धारा 216 सीआरपीसी के तहत आरोप बदलने का अधिकार केवल अदालत को : हाईकोर्ट

प्रयागराज, विधि संवाददाता
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आरोप तय होने के बाद आरोपी को धारा 216 दंड प्रक्रिया संहिता (अब धारा 239 बीएनएसएस) के तहत स्वयं आवेदन देकर आरोप बदलवाने या हटवाने का कोई अधिकार नहीं है।

धारा 216 सीआरपीसी के तहत आरोप बदलने का अधिकार केवल अदालत को : हाईकोर्ट

Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आरोप तय होने के बाद आरोपी को धारा 216 दंड प्रक्रिया संहिता (अब धारा 239 बीएनएसएस) के तहत स्वयं आवेदन देकर आरोप बदलवाने या हटवाने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि यह शक्ति केवल ट्रायल कोर्ट के पास है और वह भी तभी प्रयोग की जा सकती है जब अदालत को स्वयं लगे कि आरोपों में संशोधन आवश्यक है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने यह फैसला कानपुर देहात के शिवली थाने में दर्ज पॉक्सो और दुष्कर्म के मामले में आरोपी प्रवीण पाल की याचिका खारिज करते हुए दिया।

मामला वर्ष 2022 में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने 6-7 वर्ष पहले उसके साथ दुष्कर्म किया, अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया तथा गर्भपात कराने के लिए दवा दी। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376, 313, 354, 452, 323, 506 तथा पॉक्सो एक्ट की धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया।

आरोपी की ओर से कहा गया कि पीड़िता की हाईस्कूल अंकपत्र के अनुसार जन्मतिथि 17 जुलाई 1997 है। इस आधार पर कथित घटना के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक थी, इसलिए पॉक्सो एक्ट और आईपीसी की धारा 376(3) लागू नहीं होती। आरोपी ने पहले डिस्चार्ज आवेदन दायर किया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने 27 मार्च 2023 को खारिज कर दिया था। बाद में उसने धारा 216 सीआरपीसी/239 बीएनएसएस के तहत आरोप बदलने का आवेदन दिया, जिसे भी ट्रायल कोर्ट ने 19 मई 2025 को अस्वीकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 216 सीआरपीसी अदालत को किसी भी समय निर्णय से पहले आरोप जोड़ने या बदलने की शक्ति देती है, लेकिन यह अधिकार केवल अदालत का है। आरोपी या शिकायतकर्ता इसे अधिकार के रूप में मांग नहीं सकते। अदालत ने ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि आरोप तय होने के बाद आरोपी बार-बार ऐसे आवेदन देने लगे तो आपराधिक मुकदमों की सुनवाई अनावश्यक रूप से लंबी हो जाएगी और त्वरित न्याय की अवधारणा प्रभावित होगी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 216 का उपयोग डिस्चार्ज आवेदन खारिज होने के बाद “दूसरा मौका” पाने के लिए नहीं किया जा सकता।

Dinesh Rathour

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दिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका (डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
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हरदोई ब्यूरो से करिअर की शुरुआत करने के बाद दिनेश ने कानपुर हिंदुस्तान से जुड़े। यहां बतौर स्ट्रिंगर डेस्क पर करीब एक साल तक काम किया। इसके बाद वह कानपुर में ही दैनिक जागरण से जुड़े। 2012 में मुरादाबाद हिंदुस्तान जब लांच हुआ तो उसका हिस्सा भी बने। करीब दो साल यहां नौकरी करने के बाद दिनेश राजस्थान पत्रिका से जुड़ गए। सीकर जिले में दिनेश ने करीब तीन साल तक पत्रकारिता की। उन्होंने एक साल तक डिजिटल का काम भी किया। 2017 में दिनेश ने बरेली हिंदुस्तान में प्रिंट के डेस्क पर वापसी की। लगभग दो साल की सेवाओं के बाद डिजिटल हिंदुस्तान में काम करने का मौका मिला जिसका सफर जारी है।

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