अन्दाबा: यहां होली पर पोंछे जाते हैं गमगीन परिवारों के आंसू

Mar 03, 2026 05:47 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, औरैया
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Auraiya News - औरैया जिले में होली के मौके पर 'अन्दाबा' परंपरा निभाई जाती है, जहां शोक संतप्त परिवारों के साथ गांव वाले एकजुट होते हैं। इस रस्म के दौरान, जिन परिवारों में पिछले एक साल में किसी की मृत्यु हुई है, उन परिधान पर पहले फाग गाई जाती है। यह परंपरा आपसी जुड़ाव और मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखती है।

अन्दाबा: यहां होली पर पोंछे जाते हैं गमगीन परिवारों के आंसू

औरैया, संवाददाता। जहां एक ओर पूरा देश होली के हुड़दंग, ढोल-नगाड़ों और अबीर-गुलाल के रंगों में सराबोर रहता है, वहीं औरैया जिले में अन्दाबा की एक ऐसी मर्मस्पर्शी परंपरा निभाई जाती है जो आधुनिक दौर में भी मानवीय संवेदनाओं और आपसी जुड़ाव की गहरी जड़ों को जीवंत रखे हुए है। यहाँ होली केवल खुशियों का पर्व नहीं, बल्कि बिछड़े हुए अपनों को याद करने और शोक संतप्त परिवारों के जख्मों पर सांत्वना का मरहम लगाने का दिन है। जब गमगीन आंगन में पहुंचता है पूरा गांव जिले के ग्रामीण अंचलों में यह सदियों पुरानी रस्म आज भी उतनी ही शिद्दत से निभाई जाती है।

परंपरा के अनुसार, जिस परिवार में पिछले एक साल के भीतर किसी सदस्य की मृत्यु हुई होती है, उनके यहां होली जलने से पूर्व अन्दाबा किया जाता है। नियम यह है कि उस घर में तब तक होली का कोई रंग नहीं खेला जाता जब तक कि पूरा गांव एकजुट होकर उनके द्वार पर नहीं पहुंचता। गांव के बुजुर्ग, युवा और फाग की टोलियां सबसे पहले उन्हीं घरों का रुख करती हैं जहाँ गमी हुई होती है। फाग गम को भुलाने का लोक-मंत्र अन्दाबा की रस्म के साथ ही आज भी जिले के बैसुंधरा, घसारा, बिलावां, रूरूगंज, कुदरकोट जैसे दर्जनों गावों में यह परंपरा पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है। गांवों में फाग गायन का विशेष महत्व जुड़ जाता है। अक्सर देखा जाता है कि अन्दाबा के बाद जब समाज परिवार को ढांढस बंधाता है, तो लोक कलाकार और बुजुर्ग फाग के जरिए ईश्वरीय भक्ति का संदेश देते हैं।अन्दाबा के बाद फाग की बैठकी इस बात का संकेत होती है कि पतझड़ बीत चुका है और अब वसंत की बारी है। ढोलक की आवाज शोक संतप्त मन के भारीपन को कम कर देती है। क्षेत्रीय जानकारों का मानना है कि अन्दाबा और फाग का यह मेल मनोवैज्ञानिक उपचार की तरह काम करता है। गंभीर स्वर में फाग गाई जाती जब होली के दिन ग्रामीण टोली बनाकर उस घर पहंुचती है। जहां गमी हुई है, तो वहां सबसे पहले गंभीर स्वर में फाग गाई जाती है। यह संगीत इस बात का संकेत होता है कि अब परिवार को अपने दुख के घेरे से बाहर निकलकर समाज के साथ जुड़ना चाहिए। अन्दाबा के समय गाई जाने वाली फाग सामान्य हुड़दंग वाली नहीं होती। इसमें अक्सर भगवान राम, कृष्ण या शिव के जीवन के ऐसे प्रसंग गाए जाते हैं जो जीवन की नश्वरता को दर्शाते हैं। बैसुंधरा गांव के प्रधान गौरव यादव बताते हैं की अन्दाबा केवल आयोजन नहीं है, यह हमारे पुरखों द्वारा बनाई गई वह व्यवस्था है जो समाज को टूटने से बचाती है। इससे आपसी मनमुटाव खत्म होते हैं और गांव का भाईचारा बढ़ता है। माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अजब सिंह यादव बताते हैं की हमारे गांव में यहां रिवाज है कि अन्दाबा के जरिए हम परिवार का हाथ थामते हैं और फिर फाग की चौपालों में उन्हें साथ बैठाकर ये अहसास कराते हैं कि दुनिया खुशियों से भरी है। यह हमारे पुरखों की वह दूरदर्शिता है जो आज के मनोवैज्ञानिक दवाब वाले दौर में सबसे बड़ी दवा है। क्यों खास है यह रिवाज आज के भागदौड़ भरे जीवन में जहां लोग पड़ोस के दुख-सुख से अनजान होते जा रहे हैं, अन्दाबा यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी परिवार अपने अकेलेपन में घुटता न रहे। यह रस्म न केवल शोक को हल्का करती है, बल्कि पुराने मनमुटाव और बैर-भाव को भी खत्म करने का माध्यम बनती है। कहा जाता है कि होली पर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं, और अन्दाबा इस कहावत को धरातल पर चरितार्थ करता है।

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