नेत्रहीन बुजुर्ग का हक डकार गया सिस्टम, फाइलों में मामला

Newswrap हिन्दुस्तान, औरैया
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Auraiya News - कुदरकोट के कालाबोझ गांव में एक नेत्रहीन बुजुर्ग रामसनेही का अंत्योदय राशन कार्ड कथित मिलीभगत से दूसरे के नाम कर दिया गया। पत्नी की मृत्यु के बाद कार्ड ट्रांसफर नहीं हुआ और अपात्र को लाभ दिया गया। ग्रामीणों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है।

नेत्रहीन बुजुर्ग का हक डकार गया सिस्टम, फाइलों में मामला

कुदरकोट, संवाददाता। कुदरकोट क्षेत्र के कालाबोझ गांव में एक नेत्रहीन बुजुर्ग का अंत्योदय राशन कार्ड कथित मिलीभगत से दूसरे के नाम कर दिए जाने का मामला सरकारी तंत्र की लापरवाही और भ्रष्टाचार की परतें खोल रहा है। हैरानी की बात यह है कि तथ्य सामने आने और खबर प्रकाशित होने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सके हैं। ग्राम पंचायत कालाबोज निवासी रामसनेही जो नेत्रहीन हैं, उनकी पत्नी महारानी के नाम अंत्योदय राशन कार्ड बना हुआ था। पत्नी की मृत्यु के बाद नियमानुसार कार्ड उनके नाम ट्रांसफर होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आरोप है कि इसी बीच ग्राम पंचायत के मजरा मसेड़ा निवासी रामेन्द्र सिंह के नाम कार्ड कर दिया गया, जो पूर्व पंचायत कार्यकाल में कुछ समय के लिए प्रधान का कार्यभार भी संभाल चुका है।

ग्रामीणों के मुताबिक, मामले में गड़बड़ी यहीं खत्म नहीं होती। आरोप है कि रामेन्द्र सिंह ने अपने राशन कार्ड में अपनी माता का नाम महारानी दर्ज करा दिया, जबकि वास्तविक नाम शकुंतला देवी है। यह बदलाव बिना जांच-पड़ताल के कैसे हो गया, यह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि संबंधित विभागीय अधिकारियों ने दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना ही प्रक्रिया पूरी कर दी।पीड़ित रामसनेही को इस गड़बड़ी के चलते राशन मिलना बंद हो गया है और वह आर्थिक तंगी में जीवन यापन को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन हर बार मामला फाइलों में ही उलझा दिया गया। 24 मार्च को यह प्रकरण प्रकाशित होने के बाद भी न तो जांच शुरू हुई और न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय की गई। यह मामला न केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह पात्र व्यक्ति को उसके अधिकार से वंचित कर अपात्र को लाभ पहुंचाया जा रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषियों पर कार्रवाई हो और पीड़ित को उसका हक दिलाया जाए।अफसरों से सवाल पर ‘सक्रिय’ हुआ सिस्टमऔरैया। मामले में जब पूर्ति निरीक्षक से जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया, तो कुछ ही देर में घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। हैरानी की बात यह रही कि इसके तुरंत बाद संबंधित कोटेदार का फोन हिंदुस्तान के रिपोर्टर के पास पहुंचने लगा। कोटेदार लगातार संपर्क कर मिलने की बात कहता रहा, जिससे पूरे प्रकरण पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में अक्सर तथ्यों को दबाने या मामले को रफा-दफा करने के लिए ‘मैनेजमेंट’ की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।

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