हल्दी व गेंदा के फूलों से तब घरों में बनाया जाता था रंग
Ambedkar-nagar News - अम्बेडकरनगर में होली का त्यौहार नजदीक है, लेकिन हर्बल रंग बनाने की पुरानी परंपरा खत्म होती जा रही है। पहले हर घर में हर्बल रंग बनते थे, लेकिन अब लोग बाजार से रंग खरीदने लगे हैं। कुछ गांवों में ही हर्बल रंग बनाने की परंपरा बची है, जिससे हल्दी के किसानों को निराशा हो रही है।

अम्बेडकरनगर, संवाददाता। होली का उत्सव नजदीक है और पुरानी परंपरा कहीं नहीं दिख रही है। शायद ही कोई ऐसा गांव और मोहल्ला होगा जहां पुरानी परंपरा का निर्वहन किया जा रहा हो। बात हर घर में हर्बल रंग बनाने की है। पहले हर घर में हर्बल रंगों का निर्माण होता था। हर्बल रंगों के निर्माण से अब हर परिवार ने हाथ खड़ा कर लिया है। पहले बसंत पंचमी के बाद घर घर में हर्बल रंगों का निर्माण होता था। करीब दो दशक पूर्व तक अधिकांश घरों में होली के लिए हर्बल रंगों का निर्माण होता था। हर्बल रंग हल्दी और गेंदा के फूलों से बनाया जाता था।
स्व निर्मित हर्बल रंग से पूरा परिवार हर्षोल्लास के साथ होली का पर्व मनाता था। हर्बल रंगों का प्रयोग एक दूसरे पर करके सभी को रंगीन करने की परंपरा का निर्वहन होता था। अब लोगों ने हर्बल रंगों के निर्माण से ही तौबा कर ली है। बेवाना की कमला देवी बताती हैं कि करीब 10 साल पहले तक हमारे घर में रंग बनता था। अब बाजार से रंग खरीदकर लाया और रंग खेला जाता है। अब कतिपय गांव ही बचे हैं, जहां कुछ लोग हर्बल रंग खासकर हल्दी और गेंदा के फूल से हर्बल रंग का निर्माण करते हैं और उससे होली खेलते हैं। इसमें जैनापुर गांव प्रमुख है। यहां की स्वयं सहायता समूह की महिलाएं हल्दी और गेंदा के फूल से आज भी हर्बल रंग बनती और खुद प्रयोग करने के साथ बाजार में बिक्री भी करती हैं। वहीं अब घरों में रंग बनाने की परम्परा खत्म होने से हल्दी उत्पादन करने वाले किसान निराश हैं। बेवाना के दयाराम मौर्य ने बताया पहले हम दीपावली के बाद होली आने का बेसब्री से इंतजार करते थे। कारण हमारे खेत की उत्पाद का हल्दी का अच्छा पैसा मिल जाता था। ऐसा हल्दी से बनने वाले रंग के चलते होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। घर में रंग बनाने से होती थी बचत हर्बल रंग के निर्माण में खर्च कम आता है।हल्दी और गेंदा के फूल से रंग का निर्माण करने में प्रति किलो अधिकतम तीन सौ रुपए का खर्च आता है। जबकि वही बाजार में बिकने वाले बिकने वाले रंग चार से पांच सौ रुपए प्रति किलो के दर से मिलते हैं। हर्बल रंग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक भी होता है। हर्बल रंग का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक नहीं होता है। हल्दी के फूल के रंगों से कपड़े भी खराब नहीं होते हैं। हर्बल रंगों की कम है मांग यूं तो हर्बल रंग नुकसान दायक नहीं होता, लेकिन महंगा जरूर होता है। आम तौर पर लोग फैशन के नाम पर महंगे और ब्रांडेड सामानों की मांग करते हैं, लेकिन पर्वो पर सस्ते की ही डिमांड अधिक होती है। इस होली की खरीदारी में भी ऐसा ही देखा जा रहा है। हर्बल रंगों के स्थान पर सस्ते और तन को नुकसान करने वाले केमिकल युक्त रंगों की अधिक खरीदारी हो रही है। भारी मुनाफे के लिए दुकानदार भी केमिकल युक्त रंगों की बिक्री में अधिक दिलचस्पी ले रहे है।
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