। फूलछाप सपाइयों, गुन्नौर पर लगातार सिखसकते जनाधार के बाद भी मुगालते में रखने के चलते सपा नेताओं से लगातार सवाल जवाब के दौर से गुजरना पड़ रहा है।

इधर मंथन में एक और महत्वपूर्ण तत्थ आबिद रजा व सांसद के बीच की तल्खी को आजम के कहने के बाद भी कम न करना हार के कारणों में यह भी बड़ा कारण रहा। आजम की बात धर्मेंद्र यादव उस समय मान लेते तो हार का मुंह न देखना पड़ता बल्कि आबिद सपा नहीं छोड़ते। आबिद के सपा छोड़कर कांग्रेस में जाने से भी धर्मेंद्र को बिल्सी व सहसवान में नुक्सान उठाना पड़ा।

बदायूं लोकसभा सपा को पूरी उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत सीट मानी जाती है। जब से सपा पार्टी बनी है तब से सपा पहली बार लोकसभा सीट बदायूं इस चुनाव में हारी है। हार भी उस समय हुई है जब प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन था। इसलिए चर्चा का विषय बन गई है। इसे यह भी कहा जा रहा है कि आबिद व धर्मेंद्र यादव का विवाद ही तो कहीं हार का मुख्य कारण नहीं बन गया है।

आबिद का विरोध व अंडर ग्राउंड केबिल मुद्दा धर्मेंद्र के लिए नुकसान का कारण बना।आजम की कोशिश हुई नाकामचुनाव के दौरान जब आजम खां ने धर्मेंद्र यादव व उन्हें एक करने की कोशिश की तो उन्होंने दो शर्तें रखीं थीं। जो पूरी हुई नहीं। सूत्रों की माने तो इस मु्दे को टाला जा रहा था। जिससे चुनाव हो जाए और समय निकल जाए। आबिद रजा इस चाल को पहचान गए और उन्होंने राजनीति में बड़ा बदलाव किया। वह प्रियंका गांधी से मिलकर कांग्रेस में शामिल हो गए। जिससे मुस्लमान वोटों की सपा के पक्ष में प्रतिशत मात्रा घटी।

फैलोटिंग वोट सपा से छिटका

चुनाव में जो फैलोटिंग वोट जो दस से 15 फीसदी होता है, जो जीतने वाले को ही वोट देना चाहता है। वो वोट धर्मेंद्र से झिटक गया। वर्तमान में चुनाव के समय सपा में जो प्रदेश सचिव बनाए गए थे। वह अपने स्वागतों में लगे रहे और वोट प्रतिशत नहीं बढ़वा पाए। मंथन में यह भी चर्चा रही कि आबिद और धर्मेंद्र का समझौता कामयाब हो गया होता तो उन्हें हार का मुंह देखना नहीं पड़ता। विरोध से कम हुई मुस्लिम वोट की मात्राआबिद के विरोध के कारण जिले में मुस्लिम समाज की वोट की प्रतिशत मात्रा 43 फीसदी कम रह गई। आबिद रजा ने एक साल पहले मिशन मुस्लिम राजनीतिक जागरूकता चलाया। जिसमें दस हजार सदस्य बन चुके थे। जिसका जिले में की, इसका असर इस चुनाव में दिखा।

मुस्लिम समाज को भला-बुरा कहने पर बिगड़ी

सपा के एक नेता ने मुस्लिम समाज को मंच से बुरा-भरा कहा। आबिद रजा ने उसको पार्टी से निकालने को कहा। धर्मेंद्र यादव ने उसको पिछड़ा वर्ग का प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया, इस वजह से दोनों में जंग छिड़ गई। आबिद रजा ने धर्मेंद्र यादव का खुले आम विरोध करना शुरू कर दिया।

2016 में पहली बार आए थे आमने-सामने

पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव व पूर्व मंत्री आबिद रजा आमने-सामने तो कई बार आए। पहली जंग 2016 में शुरू हुई थी। आबिद रजा 2016 में धर्मेंद्र यादव के खिलाफ सपा सरकार में अंडर ग्राउंड केबिल को लेकर जंग छेड़ी थी। जिसका उन्हें खामियाजा भगुतना पड़ा था। अंडर ग्राउंड केबिल की लड़ाई चूंकि जनहित की थी इससे जनता ने उनका प्रभाव और बढ़ा दिया। इसलिए आबिद रजा जनता के लिए लोकप्रिय हुए।

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