
अयोध्या-वायु की गुणवत्ता परखने को जल्द चार जिले में लगेंगे सयंत्र
Ayodhya News - डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग को वायु गुणवत्ता अनुश्रवण परियोजना के तहत 50 लाख रुपये के अत्याधुनिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। ये उपकरण अंबेडकरनगर, गोंडा, बहराइच और...
अयोध्या, संवाददाता। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग को प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से वायु गुणवत्ता अनुश्रवण (मॉनीटरिंग) परियोजना के तहत अत्याधुनिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह के निर्देशन में सभी उपकरण वायु गुणवत्ता पर निगरानी और शोध के क्षेत्र में विभाग की क्षमताओं को अपग्रेड करेंगे। उपकरणों की कीमत लगभग 50 लाख बताई जा रही है। शीघ्र ही वायु की गुणवत्ता परखने के लिए चार जिले में लगाए जाएंगे। वायु की गुणवत्ता परखने के लिए उपकरणों में आठ रेस्पिरेबल डस्ट सैंपलर (आरडीएस) पीएम 10 की निगरानी के लिए और आठ पीएम 2.5 सैंपलर सूक्ष्मकणों के लिए तथा एक अतिसूक्ष्म जो उच्च शुद्धता द्वारा फिल्टर पर जमा कणों का वजन मापने में सहायक होगा।

सभी संयंत्र की आपूर्ति विवि को हो गई है। पर्यावरण के विभागध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने बताया कि संयंत्र के लगने से पर्यावरण संरक्षण एवं शोध परियोजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय कदम होगा। इन संयंत्रों की आपूर्ति से विभाग को उच्च स्तरीय पर्यावरण में हो रहे बदलाव के मापन की क्षमता प्राप्त होगी। विभाग में शोध और प्रशिक्षण दोनों स्तरों पर सुविधा बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि उपकरणों का ट्रायल रन सफलता पूर्वक पूरा हो चुका है। संयंत्रों को जल्द ही अंबेडकरनगर, गोंडा, बहराइच और श्रावस्ती में चयनित स्थलों पर लगाया जाएगा। क्षेत्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण की सटीक स्थिति का पता लग सकेगा। इनसेट- शोध सहायक और फील्ड असिस्टेंट की नियुक्ति प्रक्रिया जारी अयोध्या। वायु गुणवत्ता अनुश्रवण (मॉनीटरिंग) परियोजना के तहत के क्रियान्वयन के लिए शोध सहायक और फील्ड असिस्टेंट की नियुक्ति प्रक्रिया अभी चल रही है। नियुक्ति के बाद सभी को विवि में प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक सितंबर से संबंधित जिलों में उपकरणों को स्थापित कर सावधानीपूर्वक संचालन सुनिश्चित हो सकें। अवध विवि के पर्यावरण के विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने बताया कि यह उपलब्धि विवि के लिए एक बड़ी सफलता है। इससे हमारे छात्र एवं शोधार्थी वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में प्रशिक्षित हो सकेंगे और भविष्य में सक्षम पर्यावरण वैज्ञानिक बनेंगे। रियल-टाइम डेटा एकत्रित होने से जिलेवार प्रदूषण स्रोतों का विश्लेषण, नियंत्रण रणनीतियां विकसित करने और समुदाय को सचेत करने में मदद मिलेगी।

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