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बोले अयोध्या:उत्पाद बेचने के लिए बाजार न होने से किसान हलकान

बोले अयोध्या:उत्पाद बेचने के लिए बाजार न होने से किसान हलकान

संक्षेप:

Ayodhya News - अयोध्या के किसान अब पारंपरिक फसलों को छोड़कर वैकल्पिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। गेहूं, धान, गन्ना जैसी फसलों के स्थान पर ड्रैगन फ्रूट, परवल और फूलों की खेती कर रहे हैं। हालांकि, किसानों को उचित जानकारी...

Mon, 8 Sep 2025 05:37 PMNewswrap हिन्दुस्तान, अयोध्या
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गेहूं,धान,गन्ना,सरसों,मक्का जैसी फसलों की पैदावार करके केवल अपना व परिवार का पेट पाला जा सकता है लेकिन इससे आर्थिक उन्नति नहीं की जा सकती। इस बात को जनपद के किसान अब भली भांति समझ चुके हैं। इस बात को बखूबी समझते हुए जनपद के किसान अब वैकल्पिक खेती की तरफ रुख करने लगे हैं। जनपद के किसान अब गेहूं,धान,गन्ना,सरसों,मक्का व दालों की फसलों को छोड़कर सूचना की क्रान्ति से फायदा उठाकर आर्थिक रूप से मजबूत बनाने वाली परवल,ड्रैगन फ्रूट व फूलों की खेती पर ध्यान देने लगे हैं। पेश है बोले टीम की एक रिपोर्ट... अयोध्या। हरित क्रान्ति के बाद देश के साथ ही जनपद के किसान खाद्यान्न उत्पादन मे अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

