-पूर्वांचल में नवजातों की आंखों में भी हो रहा मोतियाबिंद
Azamgarh News - पूर्वांचल के आजमगढ़, गाजीपुर और जौनपुर में नवजात बच्चों में जन्मजात मोतियाबिंद के 15 से अधिक मामले सामने आए हैं। समय पर उपचार न मिलने पर बच्चे अंधे हो सकते हैं। आरबीएसके कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य विभाग ने नवजातों की आंखों की निगरानी और नियमित स्क्रिनिंग शुरू की है। सभी बच्चों का सफल उपचार किया गया है।

आजमगढ़। पूर्वांचल में नवजातों की आंखों में भी मोतियाबिंद हो रहा है। आजमगढ़, गाजीपुर और जौनपुर जनपद में तीन माह में 15 से अधिक केस सामने आए हैं। इनके उपचार में शुरुआती छह से आठ सप्ताह महत्वपूर्ण होते हैं। नवजातों की दृष्टि के विकास के लिए यह समय बेहद अहम होता है। इसी अवधि में सर्जरी कर बच्चों की आंखों की रोशनी से बचाई जा रही है। डॉक्टरों के मुताबिक, जन्मजात मोतियाबिंद में जन्म से ही या कुछ दिन बाद आंख का लेंस धुंधला हो जा रहा है। समय से उपचार न मिलने पर नवजात अंधे हो सकते हैं। शुरुआती दिनों में जानकारी होने के बाद उनका उपचार कराया जा रहा है।
दवा से ठीक न होने पर सर्जरी कर लेंस लगाया जा रहा है। एसएनसीयू के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की गहनता से निगरानी और जांच के दौरान जिले में छह नवजाते में जन्मजात मोतियाबिंद पाया गया। इसी तरह जौनपुर में भी छह और गाजीपुर में तीन मामले सामने आए। स्वास्थ्य विभाग ने सभी बच्चों की सराकरी खर्च पर लखनऊ के सीतापुर अस्पताल में सर्जरी कराई है। अब सभी पूरी तरह से स्वस्थ हैं। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत डॉक्टरों की टीम ने इस तरह के मामले सामने के आद सभी अस्पतालों में नवजातों की आंखों की निगरानी करानी शुरू कर दी है। आरबीएसके की टीम अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में नवजात शिशुओं की नियमित स्क्रिनिंग कर रही है। ये हैं नवजात बच्चों में जन्मजात मोतियाबिंद के लक्षण दो माह के बाद नवजात बच्चे की आंखों में जन्मजात मोतियाबिंद के लक्ष्ण सामान्य लोगों की भी नजर आने लगते हैं। पीड़ित बच्चा लगातार रोशनी की तरफ नहीं देख पाता है। गोद में लेने पर बच्चा आंख नहीं मिलाता। आंख सफेद या भूरी दिखने लगती है। आंखें तिरछी हो जाती हैं। लेंस पारदर्शी नहीं रहता है। दोनो आंखें एक साथ नहीं हिलती हैं। कुछ परिवारों में यह समस्या आनुवंशिक होती है। डाउनसिंड्रोम से भी नवजात प्रभावित होते हैं। गर्भावस्था में मां को रूबेला से संक्रमण होने से नवजात में जन्मजात मोतियाबिंद हो जाता है। ग्लूकोज बढ़ जाने पर पर भी नवजात की आंखों पर प्रभाव पड़ता है। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को जांच का जिम्मा स्वास्थ्य विभाग आरबीएसके टीम के माध्यम से माताओं, आशाओं और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को जागरूक कर रहा है। जिससे जन्म के तुरंत बाद बच्चे की आंखों की जांचकर उन्हें रोशनी दी जा सके। जांच के दौरान अगर नवजात की आंखों में सफेदी, पुतली का काला न दिखना या रोशनी पर प्रतिक्रिया न होना जैसे लक्षण मिलते हैं तो तुरंत कार्रवाई की जाती है।

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