किराएदार की मौत के बाद सभी वारिसों को बेदखली में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं: हाईकोर्ट

Dinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किरायेदारी कानून से जुड़े एक मामले के निर्णय में स्पष्ट किया कि किरायेदार की मौत के बाद उसके सभी कानूनी वारिसों को बेदखली के केस में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है।

किराएदार की मौत के बाद सभी वारिसों को बेदखली में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं: हाईकोर्ट

Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किरायेदारी कानून से जुड़े एक मामले के निर्णय में स्पष्ट किया कि किरायेदार की मौत के बाद उसके सभी कानूनी वारिसों को बेदखली के केस में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है। मूल किरायेदार की मृत्यु के बाद उसकी किरायेदारी सभी कानूनी वारिसों पर संयुक्त किरायेदारी के रूप में हस्तांतरित होती है। किसी एक के खिलाफ केस चल सकता है और मकान मालिक के लिए सभी वारिसों को अलग-अलग पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है।

यह आदेश न्यायमूर्ति डॉ योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने वाराणसी निवासी आशीष कुमार अग्रवाल की याचिका खारिज करते हुए किया है। इसी के साथ न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट व पुनरीक्षण न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन नहीं देते हुए मामले की सुनवाई तेजी से करे और अधिकतम छह महीने में मामले को निस्तारित करे।

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किराएदार के विरुद्ध चलाई जा सकती है बेदखली की कार्रवाई

कोर्ट ने कहा कि किसी एक वारिस/संयुक्त किरायेदार के विरुद्ध बेदखली की कार्यवाही चलाई जा सकती है और डिक्री सभी पर बाध्यकारी होगी। अपवाद तब हो सकता है, जब कोई यह दावा करे कि उसे किरायेदारी से अलग किया गया है या उसका हित अलग है तो उसे अपना केस साबित करना होगा। कोर्ट ने एचसी पांडेय बनाम जीसी पाल, कांजी मांझी बनाम ट्रस्टी ऑफ पोर्ट ऑफ बांबे के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सिद्धांत यूपी अर्बन बिल्डिंग एक्ट के तहत भी लागू होता है। मामले के तथ्यों के अनुसार चित्रकूट की लघु वाद अदालत में 2014 में चित्रकूट रामलीला समिति, रामकृष्ण अग्रवाल व अखिल अग्रवाल ने किरायेदार कृष्ण गोपाल गुप्ता की बेदखली के लिए वाद दाखिल किया।

हाईकोर्ट ने रद्द की एक पक्षीय कार्यवाही

कृष्ण गोपाल गुप्ता की 14 फरवरी 2019 को मृत्यु हो गई तो 18 फरवरी 2021 को ट्रायल कोर्ट ने याची आशीष को अकेले पक्षकार बनाया। इसके बाद 27 अप्रैल 2022 को उसकी अनुपस्थिति में एकपक्षीय कार्यवाही हुई। इसके विरुद्ध आदेश रिकॉल करने का प्रार्थना पत्र दिया गया जिसे ट्रायल कोर्ट ने 18 अगस्त 2023 को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और एकपक्षीय कार्यवाही रद्द कर दी। साथ ही 18 फरवरी 2021 का आदेश रद्द करने से इनकार कर दिया। चुनौती दिए जाने पर पुनरीक्षण न्यायालय ने 26 नवंबर 2025 को ट्रायल कोर्ट का जुलाई 2023 का आदेश सही ठहराया। इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याची का कहना था कि ट्रायल व पुनरीक्षण न्यायालय ने कृष्ण गोपाल गुप्ता के सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को शामिल किए बिना वाद को आगे बढ़ाने में कानूनी त्रुटि की है।

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दिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका (डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में कार्यरत दिनेश दिनेश, खबरों के पीछे की राजनीति और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स (वायरल वीडियो) को बारीकी से विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं।

पत्रकारिता का सफर
हरदोई ब्यूरो से करिअर की शुरुआत करने के बाद दिनेश ने कानपुर हिंदुस्तान से जुड़े। यहां बतौर स्ट्रिंगर डेस्क पर करीब एक साल तक काम किया। इसके बाद वह कानपुर में ही दैनिक जागरण से जुड़े। 2012 में मुरादाबाद हिंदुस्तान जब लांच हुआ तो उसका हिस्सा भी बने। करीब दो साल यहां नौकरी करने के बाद दिनेश राजस्थान पत्रिका से जुड़ गए। सीकर जिले में दिनेश ने करीब तीन साल तक पत्रकारिता की। उन्होंने एक साल तक डिजिटल का काम भी किया। 2017 में दिनेश ने बरेली हिंदुस्तान में प्रिंट के डेस्क पर वापसी की। लगभग दो साल की सेवाओं के बाद डिजिटल हिंदुस्तान में काम करने का मौका मिला जिसका सफर जारी है।

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