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पढ़ने के लिए पेड़ पर चढ़ जाते थे दूधनाथ

पढ़ने के लिए पेड़ पर चढ़ जाते थे दूधनाथ

कहते हैं पूत के पांव पालने में नजर आता है। ऐसा ही कुछ दूधनाथ सिंह के साथ भी था। शिक्षा के प्रति उनका रुझान बचपन से ही दिखने लगा था।

उनके सबसे छोटे भाई सेना के रिटायर्ड जेसीओ रामाधार सिंह बताते हैं, दूधनाथ जी को किशोरावस्था में पशुओं को चराने जाना पड़ता था। पढ़ाई के प्रति उनका रुझान ऐसा था कि वह उस समय भी किताब लेकर साथ जाया करते थे। पशुओं को चरने के लिए छोड़कर जब वे पढ़ने का प्रयास करते और साथी चरवाहे जब बाधा पहंुचाते थे, तब वे पेड़ पर चढ़ जाया करते थे और टहनियों पर लेटकर ही किताब पढ़ने लगते थे। इससे नाराज उनके साथी चरवाहे उनके (दूधनाथ जी) पशुओं को छोड़ देते थे और उनके पशु बहुत दूर निकल जाते थे। बाद में उनके घर वाले मवेशियों को ढूंढकर लाते थे। इसके चलते कई बार उनकी घर में अच्छी-खासी पिटायी भी हो जाती थी। किताबों का चाव इतना था की वह पास के गांव कैथवली व सुरही के पुस्तकालयों से किताबें लाकर पढ़ा करते थे और बड़े जतन से उसे वापस भी करते थे। उनके इस कार्य में उनके बड़े पिता मुखराम सिंह पूरी मदद करते थे।

डीएम की प्रेरणा से उच्च शिक्षा को गये इलाहाबाद:

दूधनाथ सिंह के पिता देवकीनंदन सिंह एक किसान थे। आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। इस कारण दूधनाथ सिंह की प्राथमिक शिक्षा बगल के गांव नरहीं के प्राथमिक विद्यालय नंबर एक पर हुई। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की शिक्षा उन्होंने चितबड़ागांव स्थित मर्चेंट इंटर कॉलेज में पूरी की। आगे की शिक्षा के लिए बलिया पढ़ने की बात आई तो किसान पिता ने हाथ खड़े कर दिए। तब बड़े पिता मुखराम सिंह ने इनका साथ दिया।

दरअसल मुखराम सिंह की कोई संतान नहीं थी। लिहाजा उनकी पत्नी ज्योतिया देवी दूधनाथ सिंह को ही अपना बेटा मानती थीं। बड़े पिता के प्रयास से सतीश चंद कालेज (बलिया) से स्नातक की पढ़ाई पूरी हो गयी। हालांकि इसके बाद फिर घर बैठ गए।

रामाधार सिंह बताते हैं, एक बार दूधनाथ सड़क से सटे अपने खेत में मक्के की फसल की रखवाली कर रहे थे। वहीं बगल मे तत्कालीन जिलाधिकारी (बलिया) मेंहदी हसन किसी कार्य का निरीक्षण करने आए थे। कौतूहलवश दूधनाथ भी वहां चले गए। ग्रामीणों से बातचीत के क्रम में डीएम इनसे भी बात करने लगे। इनकी धाराप्रवाह हिंदी व अंग्रेजी के उच्चारण से मेंहदी हसन काफी प्रभावित हुए और दूधनाथ सिंह को उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद जाने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद एक बार फिर बड़े पिता मुखराम सिंह की मदद से इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और एमए व पीएचडी की डिग्री हासिल की ।

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