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इसका परिणाम यह हुआ कि विदेशों से खाद्यान्न का आयात करने वाला भारत देश आज बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का निर्यात विदेशों को करने लगा है। इन सबके बीच आजादी के बाद भी किसान के आर्थिक सेहत मे वो बदलाव नहीं देखने को मिला जो होना चाहिए था। बड़े पैमाने पर खाद्यान्न के उत्पादन के बावजूद किसानों की हालत जस की तस बनी हुई है। आधुनिक सूचना क्रान्ति के युग मे किसान खुद को बदलने को मजबूर हो गए हैं। आज जनपद अयोध्या के किसान अन्य संपन्न राज्यों के नक्शेकदम पर चलते हुए परंपरागत खेती को छोड़कर वैकल्पिक खेती को तेजी से अपना रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी गेहूं,चना,सरसों,मक्का,धान,गन्ना और दालों की खेती करने वाले किसान मार्ग मे आने वाली चुनौतियों से निपटते हुए अब ड्रैगन फ्रूट,परवल,गाजर,फूलों की खेती के साथ ही अन्य आधुनिक औषधियों की खेती करने लगे हैं। आपके अपने ‘हिन्दुस्तानअखबार ने वैकल्पिक खेती करने वाले किसानों से आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की तो किसानों ने खुलकर बात करते हुए आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करते हुए बताया कि परंपरागत खेती करते पीढ़ियां बीत गईं लेकिन आज तक परिवार की आर्थिक सेहत मे कुछ खास बदलाव नहीं हुआ जिसके कारण परंपरागत खेती के साथ ही वैकल्पिक खेती करनी पड़ रही है। किसान रामानन्द ने बताया कि वैकल्पिक खेती से आर्थिक सेहत मे सुधार तो हो रहा है लेकिन इस क्षेत्र मे चुनौतियां कम नहीं हैं। सबसे बड़ी समस्या उचित जानकारी का अभाव है जानकारी न होने के चलते उचित बीज या पौध मिलने मे काफी समस्या होती है। इसके साथ ही यदि खेती मे फसल तैयार भी हो जाए तो जनपद स्तर पर बिक्री नहीं हो पाती,किसी तरह बिक्री भी होती है तो लागत के हिसाब से वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता है। मजबूरन बाहर की बाजारों मे ले जाकर बेंचना पड़ता है तो ट्रांसपोर्ट मंहगा साबित हो जाता है। किसानों का कहना है कि सरकार वैकल्पिक खेती को बढ़ावा तो दे रही है लेकिन बाजार नहीं उपलब्ध करवा पा रही है जिससे काफी समस्या होती है। कम जोत मे परवल की खेती बनी मुनाफे की खेती:क्षेत्र के प्रगतिशील युवा किसान नन्द कुमार तिवारी परंपरागत फसलों को छोड़कर सब्जी वर्गीय परवल की फसल उत्पादन करके युवाओं के लिए मिशाल बने हुए हैं। जहां परवल की खेती से मुनाफा कमा रहे हैं वही दूसरी ओर क्षेत्र मे खेती करने वाले किसानों को व्यवसायिक खेती की तरफ प्रेरित कर रहे है। किसान नन्द कुमार के अनुसार परवल की खेती मुख्यतः अगस्त से लेकर नंबर तक तथा उधर फरवरी-मार्च मे की जाती है। इसकी बुआई मुख्य तौर पर दो प्रकार की होती है जड़ विधि व लता विधि। अक्सर देखा गया है कि जड़ विधि मे जड़ उपलब्ध न होने के कारण किसानों को काफी समस्या होती है इसलिए किसान लता विधि का प्रयोग ज्यादातर करते हैं। जड़ विधि मे रोग आने के चांस ज्यादा होते हैं इसी कारण किसान जड़ का उपयोग करने से कतराते हैं। परवल की रोपाई के बाद इसका उत्पादन लगभग होने आठ से नौ माह का समय पहले वर्ष मे लगता है तथा दूसरे वर्ष मे चार माह बाद उत्पादन आना प्रारंभ हो जाता है। परवल ऐसी फसल है जो एक बार लगाने के बाद लगभग पांच वर्ष तक चलती है। इसका उत्पादन किसान तीन प्रकार से अपनी अपनी सुविधानुसार करते हैं। पहला बांस विधि,दूसरा पंडाल विधि,तीसरा जमीन विधि,तीनों विधि जमीन व मौसम के हिसाब से की जाती है। इसकी रोपाई की विधि दूरी नाली से नाली की दूरी आठ फिट व पौध से पौध की दूरी छः फिट होती है। इसमें लगभग एक एकड़ का खर्च पहली साल एक लाख रूपए का आता है तथा दूसरी साल लागत थोड़ा-बहुत कम आता है। किसान नन्द कुमार के अनुसार परवल की फसल मे मुख्य बिमारी नेमाटोड,झुलसा,लीक माइनर,उकठा आदि प्रमुख रोग आते हैं जिनका हम समय-समय पर इलाज करते रहे तो इन बीमारियों से बचा जा सकता है। दवाओं का छिड़काव प्रति सप्ताह जरूर करना चाहिए तभी उत्पादन और फल अच्छी क्वालिटी मिलेगा। नंद कुमार कहते हैं कि इतनी लागत व मेहनत के बाद परवल के लिए भंडारण गृह व उचित बाजार न मिलने से कभी कभी तो औने पौने दामों मे ही बेंचना पड़ता है जिससे लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। अच्छी किस्म की पौध न मिलने से हुई थी परेशानी:विकासखण्ड