पत्नियों की प्रताड़ना से बचाने वाले कानून की मांग वाली याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट से खारिज; जानें डिटेल
सीताराम नाम प्रचार-प्रसार संस्था चंदौली की ओर से चंद्रमा विश्वकर्मा की जनहित याचिका में पत्नियों से पतियों को सुरक्षित रखने की मांग की गई थी। इसमें कहा गया था बड़ी संख्या में पति अपनी पत्नियों द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं। पुरुषों की महिलाओं से सुरक्षा के लिए कानून बनाने की मांग की गई थी।
आपने महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ थाने से लेकर अदालतों तक अर्जियां बहुत देखी होंगी लेकिन यह मामला थोड़ा अलग था। यहां पतियों को पत्नियों के उत्पीड़न से बचाने की गुहार लगाई गई थी। पुरुषों के खिलाफ झूठे मुकदमों और उत्पीड़न के अलग-अलग तरीकों का उल्लेख करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में गुहार लगाई गई थी। हाईकोर्ट ने पतियों के उत्पीड़न और उन्हें झूठे केसों में फंसाने पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने की मांग में दाखिल याचिका खारिज कर दी। यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने दिया है।

सीताराम नाम प्रचार-प्रसार संस्था चंदौली की ओर से चंद्रमा विश्वकर्मा की जनहित याचिका में पत्नियों से पतियों को सुरक्षित रखने की मांग की गई थी। कहा गया था कि बड़ी संख्या में पति अपनी पत्नियों द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं। याचिका में इसे लेकर पुरुषों की महिलाओं से सुरक्षा और उनके अन्य प्रकार के उत्पीड़न से बचाव के लिए कानून बनाने की मांग की गई थी।
कहा गया था कि इस मांग को लेकर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, लोक सभा व राज्य सभा अध्यक्ष और प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र भेजा गया लेकिन उनके स्तर से इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। याचिका में कहा गया था कि महिलाओं के पक्ष में बने कानून ने उन्हें निष्ठुर बना दिया है। वे पतियों के प्रति अपराध कर रही हैं। दहेज हत्या के 90 प्रतिशत केस झूठे निकल रहे हैं जिससे पति और उसका परिवार परेशान हो रहा है।
कहा गया था कि महिलाएं रेप के फर्जी केस भी करा रही हैं। इसके अलावा हिंदुओं में तलाक का आदेश लेना बहुत कठिन है। कोर्ट ने उठाए गए मुद्दे को विचारणीय न मानते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही पत्नियों के उत्पीड़न से पतियों को बचाने के लिए सुरक्षा कवच बनाने की मांग फिलहाल पूरी नहीं हुई। वैसे देश में कुछ अन्य संस्थाओं और पीड़ितों की ओर से लगातार की इसकी मांग की जा रही है। कुछ संस्थाएं पुरुषों को कानूनी सहायता भी उपलब्ध करा रही हैं।