मिल्कीपुर की ग्राम सभा मेहदौना के प्रगतिशील किसान राम चंद्र मौर्या परंपरागत खेती छोड़कर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर समाज को नई दिशा प्रदान कर रहे हैं। डेढ़ बीघे से ड्रैगन फ्रूट की खेती की शुरूआत करने वाले प्रेम चंद्र मौर्या बताते हैं कि गेंहू धान की खेती खूब मन लगाकर की लेकिन को लाभ नहीं दिखाई पड़ा जिससे ड्रैगन फ्रूट की खेती करने का विचार आया लेकिन ड्रैगन फ्रूट का पौध न मिलने से काफी परेशानी हुई जनपद मे कुछ जगहों पर ड्रैगन फ्रूट के पौध बेंचे जाने की सूचना पर गया तो पता चला की ये अच्छी क्वालिटी के नहीं हैं बाजार मे इनकी मांग कम है। काफी कोशिश के बाद हरियाणा के करनाल से पौध खरीद कर खेत मे रोपित किया। शुरुआत मे ही लगभग सात लाख की लागत लग गई लेकिन कोई सरकारी मदद नहीं मिल सकी। सरकारी मदद न मिलने के बावजूद खेती मे लगा रहा जिसका परिणाम यह हुआ कि 18 माह मे फल आने शुरू हो गए और पहली सीजन मे ही 17 कुन्तल की पैदावार हुई। राम चंद्र मौर्या ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट को बेंचने के लिए फैजाबाद स्थित मंडी गया लेकिन किसी व्यापारी से वाजिब दाम नहीं मिल सका। इसी को देखते हुए गोरखपुर के व्यापारियों को बेंचना पड़ रहा है जिसमे ट्रांसपोर्ट काफी महंगा पड़ा। राम चंद्र मौर्या कहते हैं कि कुछ भी हो अब आर्थिक स्थिति सुधर रही है इसमे कोई दो राय नहीं है। बंदरो के आतंक के चलते हमारी व्यवसाइक खेती हो रही चौपट:पारंपरिक खेती धान गेहूं गन्ना को छोड़कर मवई क्षेत्र में अधिकतम किसानों ने व्यवसायिक खेती की ओर रुख किए,लेकिन लाल बंदरो के आतंक व प्रशिक्षक स्टोरेज और दवाओं के अभाव के चलते यहां के किसानों का मोह व्यवसायिक खेती की ओर से भंग हो रहा है। पटरंगा गांव के किसान प्रभात वर्मा बताते हैं कि हमने केले व अमरुद की खेती प्रारम्भ की,लेकिन क्षेत्र में बहुतायत मात्रा में मौजूद लाल बंदरो ने कई बार हमारी फसलों को पूरी तरह नष्ट कर दिए। इसलिए अब हिम्मत नही पड़ रही है। वहीं इसी गांव के पप्पू वर्मा बताते है कि हमारे गांव में कुछ लोगों ने मशरूम व इस्ट्रॉबेरी की फसल लगाई,लेकिन उसके लिए भी ये लाल बंदर अभिशाप बन गए। ये बंदर कोई फसल नहीं छोड़ते यहां तक खेतों की मिट्टी में दबी आलू भी खोदकर खा लेते हैं साथ ही पारम्परिक खेती धान,गेहूं,गन्ना को छुट्टा मवेशी नही छोड़ते हैं। ऐसे में हम लोग खेती करते जरुर हैं,लेकिन नुकसान के अलावा फायदा नही होता। बघेडी गांव के नौजवान किसान संदीप यादव बताते है कि क्षेत्र कई नौजवान किसानों ने नई नई व्यवसायिक खेती की ओर रुख करते हुए फसलें लगाई,लेकिन क्षेत्र में स्टोरेज की सुविधा व सलाहकार न होने के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगी। बोले लोग- किसानों के फसल के उत्पादन के लिए ब्लॉक स्तर पर सरकारी भण्डारण की व्यवस्था होनी चाहिये। जिससे जब फसल का भाव बढ़े तो उसे बेंचकर किसान लाभ ले सके अन्यथा बिचौलियों के चक्कर मे फंसकर नुकसान ही होगा। प्रेम कुमार राजकीय कृषि बीज गोदाम पर किसानों की मांग के अनुसार वैकल्पिक खेती के लिए बीज की आपूर्ति सुनिश्चित होनी चाहिए। किसानों को समय से खाद व अच्छी किस्म का बीज कृषि गोदामो से मिले तो उत्पादन बढ़ने के साथ आय में वृद्धि हो। अखिलेश वर्मा महंगे बीज,खाद व सिंचाई ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। सरकारी सुविधाएं भी छलावा बनकर रह गई हैं। यही कारण है कि किसान व उसका परिवार जी तोड़ मेहनत के बावजूद भुखमरी से नहीं उबर पा रहा है। राजकुमार वैकल्पिक खेती को सरकार को बढ़ावा देना चाहिए। वैकल्पिक खेती के लिए प्रचार-प्रसार कराया जाना चाहिए इसके साथ ही किसानों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था ब्लॉक स्तर पर ही होनी चाहिए। छोटेलाल यादव गांव में आमदनी बढ़ाने के लिए वर्षों से परम्परागत खेती से हटकर सब्जी की खेती कर रहा हूं। परन्तु कोई अनुदान नही मिल रहा है। जिसके चलते काफी समस्या हो रही है। उत्तम निषाद बोले जिम्मेदार: इस बारे में कृषि उपनिदेशक डॉ पीके कनौजिया का कहना है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहें हैं। वैकल्पिक खेती के लिए मोटे अनाजों की किट भी उपलब्ध कराई जा रही है। जिन किसान भाईयों को रागी या अन्य मोटे अनाज के लिए बाजार नहीं मिल रहे हैं वे सूचित करें विभाग उनके उत्पाद की खरीददारी खुद करेगा।